Explainer: 'बस 3 दिन.. 700 घरों में नहीं जलेंगे चूल्हे', क्या बक्सर इथेनॉल प्लांट बंद हो जाएगा?
क्या बिहार में इथेनॉल उद्योग बंद होने वाला है? प्लांट मालिक क्यों ऐसा करने को मजबूर हैं? पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट..

Published : February 6, 2026 at 7:35 PM IST
रिपोर्ट: उमेश कुमार पांडेय
बक्सर: पिछले दिनों बिहार के बक्सर स्थित एक इथेनॉल कंपनी के मालिक ने वीडियो बनाकर अपना दर्द साझा किया था. उन्होंने सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए अपने प्लांट को बंद करने का ऐलान कर दिया था. अगर यह फैक्ट्री बंद होती है तो 700 कामगार बेरोजगार हो जाएंगे. उनके घरों में चूल्हा जलना भी बंद हो जाएगा.
ऐसी नौबत सिर्फ इस एक प्लांट की नहीं है, बल्कि राज्य के दर्जनभर प्लांट की यही स्थिति है. सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस बिहार को इथेनॉल हब बनाने के लिए पीएम मोदी से लेकर सीएम नीतीश कुमार ने बड़े-बड़े दावे किए थे, उसी राज्य में उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गया है.
क्या बंद हो जाएगा इथेनॉल प्लांट?: बक्सर जिले के नावानगर प्रखंड में बियाडा की जमीन पर खड़ा भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड आज सिर्फ एक औद्योगिक इकाई नहीं, बल्कि सैकड़ों मजदूरों के टूटते सपनों की गवाही बन चुका है. जिस प्लांट से इलाके में विकास, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक रोजगार की उम्मीदें जुड़ी थीं, वही अब तीन दिन बाद बंद होने की कगार पर खड़ा है. उत्पादन की खरीद अचानक घटाकर मात्र 50 प्रतिशत कर दिए जाने से प्लांट की आर्थिक रीढ़ टूटती नजर आ रही है.

कामगारों के रोजगार पर संकट: इस इथेनॉल प्लांट की स्थापना साल 2021 में हुई थी. इसकी स्टोरेज क्षमता 30 लाख लीटर है. हालांकि सप्लाई कम होने के कारण 29 लाख लीटर एथनॉल स्टोर है. प्रतिदिन 100 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन होता था लेकिन सप्लाई में 50 प्रतिशत कटौती होने के बाद से उत्पादन में भी 50 प्रतिशत की कटौती हुई है. जिसके कारण कुछ सप्लाई यूनिट में काम करने वाले वर्कर काम से वंचित हैं.

भविष्य को लेकर कामगार चिंतित: कभी दिन-रात गूंजने वाली मशीनों की आवाज अब धीमी पड़ती जा रही है. फैक्ट्री परिसर में पसरी खामोशी मजदूरों के दिलों में उठते तूफान की कहानी कह रही है. 700 से अधिक कर्मचारी और मजदूर, जिनके घरों का चूल्हा इसी प्लांट से जलता है, आज अनिश्चित भविष्य के डर से सहमे हुए हैं. बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया और बूढ़े मां-बाप की दवाइयां, सब कुछ सवालों के घेरे में आ गया है.

सीएमडी ने साझा किया था दर्द: 4 फरवरी को कंपनी के मालिक अजय सिंह ने सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर प्लांट बंद करने की घोषणा कर दी. 4 मिनट 52 सेकेंड के वीडियो पोस्ट में उन्होंने कंपनी बंद करने की मजबूरी, सरकार की गलत नीति और उपेक्षा का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि जिस टैंक में हम इथेनॉल भरते हैं, अब उसे खरीदने से सरकार ने मना कर दिया है. ऐसे में हम क्या करेंगे? 600-700 लोगों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है. हम मजबूर हैं.
"पटना, दिल्ली और मुंबई स्थित पेट्रोलिंग कार्यालय जा रहे हैं लेकिन कोई हमारा इथेनॉल खरीदने को तैयार नहीं है. सरकार ने हमें मझधार में छोड़ दिया है. इस प्लांट से सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि 700 परिवारों का घर चलता है. ऐसे में सरकार इस समस्या का हल निकाले या कह दे कि आप प्लांट बंद कर दें."- अजय सिंह, सीएमडी, भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड

प्लांट बंद करना हमारी मजबूरी: प्लांट के प्रोडक्शन मैनेजर पंकज कुमार सिंह बताते हैं कि स्टोरेज क्षमता फुल हो चुकी है और सरकार से 100 प्रतिशत सप्लाई की अनुमति नहीं मिलने पर उत्पादन आधा करना पड़ा है. अगर जल्द अनुमति नहीं मिली तो प्लांट बंद करना मजबूरी होगी. यह सिर्फ एक फैक्ट्री पर ताला नहीं होगा, बल्कि सैकड़ों घरों में अंधेरा उतर आएगा.

