हिमालयी राज्यों के लिए उत्तराखंड में पहला प्रयोग, किसानों के लिए बन रहा कार्बन क्रेडिट फॉर्मूला, जानें फायदे
किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक नई पहल शुरू होने जा रही है. ऐसा करने वाला उत्तराखंड पहला हिमालयी राज्य होगा. रिपोर्ट- नवीन उनियाल

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : July 6, 2026 at 3:12 PM IST
देहरादून: उत्तराखंड में रिवर बेसिन (जहां किसी मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों का पानी बहकर एक साथ मिलता है) पर किसानों को कार्बन क्रेडिट कमाने का मौका मिलने जा रहा है. हालांकि यह प्रोजेक्ट अभी अध्ययन के स्तर पर ही पहुंचा है, लेकिन भारत सरकार की संस्था की तरफ से अध्ययन होने के बाद कार्बन क्रेडिट के फार्मूले पर ये काम शुरू किया जा सकेगा.
अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा: जल स्रोतों के संरक्षण, नदी बेसिन के पुनर्जीवन और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्तराखंड में एक नई पहल शुरू होने जा रही है. राज्य में पहली बार ऐसा मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिसके तहत नदी बेसिन क्षेत्रों में हरित गतिविधियों से जुड़े किसानों और ग्रामीणों को कार्बन क्रेडिट के जरिए अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा. यदि यह योजना सफल रहती है तो उत्तराखंड हिमालयी राज्यों में इस तरह का प्रयोग करने वाला पहला राज्य बन जाएगा. फिलहाल यह पहल अध्ययन और तकनीकी व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी) के चरण में है.
अध्ययन पूरा होने के बाद यह तय होगा कि किन गतिविधियों के माध्यम से कार्बन क्रेडिट तैयार किए जा सकते हैं और किसानों को इसका आर्थिक लाभ किस तरह मिलेगा. इस पूरी कवायद का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि किसानों के लिए आय का एक नया और स्थायी स्रोत तैयार करना भी है.
SARA कर रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम: राज्य सरकार की एजेंसी स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARA) इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रही है. इसके तहत नदी क्षेत्रों में कार्बन क्रेडिट आधारित मॉडल विकसित किया जाएगा. सबसे पहले सोंग नदी बेसिन, जो देहरादून और टिहरी गढ़वाल जिलों से जुड़ा है, को इस परियोजना के लिए चुना गया है.
जानिए कैसे होगी कार्बन उत्सर्जन की भरपाई: योजना का मूल उद्देश्य नदी बेसिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हरित आवरण (हरियाली) विकसित करना, जल स्रोतों का संरक्षण करना और ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देना है, जिनसे वातावरण में कार्बन का अवशोषण (सोख से) बढ़े. जब किसी क्षेत्र में पौधरोपण, हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) निर्माण, जल संरक्षण और पर्यावरण सुधार जैसे कार्य होते हैं, तो उनसे कार्बन उत्सर्जन की भरपाई होती है. इसी आधार पर कार्बन क्रेडिट तैयार किए जाते हैं.
बाद में इन कार्बन क्रेडिट को उन उद्योगों या संस्थानों को बेचा जा सकता है, जिन्हें अपने कार्बन उत्सर्जन की भरपाई करनी होती है. इससे किसानों और स्थानीय समुदाय को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलेगा. यानी किसान केवल खेती से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जरिए भी आय अर्जित कर सकेंगे.
उत्तराखंड पहला हिमालयी राज्य होगा: देश के कुछ अन्य राज्यों में कार्बन क्रेडिट आधारित परियोजनाओं पर पहले भी काम हुआ है, लेकिन हिमालयी राज्यों में नदी बेसिन आधारित इस तरह का मॉडल पहली बार उत्तराखंड में विकसित किया जा रहा है.
पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, जल स्रोतों और जंगलों को देखते हुए यह मॉडल भविष्य में अन्य हिमालयी राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है. हिमालयी क्षेत्रों में जल स्रोतों का संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाना जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसे में यदि पर्यावरण संरक्षण को सीधे किसानों की आय से जोड़ दिया जाए तो स्थानीय लोगों की भागीदारी भी खुद बढ़ेगी.
