Explainer: कितनी देर देखना है मोबाइल... बिहार सरकार तय करेगी?
बच्चों में मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते लत को बिहार सरकार 'अदृश्य महामारी' मानती है. नियंत्रण के लिए पॉलिसी लाने पर विचार हो रहा.

Published : February 25, 2026 at 6:43 AM IST
रिपोर्ट: कृष्णनंदन
पटना: बिहार सरकार बच्चों को मोबाइल और सोशल मीडिया के चकौचौंध के अंधकार से दूर रखने के लिए 'सुरक्षा कवच' तैयार करने में जुटी है. सरकार का मानना है कि मोबाइल की लत न केवल बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए घातक है, बल्कि उनको मानसिक तौर पर कमजोर और सामाजिक विकास की जड़ों को खोखली कर रही है.
बच्चों के स्क्रीन टाइम से बढ़ी चिंता : बच्चों के जीवन में मोबाइल का महत्व कोरोनाकाल में अधिक बढ़ गया था, जब स्कूलें बंद हो गईं और ऑनलाइन पढ़ाई का दौर चल पड़ा था. लेकिन हाथ में आया मोबाइल अब बच्चों की सबसे बड़ी लत बनता जा रहा है. पढ़ाई की जगह गेम, रील और सोशल मीडिया पर घंटों बीताने की आदत बच्चों की नींद, व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है.
क्या कहता है WHO ?: कितनी उम्र में कितना स्क्रीन टाइम सही माना जाए, इसे लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी (डब्ल्यूएचओ) ने स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किए हैं. WHO के अनुसार छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होनी चाहिए. 2 साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखने की सलाह दी गई है.
2 से 5 साल के बच्चों के लिए दिन में अधिकतम 1 घंटा स्क्रीन टाइम तय किया गया है. WHO का कहना है कि इस उम्र में बच्चों के लिए मोबाइल या टीवी से ज्यादा जरूरी असली खेल जिसमें शारीरिक गतिविधि शामिल होती है और माता-पिता के साथ अच्छा समय बिताना है. क्योंकि स्क्रीन पर ज्यादा समय देने से उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और सीखने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.

CDC की रिपोर्ट: सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन यानी सीडीसी के अनुसार स्कूल जाने वाले बच्चों और किशोरों में ज्यादा स्क्रीन टाइम कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा पाया गया है. सीडीसी की रिपोर्ट बताती है कि ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में मोटापा, नींद की कमी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां ज्यादा देखी जाती हैं. CDC बच्चों और किशोरों के लिए रोजाना कम से कम 60 मिनट की शारीरिक गतिविधि की सिफारिश करता है और स्क्रीन टाइम को सीमित रखने पर जोर देता है.
मनोरंजन के लिए मोबाइल का हो रहा इस्तेमाल: शिक्षाविद, मनोचिकित्सक, नेत्र रोग विशेषज्ञ और अभिभावकों का मानना है कि मोबाइल फोन ने शिक्षा को जरूर नई दिशा दी है. ऑनलाइन क्लास, डिजिटल नोट्स और वीडियो लेक्चर से पढ़ाई पहले से ज्यादा आसान और सुलभ हुई है. लेकिन यही तकनीक अब बच्चों के लिए एक बड़ी बड़ी चुनौती भी बनती जा रही है.

अभिभावकों की बढ़ी चिंता: अभिभावकों के लिए बच्चों को मोबाइल से दूर रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गयी है. अभिभावक सोनी कुमारी बताती हैं कि परीक्षा का समय चल रहा है और बच्चा मोबाइल पढ़ाई के लिए लेता है और थोड़ी देर में वह रील देखने लगता है. स्कूल में टीचर द्वारा दिया गया नोट्स हो, सब कुछ मोबाइल पर दिया जाता है. इसलिए पढ़ाई के समय मोबाइल देना जरूरी हो जाता है.
"जैसे ही थोड़े समय के लिए निगरानी बच्चे से हटती है, बच्चा यूट्यूब के रील्स देखने में बिजी हो जाता है. स्थिति ऐसी है कि बिना मोबाइल में वीडियो देखे खाना नहीं खाता है और खाना खाते समय मोबाइल चाहिए ही. सरकार कोई नियम बना रही है तो अच्छी बात है, लेकिन स्कूलों के लिए भी नियम बने कि मोबाइल पर नोट्स न दिए जाएं."- सोनी कुमारी,अभिभावक

