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Explainer : 'बिहार भारी संकट में, खजाना खाली..' तेजस्वी यादव के दावे में कितनी सच्चाई?

तेजस्वी ने बिहार सरकार पर 'इकोनॉमी बम' फोड़ा है. उनका दावा है कि कर्ज और कुप्रबंधन के कारण सरकार पर गंभीर वित्तीय संकट है. रिपोर्ट-अविनाश

बिहार भारी संकट में, खजाना खाली..?
बिहार भारी संकट में, खजाना खाली..? (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 24, 2026 at 12:48 PM IST

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पटना : बिहार की राजनीति में इन दिनों 'खजाना खाली' और 'आर्थिक संकट' जैसे सवालों ने बड़ी बहस छेड़ दी है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव सरकार की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठा रहे हैं. उनका आरोप है कि बिहार सरकार के पास विकास योजनाओं और जरूरी खर्चों के लिए पर्याप्त राशि नहीं है. सवाल यह है कि क्या वाकई बिहार का खजाना खाली है? अगर नहीं, तो राज्य की आर्थिक परेशानी की असली वजह क्या है? और इसमें केंद्र प्रायोजित योजनाओं का कितना हिस्सा है?

कैसे पूरा हो रहा राज्य का कुल खर्च : बिहार की अर्थव्यवस्था की तस्वीर को बजट और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर देखें तो स्थिति 'खजाना पूरी तरह खाली' होने की नहीं, बल्कि सीमित अपने संसाधनों, केंद्र पर भारी निर्भरता, बढ़ते खर्च और कर्ज के दबाव की है. 'पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च' के अनुसार 2026-27 में बिहार की अनुमानित जीएसडीपी 13.09 लाख करोड़ रुपये है. राज्य का कुल खर्च, कर्ज अदायगी को छोड़कर, 3.25 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है. वहीं गैर-कर्ज प्राप्तियां 2.86 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है.

देखें रिपोर्ट- (ETV Bharat)

अर्थव्यवस्था बढ़ी लेकिन प्रति व्यक्ति आय बहुत पीछे : बिहार की अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है. 2024-25 में स्थिर कीमतों पर राज्य की जीएसडीपी वृद्धि 8.6 प्रतिशत आंकी गई थी. लेकिन आर्थिक विकास का फायदा प्रति व्यक्ति स्तर पर अभी भी सीमित है. PRS के मुताबिक 2024-25 में बिहार की प्रति व्यक्ति जीएसडीपी 76,490 रुपये थी, जबकि इसी अवधि में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,34,859 रुपये थी. यानी बिहार की प्रति व्यक्ति आर्थिक क्षमता राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी कम है. यही वजह है कि बिहार के सामने चुनौती सिर्फ अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने की नहीं, बल्कि राज्य की अपनी कमाई बढ़ाने की भी है.

बिहार की कमाई में केंद्र की बड़ी हिस्सेदारी : बिहार के वित्तीय ढांचे की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सीमित अपना राजस्व है. 2026-27 में राज्य के कुल राजस्व प्राप्तियों का अनुमान 2.85 लाख करोड़ रुपये है. इसमें राज्य के अपने संसाधनों से करीब 75,203 करोड़ रुपये आने का अनुमान है, जबकि केंद्र से करीब 2.10 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है. यानी राजस्व प्राप्तियों का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से आने वाला है.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

केंद्रीय करों में बिहार की हिस्सेदारी : केंद्र के करों में बिहार की हिस्सेदारी करीब 1.58 लाख करोड़ रुपये और केंद्र से मिलने वाले अनुदान करीब 51,896 करोड़ रुपये हैं. यानी यह कहना सही नहीं होगा कि केंद्र से मिलने वाला पैसा बिहार पर सिर्फ बोझ है. इसके उलट बिहार की वित्तीय व्यवस्था केंद्र से मिलने वाले कर-वितरण और अनुदानों पर काफी निर्भर है. 108 केंद्रीय प्रायोजित योजनाएं लेकिन पूरी तस्वीर क्या है? : केंद्र सरकार ने 2024-25 के लिए 108 केंद्र प्रायोजित योजना यानी सेंट्रल स्पॉन्सर्ड स्कीम का प्रशासन किया था. इन योजनाओं के लिए केंद्र का कुल बजटीय प्रावधान करीब 5.01 लाख करोड़ रुपये था.

