उत्तराखंड के कई इलाकों में भूजल स्तर की स्थिति गंभीर, CGWB की स्टडी में खुलासा, विशेषज्ञों ने दी ये सलाह
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड ने उत्तराखंड में भूजल की स्थिति को लेकर अध्ययन किया, 10 जुलाई को रिपोर्ट जारी की. रोहित कुमार सोनी की रिपोर्ट

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 15, 2026 at 5:22 PM IST
|Updated : August 15, 2026 at 7:58 PM IST
देहरादून: उत्तराखंड भले ही गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों का उद्गम स्थल है और देश के एक बड़े हिस्से को पानी उपलब्ध कराता है, लेकिन राज्य में कई स्थानों पर ग्राउंड वाटर लेवल की स्थिति चिंताजनक है. ये हालात भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं.
उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर की स्थिति चिंताजनक: केंद्रीय भूमि जल बोर्ड ने उत्तराखंड में भूजल की स्थिति को लेकर अध्ययन किया है. इसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. दरअसल, केंद्रीय भूजल संस्थान ने प्रदेश भर के 340 स्थानों पर भूजल की स्थिति को लेकर अध्ययन किया है. इसमें प्रदेश के खासकर मैदानी क्षेत्रों में अत्यधिक भूजल का दोहन पाया गया है. आखिर क्या कहती है केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्ट. प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में क्या है भूजल और भूजल के दोहन की स्थिति? पेश है ईटीवी भारत की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट.
विशेषज्ञों ने दी भूजल दोहन में कमी और स्प्रिंग्स प्रबंधन की सलाह: देश भर में चल रहे राष्ट्रीय भूजल निगरानी कार्यक्रम (National Ground Water Monitoring Program) के तहत केंद्रीय भूजल बोर्ड ने उत्तराखंड में भूजल की स्थिति का आकलन किया है. मई 2026 तक केंद्रीय भूजल बोर्ड ने उत्तराखंड में 21 खुले कुओं, 196 हैंडपंपों, 111 स्रोतों (स्प्रिंग्स) और 12 पीजोमीटरों का इस्तेमाल कर निगरानी करते हुए अध्ययन किया है. इससे राज्य के तमाम जलभृतों (Aquifers) में भूजल की स्थिति और उसमें होने वाले स्थानिक एवं सामयिक परिवर्तनों (Spatial and Temporal Changes) का आकलन किया गया है. उत्तराखंड में भूजल की स्थिति में मिलाजुला संकेत पाया गया है. अध्ययन से पता चला कि कई कुओं और स्रोतों में पानी का स्तर बेहतर हुआ है, जबकि कुछ क्षेत्रों में गिरावट और स्प्रिंग्स के डिस्चार्ज में आई कमी चिंताजनक है.

सिंचाई एवं आपूर्ति की चुनौतियां: उत्तराखंड का जल-भूविज्ञान, राज्य के भूविज्ञान और भू-आकृति विज्ञान से जुड़ा हुआ है. प्रदेश में भूविज्ञान और भू-आकृतियों में भिन्नता होने के चलते, यहां जल-भूवैज्ञानिक स्थितियां भी अलग-अलग तरह की पाई जाती हैं. प्रदेश की क्षेत्रीय जल-भूवैज्ञानिक संरचना को, उत्तर से दक्षिण की ओर पांच जल-भूवैज्ञानिक इकाइयों (Hydrogeological units) में बांटा गया है. इसमें, हिमालयी क्षेत्र, उप-हिमालय (शिवालिक), भाबर, तराई और मध्य गंगा मैदान शामिल हैं. हर यूनिट की मिट्टी, जल-स्रोत और भू-आकृतियां अलग होने के कारण पानी की उपलब्धता, भूतल एवं भू-गर्भ जल की स्थिति, सिंचाई एवं आपूर्ति की चुनौतियां भी अलग हैं.

क्या कहती है रिपोर्ट: 10 जुलाई में आई रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 के दौरान 196 कुओं के जल स्तर के अध्ययन से पता चला कि जल स्तर कोपा सिग्नल, गदरपुर, उधम सिंह नगर में 0.22 मीटर भूमि सतह से नीचे (Meters Below Ground Level) से लेकर तरला नागल, रायपुर, देहरादून में 75.73 मीटर भूमि सतह से नीचे (Meters Below Ground Level) तक पाया गया है. राज्य के मैदानी क्षेत्रों में जल स्तर की स्थिति जानने के लिए 120 कुओं का अध्ययन किया गया. इनमें से 33 कुओं में जल स्तर 5 मीटर से कम, 30 कुओं में 5-10 मीटर, 19 कुओं में 10-15 मीटर, 20 कुओं में 15-30 मीटर, 8 कुओं में 30-50 मीटर और 10 कुओं में 50 मीटर से अधिक भूमि सतह से नीचे पाया गया.