सख्त नियम है जरूरी: अभिभावक उमेश कुमार ने कहा कि उनकी बेटी को मोबाइल देखने की लत लग गई है क्योंकि स्कूल वाले भी ऑनलाइन पढ़ाई को प्रमोट कर रहे हैं. पढ़ाई के नाम पर मोबाइल मिलता है और फिर जैसे पेरेंट्स की नजर ओझल होती है, बच्ची मोबाइल में वीडियो देखने में व्यस्त हो जाती है और गेम खेलने लगती हैं.
"रात में जब सो जाते हैं तो भी चुपके से मम्मी का मोबाइल लेकर कंबल ओढ़कर मोबाइल में गेम खेलती है और सोशल मीडिया यूज करती है. सरकार अगर कोई पॉलिसी बना रही है तो जल्द पॉलिसी बनाएं. मोबाइल थोड़े समय के लिए छीन लिया जाता है तो बच्चे आक्रोशित हो जा रहे हैं. एक सख्त गाइडलाइन मोबाइल इस्तेमाल को लेकर बेहद जरूरी है."- उमेश कुमार,अभिभावक

अधिक स्क्रीन टाइम का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव: पटना की प्रख्यात नेत्र विशेषज्ञ डॉक्टर निम्मी रानी ने बताया कि मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आंखों पर सीधा असर डालती है. बच्चों में आंखों में जलन, सिरदर्द और धुंधला दिखने की शिकायत बढ़ रही है. लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठकर मोबाइल देखने से गर्दन और पीठ में दर्द की समस्या भी सामने आ रही है.
"मेरे यहां प्रतिदिन आने वाले पेशेंट में कई बच्चे भी होते हैं जो काफी जटिल समस्या को लेकर आते हैं. कई बच्चे काफी कम उम्र में मायोपिया से ग्रसित हो गए हैं और उनका पावर -3 और -4 में चला गया है. कई बच्चे 8 वर्ष की उम्र में ही हाई मायोपिया के शिकार हो गए रहते हैं. यानी कि उनका पावर -6 से ऊपर चला गया रहता है."- डॉक्टर निम्मी रानी,नेत्र विशेषज्ञ

बच्चों की नजर हो रही कमजोर: डॉ निम्मी रानी ने कहा कि मोबाइल इस्तेमाल के कारण बच्चों में नजर का कमजोर हो जाना सबसे बड़ी समस्या बन रही है. जब नजर का कमजोर होने की बात होती है तो इसका मतलब सिर्फ चश्मा का नंबर भर नहीं रहता, क्योंकि जितना चश्मा का नंबर बढ़ रहा है उतना ही उनकी आंखों की नसें और रेटिना कमजोर हो रही है. यह एक बेहद गंभीर समस्या बन चुकी है और समय रहते इस पर उचित कार्रवाई की जरूरत है.
छोटे बच्चे खासकर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के स्क्रीन टाइम पर रोक लगाने की जरूरत है. इसके लिए एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन, प्रशासन और सरकार सभी को मिलकर काम करने की जरूरत है. 8 साल के बच्चे के लिए 1 घंटे का स्क्रीन टाइम भी घातक हो सकता है. अगर स्क्रीन टाइम पर रोक लगाते हैं तो यह तय किया जाए कि मैक्सिमम पॉसिबल लिमिट से अधिक बच्चे स्क्रीन नहीं देख सके.

कम हो रहा रीडिंग टाइम : कुछ रिसर्च ने भी यह प्रूफ किया है कि जहां बच्चे स्क्रीन टाइम अधिक दे रहे हैं, उनमें अटेंशन डिफिशिएंसी बढ़ रही है. यानी कि वह किसी काम में एकाग्र नहीं हो पा रहे हैं. बच्चों का बुक रीडिंग टाइम कम हो रहा है और तमाम कोचिंग खुलने के बावजूद बच्चों का शैक्षणिक विकास भी अच्छा नहीं हो पा रहा.
आंखों में ड्राइनेस क्रिएट: स्क्रीन टाइम बच्चों के आंखों में ड्राइनेस क्रिएट करता है और उनके स्लिप पैटर्न को प्रभावित कर रहा है. स्लीप पैटर्न प्रभावित होने के कारण बच्चों के स्मरण शक्ति कमजोर हो रही है और बच्चों में एग्रेसिव भावना बढ़ रही है. अधिक स्क्रीन टाइम का असर बच्चों के सिर्फ आंखों पर नहीं हो रहा बल्कि उनके साइकोलॉजिकल ग्रोथ पर भी असर हो रहा है. टीनएजर का दिमाग परिपक्व नहीं होता, उनके सामने बहुत सारे गलत और वायलेंट सीन खुल जाते हैं.

