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'जैव-समृद्ध खाद बनाने से रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल कम करने में मिलेगी मदद'

इसमें 10 से ज़्यादा जरूरी पोषक तत्व होते हैं जो फसलों और पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं. चंचल मुखर्जी की रिपोर्ट...

Dr. Bhupendra Singh
डॉ. भूपेंद्र सिंह (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : September 2, 2026 at 4:56 PM IST

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नई दिल्ली : आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI) में प्रिंसिपल साइंटिस्ट और रेडियोलॉजिकल सेफ्टी ऑफिसर डॉ. भूपेंद्र सिंह ने कहा है कि उद्योग अपशिष्ट, लौह अयस्क अवशेष और स्टील स्लैग को जैव-समृद्ध खाद में बदलकर पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तरीके से मैनेज किया जा सकता है. इससे खेती की पैदावार 10-20 प्रतिशत बढ़ाने और रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल कम करने में मदद मिलेगी.

बुधवार को ईटीवी भारत के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, सिंह ने कहा कि यह विकसित जैव-समृद्ध खाद फसल उत्पादन को बनाए रखने और संभावित रूप से सुधारने के साथ-साथ पारंपरिक रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता को कम करने में मदद कर सकती है.

इसमें 10 से ज़्यादा जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जैसे ऑर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, जिंक, कॉपर, मैंगनीज, मोलिब्डेनम, सिलिका और कोबाल्ट, जो फसलों और पौधों की वृद्धि में मदद करते हैं और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं.

सिफारिश की गई रासायनिक खाद की मात्रा से 20 प्रतिशत कम इस्तेमाल करने के बावजूद, फसल उत्पादन में 10-20 प्रतिशत की बढ़ोतरी के रूप में उत्साहजनक नतीजे दिखे हैं.

सिंह ने बताया, “औद्योगिक उप-उत्पादों को बेकार रहने देने के बजाय, खेती के काम के इनपुट में बदलने की क्षमता है. जैव-समृद्ध खाद से फसलों को पोषक तत्व मिलेंगे और खेत में पारंपरिक खाद की जरूरत भी कम होगी.”

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत के आइडिया को याद करते हुए उन्होंने कहा कि लौह अयस्क अवशेष (IoT) और स्टील स्लैग को खेती की खाद के तौर पर इस्तेमाल करने का आइडिया 2017-18 के आसपास बनना शुरू हुआ.

2018 में, इस्पात मंत्रालय, कृषि विश्वविद्यालयों और इस्पात उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ एक विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया गया था. चर्चा इस बात पर केंद्रित थी कि औद्योगिक उप-उत्पादों को डंप करने या भराव क्षेत्र में भेजने के बजाय, खेती के काम के इनपुट में कैसे बदला जा सकता है.

प्रिंसिपल साइंटिस्ट ने कहा, “यह अवधारणा विकसित देशों के तरीकों से भी प्रेरित है, जहां स्टील स्लैग का इस्तेमाल पहले से ही खेती में किया जा रहा है और आईओटी (Internet of Things) का इस्तेमाल कुछ खास अनुप्रयोगों में किया जाता है.

हालांकि, भारत में, इस तरह के औद्योगिक कूड़ा का इस्तेमाल ज़्यादातर निर्माण के कामों या डंपिंग साइट्स पर किया जाता है, और अक्सर इसके लंबे समय के पर्यावरण असर की पूरी समझ नहीं होती.”

इंडस्ट्रियल वेस्ट के इस्तेमाल के बारे में बताते हुए, सभी सदस्यों का मानना ​​था कि आईओटी (Internet of Things) और स्टील स्लैग को गैर-कानूनी तरीके से या बिना सही असेसमेंट के डंप करने की इजाजत देने के बजाय, उनके इस्तेमाल को विनियमित करने के लिए एक साफ नीति ढांचा और वैज्ञानिक अध्ययनों की जरूरत है.

ऐसा ढांचा जो पर्यावरण को बचाने, सुरक्षित खाद्य उत्पादन सुनिश्चित करने, कृषि उत्पादकता बनाए रखें और पारंपरिक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है. 2019 में यह प्रोजेक्ट चर्चा से क्षेत्र-स्तरीय प्रयोग में बदल गया.

