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चारधाम यात्रा में इकट्ठा हो चुका 288 टन कचरा, केदारनाथ में सबसे ज्यादा, जानें क्या है 'कैरी मी बैक' अभियान

वर्तमान चारधाम यात्रा में अबतक 29 लाख से ज्यादा श्रद्धालु आ चुके हैं. लोग अपने पीछे प्लास्टिक और ठोस कचरा छोड़ रहे हैं.

CHARDHAM PLASTIC AND SOLID WASTE
चारधाम यात्री अपने पीछे ढेर सारा कूड़ा छोड़ जा रहे हैं (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : June 4, 2026 at 2:55 PM IST

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Updated : June 4, 2026 at 4:45 PM IST

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देहरादून: चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालुओं के बीच हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्लास्टिक और ठोस कचरे ने नई चिंता खड़ी कर दी है. यात्रा सीजन के शुरुआती डेढ़ महीने में ही चारधाम क्षेत्रों से 288 टन से अधिक कचरा एकत्र किया गया है. बढ़ते पर्यावरणीय खतरे के बीच केदारनाथ में अब 'कैरी मी बैक' अभियान शुरू किया गया है, जिसके तहत श्रद्धालुओं को अपना कचरा वापस साथ लेकर आने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड के साथ लग रहे कूड़े के ढेर: उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस वर्ष भी आस्था के नए रिकॉर्ड बना रही है. पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस यात्रा सीज़न अब तक दो महीने में 29 लाख से ज्यादा यात्री चारधाम यात्रा पर आ चुके हैं. लाखों श्रद्धालु बाबा केदार, बदरी विशाल, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए हिमालय की ओर रुख कर रहे हैं. लेकिन श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के साथ हिमालयी पर्यावरण पर पड़ रहा दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है.

'कैरी मी बैक' अभियान (Etv Bharat)

प्लास्टिक और ठोस कचरा बना चिंता का कारण: यात्रा मार्गों और धाम क्षेत्रों में जमा हो रहा प्लास्टिक तथा अन्य ठोस कचरा अब प्रशासन, पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है. हाल ही में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के लेकर वहां की नगर और जिला पंचायतों की ओर से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, यात्रा सीजन की शुरुआत से मई माह के अंत तक चारधाम यात्रा क्षेत्रों से लगभग 288 टन कचरा एकत्र किया जा चुका है. इनमें प्लास्टिक बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन, डिस्पोजेबल सामग्री और अन्य ठोस अपशिष्ट शामिल हैं.

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चारधाम में निकले कचरे को ट्रक से ले जाया जा रहा है (Etv Bharat)

केदारनाथ और यात्रा मार्ग पर सबसे ज्यादा कचरा: सबसे अधिक कचरा केदारनाथ धाम और उसके यात्रा मार्ग से सामने आया है. केदार धाम से ही अकेले 120 टन से अधिक कचरा एकत्र होने की जानकारी सामने आई है. इसके अलावा यमुनोत्री से 80 टन, गंगोत्री से 70 टन और बदरीनाथ से करीब 10 टन कचरा निकला है. यह आंकड़े सभी धामों में वहां स्थानीय निकायों द्वारा कलेक्ट किये जाने वाले कूड़े के हैं, जिसे ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों से नीचे लाया जा रहा है.

हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी पर बढ़ता खतरा: जैसा कि हम सब जानते हैं उत्तराखंड के चारों धाम और इनके यात्रा मार्ग देश के सबसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में आते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में छोड़ा गया प्लास्टिक वर्षों तक नष्ट नहीं होता. धीरे-धीरे यह कचरा मिट्टी, जल स्रोतों और वन्यजीवों को प्रभावित करता है.

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कचरा इकट्ठा करते सफाई कर्मी (Etv Bharat)

प्लास्टिक कचरे से पर्यावरणीय संकट गहराया: यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में उपयोग होने वाली प्लास्टिक पानी की बोतलें, स्नैक्स पैकेट, चाय-कॉफी के डिस्पोजेबल कप और अन्य सामग्री कचरे का बड़ा हिस्सा बनती हैं. कई बार यह कचरा रास्तों, पहाड़ियों और नदी-नालों के किनारे जमा हो जाता है. बरसात के दौरान यही कचरा जलधाराओं के माध्यम से नदियों तक पहुंच जाता है, जिससे पर्यावरणीय संकट और गहरा हो जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के सिकुड़ने और अनियंत्रित पर्यटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हिमालय के लिए यह अतिरिक्त दबाव भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है.

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चारधाम यात्रा पर आए लोग नदियों को भी प्रदूषित कर रहे हैं (Etv Bharat)

समाधान की तलाश में ‘कैरी मी बैक’ अभियान: बढ़ती समस्या को देखते हुए केदारनाथ में एक नई पहल शुरू की गई है. इसका नाम ‘कैरी मी बैक’ रखा गया है. इस अभियान का उद्देश्य श्रद्धालुओं को पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से सीधे जोड़ना है. इस पहल के तहत केदारनाथ पहुंचने वाले यात्रियों को विशेष कपड़े के बैग उपलब्ध कराए जा रहे हैं. श्रद्धालुओं से अपील की जा रही है कि यात्रा के दौरान उत्पन्न होने वाला प्लास्टिक और अन्य सूखा कचरा इन बैगों में एकत्र करें और वापसी के समय अपने साथ नीचे लेकर आएं. इसके बाद निर्धारित स्थानों पर कचरे का पृथक्करण और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाएगा.

