कमाल का जज्बा! बचपन में कट गए दोनों हाथ, पैरों से पलटी बाजी, टीचर बन बिहार के बृजेश संवार रहे बच्चों की जिंदगी
पैरों से लिखी बृजेश की राइटिंग देखते ही बनती है. वे पिछले 3 सालों से शिक्षा की अलख जगा रहे है. पढ़ें रत्नेश की रिपोर्ट

Published : June 6, 2026 at 7:20 PM IST
गयाजी: कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो'..दुष्यंत कुमार की लिखी ये पंक्ति बृजेश कुमार पर बिल्कुल सटीक बैठती है. बिहार के गयाजी से हिम्मत, हौसलों और जज्बे की जीती-जागती मिसाल बने हैं बृजेश कुमार. दोनों हाथों से दिव्यांग बृजेश के हौसले कई सालों के संघर्ष के बीच भी जिंदा हैं.
जगा रहे शिक्षा की अलख: बृजेश कुमार के दोनों हाथ नहीं है. पैरों से लिखते हैं, और पैरों से सुंदर राइटिंग देखते ही बनती है. उनके दोनों हाथ एक हादसे के बाद काटने पड़े थे. बृजेश पिछले 3 सालों से गांव में शिक्षा की अलख जगा रहे है. वह दर्जनों बच्चों को रोजाना पढ़ाते हैं.
दोनों हाथों से दिव्यांग हैं बृजेश: गयाजी के केंदुआ गांव के रहने वाले बृजेश के दोनों हाथ नहीं है. लेकिन उन्होंने संघर्ष और हिम्मत के बूते हार नहीं मानी. उनका हौसला आज उदाहरण है समाज के उन लोगों के लिए जो जरा-सी परेशानियों से थक कर हार मान लेते हैं. बृजेश हजारों दिव्यांगों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत हैं. दोनों हाथ के बिना बृजेश वह सब कुछ कर रहे हैं, जो उन जैसे कई लोगों के लिए शायद सपना लगे.
'जहां चाह वहां राह' की कहावत चरितार्थ: बृजेश के कई ऐसे काम हैं जो सामने वाले को आश्चर्यचकित कर देते हैं. वे दोनों पैर से मोबाइल चला सकते हैं, लिख सकते हैं. इसके अलावा वे कटे हाथ के जरिए ही व्हाईट बोर्ड पर लिख भी सकते हैं. इसके लिए भी जो तरकीब उन्होंने लगाई है वो 'जहां चाह वहां राह' की कहावत को चरितार्थ करती है.
पैरों से चलाते हैं फोन: खास बात यह है कि बृजेश पैरों के अलावा अपने मुंह के सहारे और कटे हुए हाथ के सिरे की मदद से मोबाइल का बेहतर तरीके से संचालन कर सकते हैं. वह न सिर्फ मोबाइल से कॉल लगा कर बात करते हैं, बल्कि युट्यूब भी चला सकते हैं, किसी का फोन आने पर उसे रिसीव कर सकते हैं.

किसी सहारे की जरूरत नहीं: एक सामान्य इंसान अपने हाथों से जितनी सरलता से और जिस तरह से अपने मोबाइल का इस्तेमाल करेगा बृजेश भी उसी सहजता से अपने फोन का इस्तेमाल कर लेते हैं. वह संबंधित ऐप का उपयोग कर उसकी सुविधा का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं होती है.
गजब का हौसला और जोश: बृजेश की कहानी बस इतनी सी नहीं है. उनकी हर गतिविधि में गजब का हौसला और जोश नजर आता है. अब बृजेश ने दिव्यांग हाथ के अंतिम सिरे को शिक्षा की अलख जगाने का हथियार बना लिया है. इससे वे गरीब तबके के सैकड़ो बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं. बृजेश व्हाईट बोर्ड पर पढ़ाते भी है.
बोर्ड पर लिखकर पढ़ाते हैं: हालांकि कईयों के मन में अब ये सवाल उठ सकता है कि जिस इंसान के पास दोनों हाथ नहीं हैं वो भला कैसे व्हाईट बोर्ड पर पढ़ाता होगा? पर यह हकीकत है कि दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद भी वह बोर्ड पर लिखकर और बोलकर बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं.