चिंता बढ़ाने वाले हैं आंकड़े: आंकड़ों पर गौर करें तो, मई 2024 की तुलना में मई 2026 के दौरान 120 कुओं में से 84 कुओं के जल स्तर में वृद्धि दर्ज हुई. इनमें से 53 कुओं में 0-2 मीटर, 24 कुओं में 2-4 मीटर और 7 कुओं में 4 मीटर से अधिक जल स्तर में वृद्धि पाई गई. इसी तरह, मई 2024 की तुलना में 36 कुओं में जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई. इनमें से 30 कुओं में 0-2 मीटर, 3 कुओं में 2-4 मीटर और 3 कुओं में 4 मीटर से अधिक जल स्तर की गिरावट पाई गई. हालांकि, मई 2016 से 2025 के दौरान औसत मई महीने के जल स्तर की तुलना में मई 2026 के दौरान 105 कुओं में से 62 कुओं में जल स्तर में वृद्धि दर्ज की गई. जबकि 43 कुओं के जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई. इन 43 कुओं में से 35 कुओं में 0-2 मीटर, 3 कुओं में 2-4 मीटर और 5 कुओं में 4 मीटर से अधिक जल स्तर की गिरावट पाई गई.

पहाड़ की स्थिति देखिए: पर्वतीय क्षेत्रों में मौजूद स्प्रिंग्स से होने वाले वॉटर डिस्चार्ज स्थिति पर भी अध्ययन किया गया है. मई 2026 के दौरान 111 स्रोतों (स्प्रिंग्स) पर अध्ययन किया गया. जिसमें पाया गया कि 111 स्रोतों में से 38 स्रोतों का डिस्चार्ज 0-5 एलपीएम (Liters Per Minute), 17 स्रोतों का डिस्चार्ज 5-10 एलपीएम, 27 स्रोतों का डिस्चार्ज 10-20 एलपीएम, 19 स्रोतों का डिस्चार्ज 20-40 एलपीएम और 10 स्रोतों का डिस्चार्ज 40 एलपीएम से अधिक पाया गया. मई 2026 के दौरान पौड़ी गढ़वाल जिले के सतपुली स्रोत में मिनीमम डिस्चार्ज 0.42 एलपीएम और टिहरी गढ़वाल जिले के ढोलापानी स्रोत में अधिकतम डिस्चार्ज 350.44 डिस्चार्ज पाया गया. कुल मिलाकर, मई 2025 की तुलना में मई 2026 के दौरान 51 स्रोतों (स्प्रिंग्स) के डिस्चार्ज में कमी पाई गई। जबकि 60 स्रोतों के डिस्चार्ज में वृद्धि पाई गई.
भूजल स्तर में उतार-चढ़ाव के लिए ये कारण हैं जिम्मेदार: वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक कारणों यानी बारिश, वाष्पोत्सर्जन और मौसमी चक्र (Rainfall, evapotranspiration and seasonal cycle) की वजह से भूजल स्तर में उतार- चढ़ाव होता है. मौसम में बदलाव और मानसून की तीव्रता का सीधा असर भूजल पर पड़ता है. मानवीय कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसमें बेतहाशा भूजल का दोहन, सिंचाई और कचरा-प्रबंधन की कमी भी भूजल पर दबाव डालते हैं. मैदानी इलाकों में अधिक दोहन और पर्वतीय इलाकों में पानी के छोटे स्रोतों का सूखना भी एक बड़ी समस्या है.

