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ना गिरफ्तारी, ना कानून… फिर भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर खौफ है कायम

झारखंड में साइबर अपराधियों ने 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए कई लोगों से लाखों-करोड़ों रुपये ठगे हैं. रिपोर्ट - प्रशांत कुमार.

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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : August 24, 2026 at 7:31 PM IST

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रांची: डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ देशभर में लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. साइबर पुलिस से लेकर ईडी और सीबीआई तक लोगों को बार-बार आगाह कर रही हैं. अभिनेता अमिताभ बच्चन की आवाज में भी लोगों को साइबर ठगी से बचने का संदेश प्रसारित किया गया है. इसके बावजूद डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है.

चौंकाने वाली बात यह है कि साइबर अपराधियों के जाल में सिर्फ आम लोग ही नहीं फंस रहे, बल्कि डॉक्टर, प्रोफेसर, बैंक अधिकारी, कारोबारी और रिटायर्ड अधिकारी भी इसके शिकार बन रहे हैं. साइबर अपराधियों ने डर और सरकारी एजेंसियों के नाम का ऐसा मनोवैज्ञानिक जाल तैयार कर लिया है, जिसमें पढ़े-लिखे लोग भी अपनी मेहनत की कमाई गंवा रहे हैं.

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अरगोड़ा में एंटी टेरर ग्रुप का अधिकारी बनकर ठगी

रांची के अरगोड़ा इलाके में इसी अगस्त महीने में ही साइबर अपराधियों ने एक दंपती को अपना शिकार बनाया. इस वारदात ने यह साबित कर दिया कि डिजिटल अरेस्ट की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं. ठगों ने खुद को दिल्ली एटीएस का अधिकारी बताया और कहा कि आतंकी वारदात में गिरफ्तार कुछ संदिग्धों ने पूछताछ के दौरान उनका नाम लिया है. इसके बाद दंपती को डराया गया कि अगर वे खुद को इस मामले से बचाना चाहते हैं तो उन्हें पैसे देने होंगे. आरोपियों ने पति-पत्नी को वीडियो कॉल पर लेकर डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाया और करीब 3.40 लाख रुपये की ठगी कर ली.

कानून नहीं, लेकिन फिर भी डर

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सीबीआई, ईडी और झारखंड सीआईडी की साइबर क्राइम ब्रांच लगातार यह स्पष्ट कर रही हैं कि भारत में डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानून नहीं है, तो आखिर लोग इस जाल में क्यों फंस रहे हैं? इसका जवाब है—डर. साइबर अपराधी सरकारी एजेंसियों का नाम, फर्जी आईडी, लोगो, दस्तावेज और गिरफ्तारी वारंट का इस्तेमाल कर कुछ ही मिनटों में पीड़ित के दिमाग पर ऐसा दबाव बना देते हैं कि वह सही और गलत के बीच फर्क करना भूल जाता है. फिलहाल, ताजा मामला रांची के अरगोड़ा का है. 8 अगस्त को साइबर अपराधियों ने खुद को दिल्ली एटीएस का अधिकारी बताकर पति-पत्नी को डिजिटल अरेस्ट किया और ठगी को अंजाम दिया.

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लगातार आ रहे मामले सामने

सीआईडी के साइबर क्राइम ब्रांच के आँकड़ों के अनुसार, 2026 में अगस्त तक झारखंड में 19 से ज्यादा डिजिटल अरेस्ट के मामले सामने आ चुके हैं. वर्ष 2025 और 2026 में झारखंड के अलग-अलग जिलों में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक की ठगी के मामले सामने आए हैं.

सबसे पहले समझिए, डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानून नहीं

साइबर एक्सपर्ट विनीत कुमार के अनुसार, ‘डिजिटल अरेस्ट’ शब्द ही साइबर ठगी की पूरी रणनीति का सबसे बड़ा भ्रम है. देश में ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत पुलिस, सीबीआई, ईडी या कोई दूसरी जाँच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर उसके घर में बैठाकर गिरफ्तार कर ले और उसे घंटों या दिनों तक फोन पर निगरानी में रखे. लेकिन साइबर अपराधी इसी झूठ को सच की तरह पेश करते हैं. कभी खुद को सीबीआई अधिकारी बताते हैं, कभी ईडी, एनआईए या पुलिस अधिकारी. फर्जी वर्दी, आईडी कार्ड, सरकारी लोगो, नकली दस्तावेज और गिरफ्तारी वारंट दिखाकर पीड़ित को मानसिक रूप से तोड़ दिया जाता है.

पहले डराते हैं, फिर करवाते हैं खाता खाली

डिजिटल अरेस्ट की ठगी का तरीका लगभग तय होता है. पहले फोन आता है. बताया जाता है कि आपके मोबाइल नंबर, बैंक खाते या किसी दस्तावेज का इस्तेमाल अवैध गतिविधि में हुआ है. इसके बाद आपको किसी बड़े अपराध या मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी बताया जाता है.

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पीड़ित से कहा जाता है कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है. कई बार व्हाट्सऐप या ई-मेल पर फर्जी वारंट और समन भी भेजे जाते हैं. इसके बाद ‘वेरिफिकेशन’, ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’, ‘मनी ट्रेल जाँच’ या ‘राहत राशि’ के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं. डरे हुए पीड़ित को लगता है कि पैसा देने से वह कानूनी कार्रवाई से बच जाएगा और इसी भ्रम में वह अपनी जमा-पूँजी ठगों के हवाले कर देता है.