निकाली है तरकीब: दरअसल इसके लिए बृजेश ने एक तरकीब निकाली है. वे अपने कटे हाथ के अंतिम सिरे में रबर बंधवाकर उसमें मार्कर लगाते हैं. मार्कर की मदद से वह ब्लैक बोर्ड पर लिखते हैं, और उसी तरह वे बच्चों को पढ़ाते हैं. दिलचस्प नजारा होता जब बृजेश इस तरह लिख-लिख कर गणित के कठिन सवाल हल करते हुए बच्चों को समझाते हैं.
नहीं होती कोई परेशानी: इस दौरान ऐसा लगता है जैसे उन्हें कुछ हुआ ही नहीं हो. पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक के बच्चों को वह निशुल्क पढ़ाने का कार्य करते हैं. उन्हें देखकर लगता है, जैसे उनके हाथ बिल्कुल सही सलामत हों. क्योंकि कटे हाथ के सिरे पर रबर बांधकर पढ़ाने में कहीं से भी उन्हें कोई परेशानी नहीं होती.
चर्चा में रहते हैं बृजेश: अपने क्षेत्र में इन सब कारणों से बृजेश काफी चर्चा में रहते हैं. यह कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि असंभव सी बात प्रतीत होती है. किंतु बृजेश ने हौसलों से यह सब संभव कर दिखाया है और जिस जिंदगी को लोग बोझिल समझते होंगे, उस जिंदगी को संघर्ष के बूते जीतने का जज्बा बना लिया है.
हादसे ने बदली जिंदगी: बृजेश इंजीनियर बनना चाहते हैं. वह शुरू से ही मेधावी छात्र रहे हैं. लेकिन बीच में एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी. मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद अक्टूबर 2015 में एक ऐसी घटना हुई, जिससे बृजेश की जिंदगी ही दांव पर लग गई थी. दरअसल, उन्हें अक्टूबर 2015 में 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया था जिससे वह गंभीर रूप से झुलस गए थे. हादसे के बाद 5 सालों तक उनका इलाज चला.

हाथ काटने की नौबत आई: इस बीच इलाज के दौरान उसके हाथ काटने की नौबत आ गई. उनकी जिंदगी बचाने के लिए ये जरूरी था कि उनके हाथ शरीर से अलग कर दिए जाएं. यही वजह रही, कि बृजेश के दोनों हाथ काटने पड़े. उनकी तकलीफों का सिलसिला यहीं नहीं थमा. उन्हें पैर और सिर में भी काफी गंभीर चोट लगी थी. पूरा शरीर लहूलुहान हो गया था.
हादसे के बावजूद नहीं हारी हिम्मत: इसके बावजूद बृजेश ने हिम्मत नहीं हारी. 5 सालों के लगातार इलाज के बाद उनकी जिंदगी किसी तरह से बचाई गई और इसके बाद उन्होंने जो हौसला दिखाया, वह काबिल-ए-तारीफ है. बृजेश आज दिव्यांगता की वजह से नहीं बल्कि एक हीरो की तरह पहचाने जाते है. वे शुरू से ही इंजीनियर बनना चाहते हैं, हालांकि आर्थिक तंगहाली के बीच अब वे किसी भी तरह की जॉब की तलाश में भी जुटे है.
जगा रहे शिक्षा की अलख: पिछले 3 सालों से बृजेश शिक्षा की अलख जगा रहे हैं. वह दर्जनों बच्चों को रोजाना पढ़ाते हैं. वे अपने पैतृक गांव और ननिहाल के गांवों में बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहे हैं. इस तरह वे न सिर्फ खुद का भविष्य संवारने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि गरीबी तबके के बच्चों का भविष्य बनाने के लिए उन्हें भी निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं. वे पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक के बच्चों को पढ़ाते हैं. यानी खुद परेशानियों से घिरे होने के बावजूद भी वे दूसरों को परेशानियों से निकालने की कोशिश में जुटे हैं.