केंद्र प्रायोजित और केंद्रीय क्षेत्र की योजना क्या है? : केंद्र प्रायोजित योजना और केंद्रीय क्षेत्र की योजना में अंतर समझना जरूरी है. केंद्र प्रायोजित योजनाओं में केंद्र और राज्य दोनों की हिस्सेदारी होती है. इसलिए राज्य को कई योजनाओं के लिए अपने बजट से भी राशि लगानी पड़ती है. बिहार जैसे कम राजस्व क्षमता वाले राज्य के लिए यह हिस्सा महत्वपूर्ण है. लेकिन दूसरी तरफ इन योजनाओं के माध्यम से राज्य को केंद्र से बड़ी राशि भी मिलती है. इसलिए यह कहना कि केंद्रीय योजनाएं केवल बिहार के खजाने को खाली कर रही हैं, पूरी तस्वीर नहीं बताता.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

कई योजनाओं में 60:40 का फॉर्मूला : केंद्र प्रायोजित योजनाओं में हिस्सेदारी योजना-दर-योजना अलग हो सकती है. कई प्रमुख योजनाओं में सामान्य राज्यों के लिए 60:40 का फॉर्मूला लागू है. इसका अर्थ है कि केंद्र 60 प्रतिशत और राज्य 40 प्रतिशत हिस्सा देता है. नया VB-G RAM G कानून भी सामान्य राज्यों के लिए 60:40 के फंड शेयरिंग पैटर्न पर आधारित है. पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 है. इसलिए बिहार जैसे राज्य की यह मांग कि उसे भी 90:10 के अनुपात में केंद्रीय योजनाओं का लाभ मिले, वित्तीय दबाव के संदर्भ में समझी जा सकती है.

VB-G RAM G बिहार पर कितना दबाव?: 1 जुलाई 2026 से VB-G RAM G देशभर में लागू हो चुका है. इस योजना के तहत ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार गारंटी 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन की गई है. सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 60:40 रखी गई है. 16 जुलाई 2026 तक बिहार के लिए इस योजना के तहत 6,715.83 करोड़ रुपये का अंतरिम आवंटन किया गया था और पहली किस्त के रूप में 1,663.56 करोड़ रुपये की मदर सैंक्शन जारी की गई थी.

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ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

शुरुआती आंकड़े से पूरे साल का बोझ तय होगा? : इसलिए यह कहना कि नई योजना से बिहार पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, एक वास्तविक चिंता है. लेकिन 'बिहार पर 4,000 करोड़ रुपये से अधिक का निश्चित बोझ' बताने के लिए पूरे वित्त वर्ष के राज्य हिस्से और वास्तविक खर्च के आंकड़ों को देखना जरूरी होगा. सिर्फ शुरुआती आवंटन से पूरे साल का बोझ तय नहीं किया जा सकता.

बिहार का खजाना सच में खाली है? : यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है. 2026-27 के बजट अनुमान में बिहार ने 1,143 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष रखा है. वहीं राजकोषीय घाटा 39,112 करोड़ रुपये यानी जीएसडीपी का 3 प्रतिशत लक्ष्यित है. इसलिए तकनीकी रूप से यह कहना सही नहीं है कि बिहार का सरकारी खजाना पूरी तरह खाली है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि बिहार पर वित्तीय दबाव नहीं है.

वित्त मंत्री सह उप मुख्यमंत्री विजेन्द्र यादव
वित्त मंत्री सह उप मुख्यमंत्री विजेन्द्र यादव (ETV Bharat)

संशोधित अनुमान में बिहार का राजकोषीय घाटा : 2025-26 के संशोधित अनुमान में बिहार का राजकोषीय घाटा 1.34 लाख करोड़ रुपये यानी जीएसडीपी का 11.8 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान लगाया गया था. यह बजट में तय 3 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत अधिक था. हालांकि 2026-27 में इसे दोबारा 3 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है.