हालांकि प्रोजेक्ट और उससे जुड़े सहयोग 2018 में बनने लगे थे, लेकिन मैदान पर परीक्षण 2019 से शुरू हुए, और उसके बाद के सालों में परीक्षण और मूल्यांकन हुआ. शोधकर्ताओं ने धीरे-धीरे ट्रायल्स को बढ़ाया ताकि यह पता लगाया जा सके कि खेती की व्यावहारिक कृषि परिस्थितियों में सामग्री कैसा परफॉर्म करती है. आखिरकार कई आईएआरआई और क्षेत्रीय रिसर्च स्टेशनों में ट्रायल किए गए.

स्टील स्लैग और उससे जुड़े प्रोडक्ट्स वाले पहले प्रोजेक्ट को लगभग आठ जगहों पर टेस्ट किया गया, जिसमें आईएआरआई के साथ-साथ कटरानी, ​​कुलुम, कलिम्पोंग, धारवाड़, दिल्ली और करनाल के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र भी शामिल थे.

सिंह ने कहा, "इन बहु-स्थानीय परीक्षण से रिसर्चर्स को अलग-अलग मिट्टी, क्लाइमेट और फसल की स्थितियों में टेक्नोलॉजी को जांचने में मदद मिली." अगली चुनौती अनुसंधान केंद्र से किसानों तक टेक्नोलॉजी ले जाना है.

शोधकर्ता अब एक उपयुक्त नीति और नियामक तंत्र पॉलिसी की तलाश कर रहे हैं, जिसमें मानकों, प्रमाणीकरण और निगरानी शामिल हो, ताकि यह पक्का हो सके कि किसानों तक पहुंचने से पहले ऐसे उत्पाद का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन किया जाए.

अभी, इस बात की चिंता है कि इंडस्ट्रियल वेस्ट से बनी चीजों को बिना सही विनियमन (regulation) या निगरानी के पैक करके बेचा जा सकता है. इसलिए एक औपचारिक नीति ढांचा दो मकसद पूरे कर सकता है: इंडस्ट्रियल कचरे की बिना सोचे-समझे या गैर-कानूनी डंपिंग को रोकना और यह पक्का करना कि खेती में सिर्फ साइंटिफिक तरीके से जांचे-परखे और सुरक्षित प्रोडक्ट ही इस्तेमाल हों.

उन्होंने कहा, "इससे इंडस्ट्रियल वेस्ट को खेती के लिए फायदेमंद इनपुट में बदला जा सकेगा और मिट्टी, पर्यावरण और खाने की सुरक्षा भी बनी रहेगी."

सिंह को उम्मीद है कि यह टेक्नोलॉजी आयातित उर्वरकों पर भारत की निर्भरता को कम करने में भी मदद कर सकती है. अभी, यूरिया और दूसरे फर्टिलाइजर का बड़ी मात्रा में आयात किया जाता है और सरकारी सब्सिडी से सपोर्ट मिलता है.

अगर पारंपरिक एनपीके खाद का इस्तेमाल 10-15 प्रतिशत या शायद 20 प्रतिशत तक कम किया जा सके, तो इसका बड़ा असर हो सकता है. इस तरह की कमी से न सिर्फ देश की आयात की जरूरत कम होगी, बल्कि फर्टिलाइजर सब्सिडी का वित्तीय बोझ भी कम करने में मदद मिल सकती है.

उन्होंने आगे बताया कि इसलिए, यह टेक्नोलॉजी एक संभावित मौका दिखाती है, जहां एक सेक्टर से पैदा होने वाले कचरे को दूसरे सेक्टर के लिए उपयोगी इनपुट में बदला जा सकता है.

अगर अच्छे फील्ड परिणाम बड़े स्तर पर दोहराए जाते हैं, तो यह टेक्नोलॉजी किसानों को पारंपरिक फर्टिलाइजर का इस्तेमाल कम करने में मदद कर सकती है, साथ ही फसल का उत्पादन बनाए रख सकती है या बढ़ा सकती है. इसके अलावा खनन और इस्पात उद्योग के कचरे को खेती के कीमती रिसोर्स में बदल सकती है.

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