कई स्प्रिंग्स का डिस्चार्ज कम होना गिरा रहा जलस्तर: प्रदेश के उन हिस्सों में जहां उत्तर-मानसून के बाद भूजल की गहराई 10 मीटर से अधिक दर्ज होती है और दीर्घकालिक ट्रेंड में जल स्तर गिर रहा है, वो क्षेत्र काफी चिंताजनक हैं. हिमालयी और उप-हिमालयी क्षेत्रों में कई स्प्रिंग्स का डिस्चार्ज कम होना स्थानीय पेयजल आपूर्ति और जीविका पर असर डाल रहा है. छोटे गांवों के लिए स्प्रिंग्स जीवन रेखा होते हैं. ऐसे में इनके सूखने का मतलब नल- कुओं या टैंकर निर्भरता बढ़ना है. ऐसे में कृत्रिम भूजल पुनर्भरण (Artificial Recharge) उन मैदानी और अर्ध-मैदानी क्षेत्रों में लागू किया जाना चाहिए, जहां भू- जल का स्तर कम होता जा रहा है. आर्टिफिशियल रिचार्ज के लिए रिचार्ज पिट्स, बैरियर और चैनलाइजेशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
वैज्ञानिकों ने दिए ये सुझाव: वैज्ञानिकों के अध्ययन के साथ तमाम सुझाव भी दिए हैं. जिसके तहत खेती में जल उपयोग को अधिक कुशल बनाना (ड्रिप इरिगेशन), वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देना और भूजल निकासी पर निगरानी व नियंत्रक लागू करना जरूरी है. इसके साथ ही अधिक से अधिक पेड़ लगाएं और पहाड़ी क्षेत्रों में जुताई और भूमि क्षरण कम करने वाली पारंपरिक पद्धतियों को अपनाएं. प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में लगातार गिरावट और स्प्रिंग्स के डिस्चार्ज में कमी ऐसी चेतावनी हैं जिन्हें स्थानीय और राज्य दोनों स्तरों पर तत्काल ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक का स्टेटमेंट: वहीं, ज्यादा जानकारी देते हुए केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक प्रशांत राय ने कहा कि-
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड हर साल भूमि जल की स्थिति को जानने के लिए रिसोर्स का आकलन करता है. यह आकलन उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां पर धरातलीय स्लोप 20 फीसदी से नीचे हो यानी जहां मैदानी क्षेत्र अधिक हो और पर्वतीय क्षेत्र काम हो. उत्तराखंड में 20 ब्लॉक ऐसे हैं, जो इस तरह के क्षेत्रों में शामिल हैं. ऐसे में आकलन के दौरान, क्षेत्रों को चार हिस्सों में बांटा जाता है जिसमें ओवर एक्सप्लोइट, क्रिटिकल, सेमी क्रिटिकल और सेफ़ कैटेगरी शामिल हैं. उत्तराखंड के चार ब्लॉक ऐसे हैं जो सेमी- क्रिटिकल श्रेणी में पाए गए हैं, जिनकी सोचनीय स्थित है.
-प्रशांत राय, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड-
ये हैं चार सेमी क्रिटिकल जिले: राय के अनुसार चार सेमी- क्रिटिकल श्रेणी में हरिद्वार जिले का बहादराबाद एवं भगवानपुर, उधम सिंह नगर जिले का काशीपुर के साथ ही नैनीताल जिले का हल्द्वानी क्षेत्र शामिल हैं. किसी क्षेत्र में जो समस्याएं सामने आ रही हैं उसके दो मुख्य कारण हैं. इनमें प्राकृतिक और मानव जनित कारण शामिल हैं. साथ ही कहा कि जो मानव जनित कारण हैं, उनको ठीक किया जा सकता है, लेकिन जो प्राकृतिक कारण हैं, उनको ठीक नहीं किया जा सकता है.
इस कारण भूजल पर बढ़ा दबाव: काशीपुर का क्षेत्र इंडस्ट्रियल एरिया है जहां पर पानी का अत्यधिक इस्तेमाल होता है. इसके अलावा, उधमसिंह नगर जिले में धान की खेती साल में दो बार होती है, जिसे चलते पानी का अत्यधिक इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह हरिद्वार जिले का बहादराबाद और भगवानपुर क्षेत्र में गन्ने की खेती काफी अधिक होती है. लिहाजा, उस क्षेत्र में भी अत्यधिक पानी का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में अगर गन्ने के खेती के दौरान खेत के अंदर नालियां बनाकर सिंचाई करते हैं, तो उससे काफी अधिक पानी बचाया जा सकता है. लिहाजा प्रदेश में अगर छोटे-छोटे प्रयास किए जाएं, तो भूजल के अत्यधिक दोहन पर लगाया जा सकता है.
देहरादून में बढ़ती बसावट ने कम किया पानी: केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक ने कहा कि-
देहरादून में बहुत तेजी से अर्बनाइजेशन का कार्य चल रहा है. इसके चलते घंटाघर के आसपास का क्षेत्र और बसंत विहार के क्षेत्र में भूजल का स्तर गिरता जा रहा है. आंकड़ों के अनुसार, 50 सेंटीमीटर प्रति साल भूजल का लेवल नीचे जा रहा है. यही नहीं, अध्ययन में पाया कि साल 1932 से 1996 के बीच हर साल एक मिलीमीटर प्रति साल बारिश कम हुई थी.
-प्रशांत राय, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड-
बारिश का भी हुआ आकलन: साल 1996 के बाद से वर्तमान समय के बीच हुई बारिश का जब आकलन किया गया, तो पाया गया कि 14 मिलीमीटर प्रतिवर्ष बारिश कम हुई है. ऐसे में एक तरफ रेनफॉल काम हो रही है, दूसरी तरफ शहरीकरण के नाम पर कंक्रीट के जंगल बनने जा रहे हैं. इसका असर यह हो रहा है कि भूजल का रिचार्ज कम हो रहा है और दोहन अधिक हो रहा है. इसके चलते भूजल की स्थिति खराब होती जा रही है.
क्या है सीजीडब्ल्यूबी? भारत में नेशनल ग्राउंड वॉटर मॉनिटरिंग प्रोग्राम को सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) मैनेज करता है. यह देश भर में हज़ारों मॉनिटरिंग स्टेशनों का इस्तेमाल करके पानी के लेवल और पानी की क्वालिटी को ट्रैक करता है, जिसमें सस्टेनेबल वॉटर मैनेजमेंट को गाइड करने के लिए ऑटोमेटेड डिजिटल सेंसर शामिल हैं.
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