सरकार कोई नीति लाती है तो समाज करे समर्थन: डॉ निम्मी रानी ने कहा कि भारत में बीते दिनों फ्रेंच प्रेसिडेंट मैक्रों आए हुए थे, उन्होंने अपने देश का उदाहरण दिया. भारत सरकार को भी यह सुझाव दिया है कि बच्चों में खासकर टीनएजर्स के बीच स्क्रीन टाइम कम करने के लिए कोई सरकारी पॉलिसी तैयार किया जाए.
भारत सरकार और बिहार सरकार यदि इस बारे में कोई नीति लाने की पहल करती है तो, यह एक बेहद अच्छी और सराहनीय प्रयास होगी. और पूरे समाज को मिलकर इसका समर्थन करना चाहिए.
मोबाइल का लत भयावह: पटना की प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट डॉ बिंदा सिंह ने कहा कि मोबाइल का लत बच्चों में भयावह रूप लेते जा रहा है. सरकार इसको लेकर कोई नीति लाने जा रही है तो यह बहुत ही सराहनीय बात है और इससे बच्चों का भविष्य बच जाएगा.
"कहीं गेम की लत है तो कहीं अफेयर का मामला है, कहीं मोबाइल छीनने पर फैमिली के साथ मारपीट कर रहे हैं. बच्चों में मोबाइल अब एडिक्शन बन गया है. मोबाइल पर अवांछित कंटेंट को भी बच्चे इंटेक कर रहे हैं और उनके बिहेवियर में यह परिलक्षित भी हो रहा है. भटकाव बहुत खतरनाक हो जा रहा है."- डॉ बिंदा सिंह,प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट
मोबाइल छीनने पर एग्रेसिव हो रहे बच्चे: उन्होंने कहा कि उनके पास कुछ मामले ऐसे भी आए हैं, जिसमें मोबाइल छीनने पर बच्चे घर में तोड़फोड़ करने लगते हैं और अंत में पेरेंट्स को हार कर बच्चे को मोबाइल देना ही पड़ता है. स्कूल अवधि के दौरान स्कूल में बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करते हैं, इतनी ही देर बच्चे मोबाइल से दूर रहते हैं. बाकी घर पर आने पर अधिकांश बच्चे मोबाइल से चिपक जा रहे हैं.
नशाबंदी के तरह ऐसी नीति का सभी करेंगे स्वागत: डॉ बिंदा सिंह ने कहा कि एग्जाम का समय है और उनके पास काफी पेरेंट्स अपने बच्चों को लेकर आए. बच्चा एग्जाम देना नहीं चाह रहा है और जब उन्होंने बच्चों से बात की तो पता चला कि उसने कुछ भी पढ़ाई नहीं की है. पेरेंट्स से बात किया तो उनका कहना था कि बच्चा दिन भर टेबल पर मोबाइल लेकर ऑनलाइन स्टडी में व्यस्त रहता था तो फिर कैसे पढ़ाई नहीं की.
"ऐसे में टीनएजर्स के लिए मोबाइल के इस्तेमाल के नियंत्रण को लेकर सरकार कुछ विचार कर रही है तो इसका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए. जिस प्रकार नशाबंदी अभियान का स्वागत किया गया इस प्रकार ऐसा कोई नियम आता है तो पूरे बिहार की जनता इसका स्वागत करेगी, मुझे ऐसा लगता है."-डॉ बिंदा सिंह,प्रख्यात साइकोथैरेपिस्ट
ना करें ऑनलाइन एजुकेशन को प्रमोट: उन्होंने कहा कि सरकार यह भी पॉलिसी बनाए कि स्कूल वाले खास कर क्लास 10 तक बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के झांसा से दूर रखें. बच्चों को किताबें पढ़ने की आदत डलवाए और कॉपी पर नोट्स तैयार करवाए. पहले भी तो यही होता था. आज टीचर भी व्हाट्सएप ग्रुप पर स्कूल के होमवर्क डाल रहे हैं और नोट्स शेयर कर रहे हैं.
बढ़ रही शारीरिक समस्याएं : शिक्षाविद् बीएन प्रसाद ने बताया कि डिजिटल एजुकेशन और ऑनलाइन एजुकेशन के नाम पर बच्चों में मोबाइल की लत बढ़ते जा रही है. 16 साल से कम उम्र के बच्चों को पेरेंट्स की निगरानी में ही कुछ समय के लिए स्क्रीन पर पढ़ाई करनी चाहिए. अभी मोबाइल के लत के कारण बच्चे अपना सारा समय मोबाइल पर व्यतीत कर रहे हैं. इससे उनकी शारीरिक गतिविधि कम हो रही है और आंखों की समस्या बढ़ रही है.