कर रहे ग्रेजुएशन की पढ़ाई: बृजेश बताते हैं कि उनके पिता मजदूर किसान है. किसी तरह से घर परिवार का गुजारा हो पाता है. मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद अक्टूबर 2015 में हुए हादसे के बाद कई सालों तक उनकी पढ़ाई लिखाई बंद रही. हालांकि दोनों हाथ गंवाने का बावजूद भी वह हिम्मत नहीं हारे. आज 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद वे अभी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं.
इंजीनियर बनने का सपना: बृजेश के मुताबिक परिवार की सबसे बड़ी विकट की स्थिति तब आई, जब उनकी मां भी इस बीच दुनिया से गुजर गई. पिताजी और उनके चार भाई हैं. हालांकि आज कठिन परिस्थितियों से गुजर कर उनकी पढ़ाई फिर से शुरू हो गई है. वे रोजाना मेहनत करते हैं. इंजीनियर बनने का सपना आज भी जिंदा है.
"हम सब कर लेते हैं, फोन चला लेते हैं, लिख लेते हैं. पढ़ा लेते हैं सब कर लेते हैं, कोई दिक्कत नहीं होता है. हमको अफसोस है कि मां को नहीं बचा सके. उसको लेकर बहुत भागा-दौड़ी किए लेकिन नहीं रख पाए उसको." -बृजेश कुमार, दिव्यांग शिक्षक
फॉर्म हो रहे रिजेक्ट: लेकिन घर की आर्थिक परेशानियों के बीच वे कोई भी छोटा मोटा जॉब करने की चाहत रखते हैं, लेकिन किस्मत कहीं न कहीं रूठ जा रही है. वह बताते हैं कि लोग कहते हैं, कि दिव्यांग को छूट मिलती है, लेकिन वह कहता है कि दिव्यांग को छूट नहीं मिलती है. क्योंकि वह जब फॉर्म भरने जाता है, तो उसका फॉर्म रिजेक्ट कर दिया जाता है. उन्हें कहा जाता है कि उनके दोनों हाथ नहीं है. वह कैसे काम कर सकेंगे.
"सब पूछते हैं कौन मेरे साथ रहेगा. हम काम कैसे करेंगे. इसी कारण ये सब कहकर मेरा फॉर्म रिजेक्ट कर दिया जाता है, जिससे कोई नौकरी नहीं मिल पा रही है.जो हमारे फार्म को रिजेक्ट कर देते हैं, उन्हें यह नहीं पता है कि हमारे जैसे इंसान ही इतिहास रचते हैं." -बृजेश कुमार, दिव्यांग शिक्षक
आज भी हिम्मत बरकरार: बृजेश के हौसले की बानगी यह है, कि वह आज भी जरा सा टूटा नहीं है. इतनी बड़ी घटना के बावजूद भी उनके हौसले बुलंद हैं. वह बराबर किसी न किसी नौकरी के लिए फॉर्म भरते रहते हैं. इंजीनियरिंग की तैयारी भी करते है. बृजेश कहते हैं कि वह सरकार का सम्मान करते हैं उसे इस बिंदु पर सहायता मिले.
सपने जरूर पूरे होंगे: बृजेश के मुताबिक वह सिर्फ खाना नहीं खा सकते, बाकी सारे काम वह खुद कर लेते हैं. पैर से मोबाइल चलाते हैं, पैर से लिख लेता हैं. बच्चों को व्हाईट बोर्ड के सहारे अपने दिव्यांग हाथओं के जरिए पढ़ाते हैं. उनके पैर भी हाथ की तरह काम करते हैं. वो कहते है कि उन्होंने इसके लिए लगातार प्रैक्टिस की. उन्हें विश्वास है, कि आज न तो कल उनके सपने जरूर पूरे होंगे. बस सरकार एक बार जरुर गौर करें.
नोट: ईटीवी भारत संवाददाता ने अभिभावकों से जानकारी और सहमति प्राप्त करने के बाद ही बच्चों से बात की है.
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