यह है कार्बन क्रेडिट मॉडल कार्बन क्रेडिट मॉडल एक बाजार आधारित प्रणाली है. इसका उद्देश्य ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है, जहां एक कार्बन क्रेडिट एक टन कार्बन डाइआक्साइड या उसके समतुल्य उत्सर्जन में कमी या हटाए जाने का प्रतिनिधित्व करता है. जिसे परमिट के रूप में खरीदा-बेचा जाता है. जिससे कंपनियों और देशों को उत्सर्जन कम करने या आफसेट करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन मिलता है. यह मॉडल कंपनियों को स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश करने और स्थायी प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद मिलती है. |
NABCON कर रही तकनीकी अध्ययन: सोंग नदी बेसिन परियोजना के लिए NABCON (नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज) को तकनीकी व्यवहार्यता अध्ययन की जिम्मेदारी दी गई है. यह संस्था लंबे समय से कार्बन क्रेडिट और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर कार्य करती रही है.
SARA और NABCON के बीच अनुबंध हो चुका है और संस्था ने अध्ययन शुरू कर दिया है. अगले एक से दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट SARA को सौंपे जाने की संभावना है. इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाएगा कि नदी बेसिन क्षेत्र में किन-किन गतिविधियों के जरिए कार्बन क्रेडिट उत्पन्न किए जा सकते हैं और उनका आर्थिक मॉडल किस प्रकार विकसित होगा.
पौड़ी जिले में भी अलग परियोजना: सोंग नदी परियोजना के अलावा पौड़ी जिले के लिए भी एक अलग कार्बन क्रेडिट परियोजना तैयार की जा रही है. यह परियोजना खुले बाजार में कार्बन क्रेडिट से जुड़ी संभावनाओं का आकलन करेगी. इसके लिए कोर कार्बन (Core Carbon) नामक विशेषज्ञ कंपनी को फीजिबिलिटी स्टडी का जिम्मा सौंपा गया है.
अध्ययन के दौरान पौड़ी जिले के विभिन्न क्षेत्रों में जल स्रोतों के पुनर्जीवन, हरित गतिविधियों और कार्बन क्रेडिट की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा. यदि अध्ययन सफल रहता है तो यहां भी ग्रामीणों और किसानों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा.
किसानों को मिलेगा लाभ: इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलने वाला है. एक ओर नदी किनारे और जलागम क्षेत्रों में विकसित होने वाली हरित पट्टियों से खेती और बागवानी को मजबूती मिलेगी. वहीं दूसरी ओर कार्बन क्रेडिट बेचकर किसानों की अतिरिक्त कमाई भी होगी. यह मॉडल खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा देगा. स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ने से जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के कार्यों में तेजी आएगी, जिसका सीधा असर भूजल स्तर और सिंचाई व्यवस्था पर भी पड़ेगा.
इस पूरी पहल का उद्देश्य केवल कार्बन क्रेडिट तैयार करना नहीं, बल्कि नदी बेसिन क्षेत्रों में सर्कुलर इकोनॉमी विकसित करना है. यानी पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों का पुनर्जीवन, हरित क्षेत्र का विस्तार और किसानों की आय, इन सभी को एक-दूसरे से जोड़कर ऐसा आर्थिक मॉडल तैयार करना, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ मिले.
यदि यह मॉडल सफल होता है तो भविष्य में राज्य की अन्य नदियों और जलागम क्षेत्रों में भी इसे लागू किया जा सकता है. इससे उत्तराखंड में जल संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है. फिलहाल सभी की नजरें तकनीकी अध्ययन रिपोर्ट पर टिकी हैं.
NABCON की रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि सोंग नदी बेसिन में कौन-कौन से प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकते हैं और किस तरह किसानों को कार्बन क्रेडिट से जोड़ा जाएगा. इसी आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार होगी.
यह परियोजना किसानों और ग्रामीणों के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकती है. उनके अनुसार कार्बन क्रेडिट आधारित मॉडल से किसानों को पहली बार पर्यावरण संरक्षण के बदले आर्थिक लाभ मिलेगा. इससे न केवल खेती अधिक टिकाऊ बनेगी, बल्कि जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन में भी स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होगी
-कहकशां नसीम ACEO, SARA-
यदि अध्ययन के नतीजे सकारात्मक रहे तो उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल होगा, जहां पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कार्बन क्रेडिट को व्यवहारिक रूप से लागू किया जाएगा. हिमालयी राज्यों में यह अपनी तरह की पहली पहल होगी, जो भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का नया मॉडल बन सकती है.
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