करोड़ों के घोटाले में फंसाने का डर

साइबर अपराधियों का एक और खतरनाक तरीका है पीड़ित को किसी बड़े घोटाले का हिस्सा बताना. ठग दावा करते हैं कि करोड़ों रुपये के अवैध लेन-देन में पीड़ित का बैंक खाता या मोबाइल नंबर इस्तेमाल हुआ है. इसके बाद कहा जाता है कि अगर कथित घोटाले की रकम का एक हिस्सा तुरंत जमा कर दिया जाए तो गिरफ्तारी से राहत मिल सकती है. सरकारी एजेंसी का नाम, फर्जी वारंट और वीडियो कॉल पर अधिकारी की भूमिका निभाता व्यक्ति - इन तीनों के जरिए पीड़ित पर इतना दबाव बनाया जाता है कि वह परिवार, दोस्त या पुलिस से मदद लेने के बजाय ठगों के निर्देश मानने लगता है.

घंटों नहीं, कई दिनों तक चलता है डिजिटल अरेस्ट

डिजिटल अरेस्ट की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सिर्फ कुछ मिनटों की ठगी नहीं होती. रांची के एक मामले में पीड़ित को करीब 12 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर घर में ही रखा गया. उसे लगातार फोन पर जोड़े रखा गया. फोन काटने पर परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी तक की धमकी दी गई.

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कई पीड़ितों ने बताया है कि ठग उन्हें घंटों वीडियो कॉल पर रखते हैं. किसी से बात करने नहीं दिया जाता. फोन काटने पर तत्काल गिरफ्तारी या परिवार को नुकसान पहुँचाने की धमकी दी जाती है. यानी ठग पहले दिमाग पर कब्जा करते हैं और फिर बैंक खाते पर.

ईडी की चेतावनी, सीबीआई का ‘ऑपरेशन अभय’

डिजिटल अरेस्ट के कई मामलों में साइबर अपराधी ईडी का नाम इस्तेमाल करते हैं. इसे देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने भी लोगों को फर्जी समन और नोटिस से सावधान रहने को कहा है. बकायदा एजेंसी के नाम पर आने वाले नोटिस के सत्यापन को लेकर भी मंच उपलब्ध करवाया गया है, क्योंकि ठग ईडी के नाम पर ऐसे दस्तावेज भेजते हैं, जो देखने में बिल्कुल सरकारी नोटिस जैसे लगते हैं. वहीं, सीबीआई ने भी डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ ‘ऑपरेशन अभय’ शुरू किया है. इसके जरिए लोगों को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के तरीकों और उससे बचाव को लेकर जागरूक किया जा रहा है.

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डिजिटल अरेस्ट (Etv Bharat)

सीआईडी की कार्रवाई, कई राज्यों तक फैला साइबर ठगी का नेटवर्क

झारखंड सीआईडी की साइबर क्राइम ब्रांच डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में लगातार कार्रवाई कर रही है. पिछले दो वर्षों में सामने आए कई मामलों में दूसरे राज्यों तक जाकर साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया है.

डिजिटल अरेस्ट से बचने का एक ही हथियार - सतर्कता

सीआईडी के साइबर क्राइम ब्रांच के अनुसार, साइबर अपराधी चाहे किसी बड़े अधिकारी की आवाज़ में बात करें, फर्जी आईडी दिखाएँ, सरकारी दस्तावेज भेजें या गिरफ्तारी की धमकी दें, घबराना नहीं है. फोन आने के बाद सबसे जरूरी है मामले का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना. सबसे आसान काम है कि अपने नजदीकी थाने को फोन कर लीजिए और उन्हें अपनी पूरी कहानी बताइए. अगर साइबर अपराधी आपको वीडियो कॉल पर रखे रहते हैं तो आप अपने किसी नजदीकी व्यक्ति को टेक्स्ट मैसेज भेज सकते हैं, क्योंकि टेक्स्ट मैसेज करते समय साइबर अपराधी आपको नहीं देख सकते.

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डिजिटल अरेस्ट (फोटो सौजन्य - इंडियन साइबर कोऑर्डिनेशन सेंटर)

सवाल जागरूकता का नहीं, डर की उस एक कॉल का है

डिजिटल अरेस्ट के खिलाफ लगातार अभियान चल रहे हैं. सरकारी एजेंसियां चेतावनी दे रही हैं. मीडिया मामले सामने ला रहा है. इसके बावजूद ठगी का कारोबार जारी है. इसका सबसे बड़ा कारण साइबर अपराधियों का मनोवैज्ञानिक खेल है. एक फोन कॉल, सरकारी अधिकारी की फर्जी पहचान, गिरफ्तारी का डर, करोड़ों के घोटाले में फंसाने की धमकी और परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी - इन सबको मिलाकर ऐसा माहौल तैयार किया जाता है कि पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी कुछ समय के लिए अपना विवेक खो बैठते हैं.

इसलिए डिजिटल अरेस्ट से बचने का सबसे बड़ा नियम बिल्कुल साफ है - सरकारी एजेंसी का नाम सुनकर डरना नहीं है, पहले सत्यापन करना है, फिर कोई कदम उठाना है. यह हमेशा याद रखें कि डिजिटल अरेस्ट कोई कानून नहीं, साइबर अपराधियों का डर पैदा करने वाला हथकंडा है.

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