खर्च बढ़ा तो कर्ज पर निर्भरता भी बढ़ी : 2025-26 के संशोधित अनुमान में बिहार का कुल खर्च, कर्ज अदायगी को छोड़कर, करीब 4 लाख करोड़ रुपये था. 2026-27 में इसे घटाकर 3.25 लाख करोड़ रुपये के आसपास रखा गया है. 2026-27 में राज्य करीब 39,275 करोड़ रुपये की शुद्ध उधारी के जरिए अपने खर्च को पूरा करने की योजना बना रहा है. वहीं करीब 22,665 करोड़ रुपये कर्ज की अदायगी के लिए रखे गए हैं. इससे साफ है कि बिहार को विकास और सरकारी योजनाओं के लिए अपने राजस्व के साथ-साथ उधारी का भी सहारा लेना पड़ रहा है.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

केंद्रीय योजनाओं में राज्य का पैसा लगना क्या गलत है? : एएन सिन्हा शोध संस्थान से जुड़े अर्थशास्त्र विशेषज्ञ प्रोफेसर विद्यार्थी विकास के मुताबिक बिहार जैसे राज्यों के लिए केंद्रीय योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी कम होनी चाहिए और 90:10 का मॉडल अधिक उपयुक्त हो सकता है. डॉ विद्यार्थी विकास का तर्क है कि जब राज्य की अपनी राजस्व क्षमता सीमित हो और उसे वेतन, पेंशन, कर्ज की अदायगी तथा विकास योजनाओं का खर्च उठाना हो, तब 40 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी कई योजनाओं में अतिरिक्त दबाव पैदा करती है.

''बिहार जैसे राज्यों के लिए केंद्र सरकार को 90 : 10 के रेशियो में केंद्रीय योजना चलनी चाहिए थी, लेकिन अधिकांश योजनाएं 60 : 40 या फिर 50 : 50 के रेशियो में चलाई जा रही है. केंद्र सरकार से समय पर केंद्रीय योजनाओं की राशि भी नहीं मिलती है. जब राज्य सरकार को केंद्रीय योजनाओं में बड़ी राशि खर्च करना पड़े तो स्वाभाविक है उसका असर वित्तीय व्यवस्था पर पड़ना है.''- प्रो. विद्यार्थी विकास, अर्थशास्त्री

प्रो. विद्यार्थी विकास, अर्थशास्त्री
प्रो. विद्यार्थी विकास, अर्थशास्त्री (ETV Bharat)

'राज्यों को मिले अपने अनुसार योजना लागू करने की स्वतंत्रता' : वहीं, अर्थशास्त्री प्रोफेसर डीएम दिवाकर का तर्क है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं में नीति और योजना का निर्धारण बड़े स्तर पर केंद्र करता है, जबकि लागू करने की जिम्मेदारी राज्यों पर होती है. उनके अनुसार राज्यों को अपनी स्थानीय जरूरतों के मुताबिक योजनाएं तैयार करने की अधिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. हालांकि दूसरी तरफ यह भी तथ्य है कि केंद्रीय योजनाओं के जरिए बिहार को केंद्र से बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता मिलती है. 2026-27 में बिहार को केंद्र से मिलने वाले CSS अनुदान का अनुमान 44,003 करोड़ रुपये है. 2024-25 में इसका वास्तविक आंकड़ा 21,217 करोड़ रुपये था.