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चारधाम यात्रा में प्लास्टिक कचरा बड़ी समस्या बना हुआ है (Etv Bharat)

ऐसे कम हो सकता है प्लास्टिक कचरा: अभियान से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि यदि प्रत्येक श्रद्धालु अपने हिस्से का कचरा वापस लेकर आए, तो धाम और यात्रा मार्गों में फैलने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है. प्रशासन का कहना है कि पहाड़ों में कचरा प्रबंधन एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है. ऐसे में जनभागीदारी के बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है. अब तक कचरा प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और स्थानीय निकायों पर रहती थी, लेकिन ‘कैरी मी बैक’ अभियान इस सोच को बदलने की कोशिश है.

श्रद्धालुओं और पर्यटकों को हिमालय का संरक्षक बनाने की कोशिश: ‘कैरी मी बैक’ अभियान के तहत श्रद्धालुओं को केवल पर्यटक या यात्री नहीं, बल्कि हिमालय संरक्षण अभियान का सहभागी बनाने का प्रयास किया जा रहा है. यात्रा मार्ग के विभिन्न पड़ावों पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं. यात्रियों को बताया जा रहा है कि जिस हिमालय की गोद में वे दर्शन के लिए पहुंचते हैं, उसकी स्वच्छता और सुरक्षा भी उनकी सामूहिक जिम्मेदारी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह अभियान प्रभावी रूप से लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में चारधाम यात्रा मार्गों पर प्लास्टिक कचरे की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

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गंगोत्री में लोग भागीरथी में बहा रहे पुराने कपड़े (Etv Bharat)

288 टन कचरा चिंता का विषय, लेकिन उससे बड़ा सवाल उसके निस्तारण का: प्रसिद्ध पर्यावरणविद हेमंत ध्यानी का कहना है कि-

चारधाम यात्रा के दौरान सामने आया 288 टन कचरे का आंकड़ा निश्चित रूप से चिंता बढ़ाने वाला है. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस कचरे का अंतिम निस्तारण कैसे हो रहा है. चारों धामों सहित पूरे उच्च हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता प्लास्टिक कचरा एक विकराल समस्या बन चुका है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस समस्या को लेकर अब तक कोई व्यापक और प्रभावी नियामक व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकी है.
- हेमंत ध्यानी, पर्यावरणविद् -

वाहनों की जांच जरूरी: हेमंत ध्यानी के अनुसार हर वर्ष हजारों वाहन और लाखों लोग हिमालयी क्षेत्रों की ओर जाते हैं, लेकिन यह जांच शायद ही कभी होती हो कि वाहनों में कचरा संग्रहण की कोई व्यवस्था है या नहीं. उन्होंने कहा कि पर्यटकों और श्रद्धालुओं को भी कचरा प्रबंधन को लेकर पर्याप्त दिशा-निर्देश नहीं दिए जाते. जागरूकता अभियान और प्रचार-प्रसार का भी अभाव दिखाई देता है. हेमंत ध्यानी ने कहा कि-

वर्षों से चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ते कचरे पर चर्चा होती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई दीर्घकालिक रणनीति अभी तक दिखाई नहीं दी है. 288 टन कचरा एकत्र होने की सूचना के साथ यह जानकारी भी सामने आनी चाहिए कि इसमें से कितना कचरा वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया गया और कितना अब भी घाटियों तथा खुले क्षेत्रों में पड़ा हुआ है.
- हेमंत ध्यानी, पर्यावरणविद् -

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की कमी भी बड़ी चुनौती, आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी: हेमंत ध्यानी का कहना है कि उत्तराखंड के चारों धाम जिन नगर निकायों के अंतर्गत आते हैं, वहां आज भी प्रभावी सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का अभाव है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तरकाशी जैसे महत्वपूर्ण जनपद में भी कचरे के प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था नहीं है. उनके अनुसार यात्रा सीजन हो या ऑफ सीजन, बड़ी मात्रा में कचरा नदी किनारों और खुले क्षेत्रों में डंप किया जाता है. बाद में जब तेज बारिश या बाढ़ जैसी स्थिति बनती है तो यही कचरा नदियों में बह जाता है और पर्यावरणीय संकट को और गंभीर बना देता है.

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सफाई कर्मी बड़ी मेहनत से चारधाम यात्रा मार्गों की सफाई कर रहे हैं (Etv Bharat)

हेमंत ने कहा कि कई बार स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों द्वारा आवाज उठाने पर प्रशासन अस्थायी कार्रवाई करता है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अभी तक नहीं दिखाई दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी से भी जुड़ी हुई है. यदि यात्रा को दीर्घकालिक और पर्यावरण अनुकूल बनाना है तो सरकार, प्रशासन, स्थानीय समुदाय और श्रद्धालुओं को मिलकर काम करना होगा.

‘कैरी मी बैक’ से कम होगा कचरा: ‘कैरी मी बैक’ जैसे अभियान इस दिशा में एक सकारात्मक शुरुआत माने जा रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसके साथ मजबूत कचरा प्रबंधन नीति, सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट, सख्त निगरानी और व्यापक जनजागरूकता अभियान भी जरूरी हैं. चारधाम यात्रा में उमड़ रही आस्था के बीच अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हिमालय की पवित्रता और प्राकृतिक विरासत को कैसे सुरक्षित रखा जाए. क्योंकि यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा हिमालय के लिए एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है.
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Last Updated : June 4, 2026 at 4:45 PM IST