'फिर से प्रवासी बनना होगा': वहीं, एचआर विभाग में कार्यरत प्रदीप सिंह की पीड़ा हर बिहारी मजदूर की कहानी है. 20 साल गुजरात में काम करने के बाद उन्हें अपने ही गांव के पास रोजगार मिला था. वे कहते हैं कि वर्षों तक बाहर ही काम करते रहे. जब यह कंपनी खुली तो घर के आसपास रहने का मौका मिला. अब अगर प्लांट बंद हुआ तो फिर से पलायन करना पड़ेगा.
"दूसरे प्रदेशों में बिहारी होना कितना अपमानजनक होता है. यह वही जानता है, जो वहां मजदूरी करता है. इस प्लांट ने हमें सम्मान दिया था. अब अगर यह बंद हुआ तो जीवन जीने के लिए फिर वही परदेस, वही जिल्लत, वही संघर्ष का सामना करना होगा."- प्रदीप सिंह, एचआर, इथेनॉल प्लांट

'हमारा रोजगार मत छीनो': भोजपुर जिले के सुजीत कुमार, जो मध्यप्रदेश छोड़कर बक्सर आए थे, उनका भी यही दर्द है. वे कहते हैं कि बच्चों के साथ रहकर काम करने की खुशी शब्दों में नहीं बताई जा सकती. हफ्ते में एक दिन पूरा परिवार साथ होता था. अब सब खत्म होने वाला है. चुनाव के समय कहा गया था कि बिहार में रोजगार आएगा लेकिन आज वही रोजगार छीना जा रहा है.
"परिवार और बच्चों के साथ रहते हैं लेकिन अब फिर से बाहर जाना पड़ेगा. सरकार रोजगार तो दे नहीं रही है, उल्टे हमारी रोजी-रोटी बंद किया जा रहा है. सरकार से यही कहेंगे कि हमारा रोजगार मत छीनिये."- सुजीत कुमार, कामगार

बिहार के साथ सौतेला व्यवहार क्यों?: वहीं, पीआरओ जितेंद्र शर्मा बताते हैं कि जहां कभी जंगल-झाड़ और डर का माहौल था, वहां इस प्लांट ने विकास का इतिहास रच दिया. जमीन के दाम बढ़े, सड़कें बनीं, दुकानें खुलीं और इलाके की तस्वीर बदल गई. वे सवाल उठाते हैं कि जब अन्य राज्यों में सप्लाई जारी है तो बिहार के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों?
इथेनॉल कंपनी का आरोप: नावानगर स्थित भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों का कहना है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसीएस) के साथ 10 साल के लॉन्ग टर्म ऑफटेक एग्रीमेंच पर आधारित है, इसके बावजूद 2025-26 के वार्षिक इथेनॉल टेंडर में भारी कटौती करना और डीईपी प्लांट्स को प्राथमिकता सूची में तीसरे स्थान पर रखना उचित नहीं है. यह एक तरह से पहले से हुए एग्रीमेंट के भी खिलाफ है.

क्यों आई ऐसी स्थिति?: असल में तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने इथेनॉल की खरीद 50% तक सीमित कर दी है. ध्यान देने वाली बात ये है कि बिहार के इथेनॉल प्लांट से उत्पादित ज्यादातर हिस्सा तेल कंपनियों को बेचा जाता है. अब अगर तेल कंपनियां 50% से कम इथेनॉल खरीदती है तो जाहिर है कि इससे भारी नुकसान होगा. ऐसे में प्लांट के मालिक के सामने बंद करने के लिए अलावे दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार से इनको किसी तरह की मदद की पेशकश हुई है.

सांसद ने पीएम मोदी को लिखा पत्र: इथेनॉल प्लांट की समस्या को लेकर स्थानीय आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने पीएम मोदी को पत्र भी लिखा है. जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की है कि इथेनॉल आवंटन नीति की तत्काल समीक्षा की जाए.

उद्योग मंत्री ने दिया आश्वासन: हालांकि बिहार सरकार के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल ने केंद्र सरकार से बात करने और इथेनॉल खरीद को 100 फीसदी करने का भरोसा दिलाया है. उन्होंने कहा कि इथेनॉल उद्योग को बचाने के लिए राज्य सरकार इसको लेकर केंद्र सरकार से बात करेगी.
सीएम ने लिया था जायजा: खास बात ये भी है कि जिस इलाके में यह इथेनॉल प्लांट है, वहां राज्य सरकार ने 109 करोड़ की लागत से 125 एकड़ में स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने की घोषणा की है. हाल में ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसका निरीक्षण किया था. उनके दौरे के चंद दिनों बाद इस इथेनॉल प्लांट के बंद होने से सरकार की उद्योग नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा हो सकता है.

किससे बनता है इथेनॉल?: इसे बनाने में कई प्राकृतिक चीजों का उपयोग होता है. मोलासेस यानी छोआ, गन्ना का जूस और क्षतिग्रस्त ग्रेन जैसे गेहूं, चावल का टुकड़ा और मक्का. बिहार में गेहूं, चावल, मक्का और गन्ना की उपलब्धता है, इसलिए इथेनॉल प्लांट लगाने के हिसाब से बिहार मुफीद जगह है लेकिन नई इथेनॉल पॉलिसी के कारण न केवल प्लांट के मालिक और कामगार बल्कि किसान खासकर मक्का उत्पादक परेशान हैं.

इथेनॉल का उपयोग: इथेनॉल का इस्तेमाल मुख्य रूप से ईंधन, दवाई, मेकअप सामग्री और अन्य उद्योग उत्पादकों के निर्माण में होता है. प्रदूषण कम होने की वजह से केंद्र सरकार ने पेट्रोल में 20 फीसदी तक इथेनॉल मिलाने की अनुमति दी है.
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