''केंद्र सरकार राज्यों पर केंद्रीय योजना थोपती है. योजना का मार्केटिंग भी केंद्र सरकार ही करती है. राशि देने के बाद भी राज्यों की सरकार को उसका क्रेडिट नहीं मिलता है. कई योजनाएं लोक कल्याण से जुड़ी हुई है इसलिए राज्य सरकार को उन योजनाओं को चलाना अपने राज्य में मजबूरी है, लेकिन बेहतर होता, केंद्र सरकार हर राज्य को अपने हिसाब से योजना बनाने की छूट देती और उसमें मदद करती.''- डीएम दिवाकर, अर्थशास्त्री

नीतीश की पुरानी मांग और बदली हुई राजनीति : नीतीश कुमार जब एनडीए से अलग थे, तब केंद्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या कम करने और राज्यों को अधिक वित्तीय स्वतंत्रता देने की मांग करते रहे हैं. बिहार जैसे राज्यों के लिए केंद्रीय योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी घटाने और विशेष राज्य के दर्जे जैसी मांगें भी इसी आर्थिक तर्क से जुड़ी रही हैं. अब एनडीए के साथ सरकार होने के कारण राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं.

'बिहार को पहले के मुताबिक ज्यादा मिल रही सहायता' : जेडीयू का तर्क है कि डबल इंजन सरकार में बिहार को केंद्र से लगातार मदद मिल रही है और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बिहार का विकास जरूरी है. जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन के मुताबिक पहले की तुलना में अब बिहार को केंद्र से पर्याप्त सहायता मिल रही है और केंद्रीय योजनाओं के जरिए राज्य को फायदा हो रहा है. उनका कहना है कि बिहार को आगे भी केंद्र से इसी तरह मदद मिलती रहनी चाहिए.

''2047 में देश को विकसित बनाने के लिए बिहार को भी विकसित बनाना होगा. डबल इंजन की सरकार में बिहार को केंद्र से मदद मिल रही है. यूपीए सरकार के समय जितनी मदद मिलनी चाहिए केंद्र से नहीं मदद मिलती थी. पिछले 2 बजट में केंद्र सरकार ने बिहार को केंद्रीय बजट में पर्याप्त राशि दी है. लेकिन इस तरह की मदद बिहार को आगे भी लगातार मिलना चाहिए, जिसकी जरूरत है.''- राजीव रंजन, प्रवक्ता, जेडीयू

राजीव रंजन, प्रवक्ता, जेडीयू
राजीव रंजन, प्रवक्ता, जेडीयू (ETV Bharat)

असली संकट केंद्र प्रायोजित योजनाएं या कम अपना राजस्व? : यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है. बिहार की समस्या को केवल केंद्रीय योजनाओं के राज्य हिस्से से जोड़ना अधूरा विश्लेषण होगा. राज्य की अपनी कर आय 2026-27 में करीब 65,800 करोड़ रुपये अनुमानित है, जबकि केंद्र से करों में हिस्सेदारी और अनुदान मिलाकर राशि इससे कई गुना अधिक है.

यानी बिहार की वित्तीय संरचना में केंद्र की भूमिका बहुत बड़ी है. लेकिन दूसरी तरफ राज्य के पास अपने संसाधन सीमित हैं और उसे वेतन, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, बिजली सब्सिडी, महिलाओं से जुड़ी योजनाओं, विकास परियोजनाओं और केंद्रीय योजनाओं में अपना हिस्सा- सबके लिए पैसा जुटाना पड़ता है. इसलिए असली सवाल यह है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं का राज्य हिस्सा कितना होना चाहिए और बिहार अपनी खुद की राजस्व क्षमता कितनी तेजी से बढ़ा सकता है?

विशेष राज्य का दर्जा नहीं तो 90:10 की मांग? : राजनीतिक विशेषज्ञ प्रोफेसर रणधीर कुमार का कहना है कि बिहार जैसे पिछड़े राज्यों के लिए केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी कम की जानी चाहिए. अगर विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता तो कम से कम केंद्रीय योजनाओं में 90:10 का फॉर्मूला लागू किया जा सकता है.

