DU के रामजस कॉलेज की लैब में रिसर्च से तैयार हुए गाय के गोबर से बटन, प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प;देखें रिपोर्ट
‘गाय के गोबर से बटन’: रामजस कॉलेज की गौधन रिसर्च लैब में तैयार हो रहा प्लास्टिक बटन का देसी विकल्प

Published : April 6, 2026 at 5:32 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में गाय के गोबर से बटन तैयार किए जा रहे हैं. जो प्लास्टिक का एक बड़ा विकल्प साबित हो सकते हैं, साथ ही फैशन इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव भी ला सकते हैं. ऐसा रिसर्च कर रहे प्रोफेसर और उनकी टीम का मानना है.
रामजस कॉलेज में केमेस्ट्री की गौधन रिसर्च लैब में पर्यावरण के अनुकूल गाय के गोबर से बटन तैयार किये जा रहे हैं, जो प्लास्टिक के विकल्प के रूप में भविष्य में फैशन और टेक्सटाइल इंडस्ट्री में नई क्रांति ला सकते हैं. इस पहल का नेतृत्व गौधन रिसर्च लैब की प्रमुख और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शुचि वर्मा कर रही हैं, जिनका लक्ष्य है देश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाए जाएं और प्लास्टिक पर निर्भरता कम की जाए.
इतिहास से निकला आधुनिक समाधान
डॉ. शुचि वर्मा ने बताया कि प्रधानमंत्री मेमोरियल की लाइब्रेरी में शोध के दौरान 1800 के दशक की एक कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही पढ़ी, जिसमें भारत में पॉलिमर और प्लास्टिक पर शुरुआती चर्चा हुई थी. उन्होंने पाया कि जब प्लास्टिक भारत में आया तो उसका पहला उत्पाद बटन था. उन्होंने बताया कि इससे पहले बटन लकड़ी, कॉर्क और एल्यूमिनियम जैसे प्राकृतिक या धातु से बनाए जाते थे. यहीं से मन में विचार आया कि जिस तरह प्लास्टिक ने पुराने बटनों की जगह ली थी, उसी तरह अब समय आ गया है कि एक बार फिर प्राकृतिक संसाधनों से बने बटन प्लास्टिक के बने बटन को रिप्लेस करें.
बटन क्यों बना पहला उत्पाद
बटन एक ऐसा उत्पाद है जिसकी मांग हर घर, हर व्यक्ति और हर तरह के कपड़ों में होती है. चाहे वह शर्ट, पैंट, कुर्ता, जैकेट या डिजाइनर ड्रेस हो, बटन हर जगह जरूरी हैं. इसकी विशाल बाजार क्षमता को देखते हुए इसे प्रोजेक्ट का पहला उत्पाद चुना गया. अगर बटन जैसे छोटे लेकिन व्यापक उपयोग वाले उत्पाद को प्लास्टिक मुक्त बनाया जा सके तो यह बड़े स्तर पर पर्यावरणीय बदलाव ला सकता है- डॉ. शुचि वर्मा
कैसे तैयार किए जाते हैं ‘गोबर बटन’:
डॉ. शुचि वर्मा ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में गाय के गोबर को मुख्य कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. तैयार बटन में लगभग 80% हिस्सा गोबर का होता है और 20% हिस्सा हार्डनिंग एजेंट का होता है, जो बटन को मजबूती देता है. उन्होंने बताया कि कुछ वैरिएंट्स में 90% तक गोबर का उपयोग किया गया है, जिससे उन्हें एक अलग 'ट्राइबल लुक' मिलता है. उन्होंने बताया कि गोबर को पहले प्रोसेस कर पाउडर या राख में बदला जाता है, फिर उसे विशेष तकनीक से मोल्ड में डालकर बटन का आकार दिया जाता है.

डॉ. शुचि वर्मा ने बताया कि इन बटनों को बाजार में लाने से पहले कई वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे, जिनमें हार्डनेस और टिकाऊपन, गर्म और ठंडे पानी में व्यवहार, टूटने की क्षमता और कपड़े धोने के दौरान सहनशीलता को शामिल किया गया हैं. उन्होंने बताया कि इन सभी परीक्षणों की रिपोर्ट तैयार कर, उत्पाद के साथ उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे उपभोक्ताओं को इसकी गुणवत्ता पर पूरा भरोसा हो.

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम
शुचि वर्मा ने बताया कि गाय के गोबर से मीथेन (CH4) गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज का एक बड़ा कारण है. उन्होंने बताया कि अगर गोबर को उपयोग में लाकर उत्पाद बनाए जाएं, तो मीथेन उत्सर्जन कम किया जा सकता है, पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है. उन्होंने बताया कि इससे “कार्बन क्रेडिट” के जरिए आर्थिक लाभ भी संभव है, जो भविष्य में इस प्रोजेक्ट को और मजबूत बना सकता है.
गौशालाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा
भारत में गाय का गोबर बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन उसका उपयोग सीमित है. इस तकनीक के जरिए गौशालाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किया जा सकता है, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और कचरे को संसाधन में बदला जा सकता है. डॉ. शुचि ने बताया कि यह पहल 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल का एक बेहतरीन उदाहरण बन सकती है.
लागत और बाजार की संभावनाएं
डॉ. शुचि ने बताया कि यह बटन हैंडमेड तरीके से बनाए जा रहे हैं, जिससे इनकी लागत करीब 2.5 रुपये प्रति बटन आ रही है. हालांकि बाजार में प्लास्टिक बटन सस्ते मिलते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने पर लागत कम हो सकती है. पर्यावरण के प्रति जागरूक उपभोक्ता इन्हें प्राथमिकता दे सकते हैं और भविष्य में यह टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव ला सकता है.
पेटेंट की दिशा में बढ़ते कदम
इस इनोवेशन के लिए पेटेंट प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. डॉ. शुचि वर्मा ने बताया कि जल्द ही इस तकनीक को पेटेंट मिल जाएगा, जिससे इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकेगा और देश-विदेश में इसका विस्तार संभव होगा.
युवा सोच से मिल रहा नया आयाम
इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही छात्रा दिव्यानी ने बताया कि गोबर के पाउडर और उसकी राख का इस्तेमाल कर अलग-अलग प्रकार के बटन तैयार किए हैं. हार्डनिंग एजेंट की मात्रा कम रखते हुए भी मजबूत बटन बनाने का प्रयास किया गया है. बटन पूरी तरह प्राकृतिक हैं. उन्होंने बताया कि प्रयोग के दौरान कई नए टेक्सचर और डिजाइन भी सामने आए हैं.
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