"साथ ही बच्चों में चिड़चिड़ापन आ रहा है और शारीरिक गतिविधि कम होने से मोटापा और कमजोरी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं. पहले बच्चे मैदान में खेलते थे, दौड़ते थे और दोस्तों के साथ समय बीताते थे. अब वही समय मोबाइल के साथ गुजर रहा है. इससे उनका शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है. ऐसे में टीनएजर्स के लिए स्क्रीन टाइम को लेकर पॉलिसी लाने की जरूरत बढ़ गई है."- बीएन प्रसाद ,शिक्षाविद्
सदन में गूंजा मुद्दा: हाल के महीनों में छात्रों से जुड़ी कई चिंताजनक घटनाओं ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है. इसी मुद्दे को लेकर बिहार विधानसभा के चालू सत्र के दौरान विधायकों ने सदन में सवाल उठाया और चिंता जताई कि मोबाइल एडिक्शन बच्चों को पढ़ाई से दूर कर रहा है और उनमें चिड़चिड़ापन, अवसाद और एकाकीपन बढ़ रहा है.
सरकार ने नीति बनाने की जरूरत महसूस की: जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने सोमवार को बच्चों में मोबाइल एडिक्शन के मुद्दा को सदन में उठाते हुए कहा कि बच्चों का बचपन तेजी से मोबाइल स्क्रीन में सिमटता जा रहा है. उन्होंने इसे अदृश्य महामारी करार दिया है. उन्होंने बिहार सरकार से बच्चों के स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने के लिए राज्य स्तर पर नीति बनाने की मांग की.
"इंफिनिटी स्क्रॉलिंग और लगातार रील्स देखने से बच्चों का ध्यान भटकता है और उनकी एकाग्रता कमजोर हो रही है. मोबाइल उपयोग के दौरान डोपामाइन हार्मोन का स्राव होता है, इससे दिमाग को त्वरित आनंद मिलता है और बच्चे वास्तविक जीवन की गतिविधियों से दूर होते जाते हैं. जब सरकार बच्चों को AI सीखाने की योजना बना रही है, तो मोबाइल के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए सुरक्षा तंत्र क्यों नहीं बनाया गया?"- समृद्ध वर्मा, जदयू विधायक
मॉडल बन सकता है बिहार: इसके जवाब में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा करते हुए कहा कि गंभीर विमर्श के बाद नियंत्रण के लिए कानून बनाने की आवश्यकता सरकार भी महसूस कर रही है. गौरतलब है कि देश में बच्चों के स्क्रीन टाइम पर कोई स्पष्ट नीति कहीं भी लागू नहीं है. ऐसे में बिहार यदि कोई ऐसी नीति लागू करता है तो देश के लिए यह मॉडल बन सकता है.
जान लीजिए बिहार सरकार का प्लान: आईटी मंत्री श्रेयसी सिंह ने इस विषय को गंभीर माना है. उन्होंने कहा कि बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना बहुविभागीय का जिम्मा है. इसमें स्कूल, पैरेंट्स, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज की भागीदारी जरूरी है. बिहार सरकार ने बेंगलुरु स्थित शनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस (NIMHANS) के विशेषज्ञों से दिशा-निर्देश की मांग की है.
"रिपोर्ट आने के बाद सभी विभाग मिलकर एक नया मानक तैयार करेंगे. सम्राट चौधरी ने भी स्पष्ट किया है कि बिहार सरकार इस विषय पर पूरी तरह से नई पॉलिसी लाने की दिशा में काम कर रही है."- श्रेयसी सिंह,आईटी मंत्री, बिहार
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