''बिहार को विकास के लिए बड़ी राशि की जरूरत है, लेकिन सीमित राजस्व के कारण राज्य को लगातार उधारी और केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में राज्य की हिस्सेदारी घटने से विकास योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं.''- प्रो. रणधीर कुमार, राजनीतिक विशेषज्ञ

बड़ी परियोजनाओं के लिए भी कर्ज का सहारा : बिहार सरकार विकास की बड़ी परियोजनाओं पर भी जोर दे रही है. सैटेलाइट टाउनशिप और आधारभूत संरचना से जुड़े बड़े प्रोजेक्टों के लिए कर्ज लेने की योजनाएं सामने आई हैं. इसका मतलब यह है कि सरकार के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं- एक तरफ तत्काल सरकारी खर्च और सामाजिक योजनाओं का दबाव, दूसरी तरफ भविष्य के लिए बड़े निवेश की जरूरत.

ऐसे में कर्ज का इस्तेमाल अगर उत्पादक परिसंपत्तियां बनाने और राजस्व पैदा करने वाली परियोजनाओं में होता है तो उसका आर्थिक लाभ भविष्य में मिल सकता है. लेकिन लगातार बढ़ती उधारी के साथ ब्याज और मूलधन की अदायगी का दबाव भी बढ़ता है.

तो तेजस्वी के 'खजाना खाली' दावे में कितनी सच्चाई? : उपलब्ध बजट आंकड़ों के आधार पर 'बिहार का खजाना पूरी तरह खाली है' कहना सही नहीं है. 2026-27 के बजट में राज्य ने राजस्व अधिशेष का अनुमान रखा है और 3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय किया है. लेकिन तेजस्वी यादव के दावे को पूरी तरह खारिज करना भी तस्वीर को सरल बना देना होगा. बिहार की वित्तीय स्थिति पर दबाव के वास्तविक संकेत मौजूद हैं- राज्य की अपनी राजस्व क्षमता सीमित है, केंद्र पर निर्भरता बहुत अधिक है, 2025-26 में राजकोषीय घाटे का संशोधित अनुमान काफी बढ़ गया था और विकास योजनाओं के लिए उधारी पर निर्भरता बनी हुई है.

बिहार को बढ़ाना होगा कमाई : केंद्रीय योजनाओं से बिहार को हजारों करोड़ रुपये की सहायता भी मिलती है. इसलिए इन्हें सिर्फ 'खजाना खाली करने वाली योजनाएं' कहना तथ्यात्मक रूप से एकतरफा होगा. असली चुनौती यह है कि बिहार अपनी कमाई बढ़ाए, केंद्र से मिलने वाले संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करे और ऐसी योजनाओं में राज्य की हिस्सेदारी कम कराने की कोशिश करे जिनका वित्तीय भार उसकी क्षमता से ज्यादा है. इसलिए ज्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि बिहार का खजाना खाली नहीं, लेकिन वित्तीय गुंजाइश सीमित है. केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य का हिस्सा इस दबाव का एक हिस्सा है, पूरी वजह नहीं.

बिहार की अर्थिक स्थिति विरोधाभाषी : बिहार की आर्थिक कहानी दो विरोधाभासी तस्वीरें दिखाती है. एक तरफ अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और 2026-27 में जीएसडीपी 13.09 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. दूसरी तरफ प्रति व्यक्ति जीएसडीपी राष्ट्रीय औसत का करीब एक-तिहाई है. राज्य की राजस्व प्राप्तियों में केंद्र का हिस्सा करीब तीन-चौथाई है और अपनी कर आय सीमित है.

ऐसे पता चलेगी वास्तिवक हकीकत : ऐसे में बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि केंद्रीय योजनाओं में बिहार कितना पैसा खर्च कर रहा है, बल्कि इस पर भी होनी चाहिए कि केंद्र से बिहार को कुल कितना पैसा मिल रहा है, राज्य अपने स्तर पर कितना जुटा रहा है और दोनों स्रोतों से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से हो रहा है. यही पूरा गणित बताएगा कि बिहार वास्तव में आर्थिक संकट में है या फिर 'खजाना खाली' का राजनीतिक दावा वित्तीय दबाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है.

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