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बिहार के ऐसे प्रोफेसर जो क्लासरूम से लेकर सदन तक बढ़ा रहे हैं गरिमा, लंबी है फेहरिस्त

बिहार की राजनीति में 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स' काफी अहम है. अपने रचनात्मक प्रभाव से ये सियासत आज भी जारी है. रिपोर्ट- डॉ. रंजीत कुमार

बिहार में क्यों खास है 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स'
बिहार में क्यों खास है 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स' (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : July 4, 2026 at 1:00 PM IST

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पटना : बिहार की राजनीति में सिर्फ जाति और समाज के समीकरण ही सरकारें नहीं बनाते, बल्कि ज्ञान और शिक्षा की 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स' भी यहाँ की सत्ता का एक बेहद रसूखदार और निर्णायक केंद्र रही है. लोकतंत्र के इस गढ़ में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के क्लासरूम से निकलकर सदन की बेंच तक पहुंचने वाले शिक्षाविदों का सफर बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक रहा है.

बिहार में क्यों खास है 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स' : बिहार उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां विधान परिषद में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था है. इन सीटों पर केवल पंजीकृत शिक्षक मतदाता मतदान करते हैं. इसके अलावा ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र से भी प्रतिनिधि चुनाव जीत करते हैं. इस चुनाव में सिर्फ ग्रेजुएट मतदाता ही मतदान करते हैं. इस चुनाव की वजह से शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का विधान परिषद में प्रतिनिधित्व लगातार बना रहता है. ग्रेजुएट और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीत के आए प्रतिनिधि कई बार सरकार की नीतियों को प्रभावित ही करते हैं.

बिहार में क्यों खास है 'प्रोफेसर पॉलिटिक्स' (ETV Bharat)

सिर्फ प्रोफेसर को चुनाव लड़ने का अधिकार : बिहार विधानसभा में भी कई प्रोफेसर चुनाव जीत कर आने में कामयाब हो जाते हैं. बिहार और देश के अन्य हिस्सों में एक्ट में या प्रावधान किया गया है कि कॉलेज में पदस्थापित प्रोफेसर चुनाव लड़ सकते हैं और चुनाव जीतने के बाद उन्हें विधायी कार्य में हिस्सा लेने के लिए छुट्टी भी मिल जाती है. जनप्रतिनिधि के रूप में जब कार्यकाल खत्म हो जाता है तो वह पुन: कॉलेज ज्वाइन कर सकते हैं. इस तरीके का प्रावधान इसलिए किया गया था की राजनीति में पढ़े लिखे लोग आ सकें और शिक्षा के क्षेत्र में भूमिका निभा सकें.

एक ही जगह से ले सकते हैं वेतन : वेतन को लेकर भी नियम स्पष्ट हो चुका है पूर्व में कुछ विधायकों ने कॉलेज और विधानसभा या विधान परिषद से वेतन ले लिए थे, बाद में मामला जब प्रकाश में आया तो वेतन रिकवरी हुई और इस प्रावधान को कड़ाई से पालन किया जाने लगा. नियम ये था कि जनप्रतिनिधि रहते हुए आप वेतन एक ही जगह से ले सकते हैं. आमतौर पर प्रोफेसर साहब वेतन तो कॉलेज से लेते हैं लेकिन भत्ता विधानसभा या विधान परिषद से लेते हैं.

कई नेताओं ने राजनीति को दिया धार : शिक्षा और राजनीति का यह संगम बिहार की लोकतांत्रिक एवं शैक्षणिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है. बिहार की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में कई ऐसे नेता हैं जो विश्वविद्यालय या कॉलेज में शिक्षक रहे हैं या फिर अब भी सेवा से जुड़े हैं. इनमें भाजपा के राजीव प्रताप रूडी और नवल किशोर यादव, राजद के डॉ चन्द्र शेखर और डॉ. रामानंद यादव, जदयू के डॉ आशोक चौधरी और डॉ. संजीव कुमार का नाम शामिल है.

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ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

राजीव प्रताप रूडी भी हैं प्रोफेसर : भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. वे पटना के प्रतिष्ठित ए.एन. कॉलेज में पदस्थापित हैं. राजीव प्रताप रूडी कुछ मौकों पर छात्रों का मार्गदर्शन भी करते हैं. राजीव प्रताप रूडी कुल 5 बार लोकसभा सांसद और 1 बार राज्यसभा सांसद रहे हैं. ​उन्होंने लोकसभा चुनाव 1996, 1999 (छपरा) और फिर 2014, 2019 तथा 2024 (सारण) में जीत दर्ज की है.

सदन के सदस्य के अलावा पायलट भी हैं रूडी : इसके अलावा वे 2008 से 2014 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं. राजीव प्रताप रूडी लालू प्रसाद यादव से चुनाव हारे थे तब उन्हें राज्यसभा भेजा गया था. राजीव प्रताप रूडी एक बार लालू प्रसाद यादव को चुनाव हरा भी चुके हैं. आपको बता दें कि राजीव प्रताप रूडी पायलट भी है.

नवल किशोर यादव तीस साल से हैं विधान पार्षद : शिक्षा जगत से राजनीति में आए प्रमुख चेहरे में नवल किशोर यादव का नाम भी शामिल है. पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और शिक्षक हितों व उच्च शिक्षा के मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं. आपको बता दें कि भारतीय जनता पार्टी के विधान पार्षद नवल किशोर यादव, गुरु गोविंद सिंह कॉलेज में साइकोलॉजी के प्रोफेसर रह चुके हैं. पिछले 30 साल से वह विधान पार्षद हैं. नवल किशोर यादव शिक्षकों के मसले पर सदन के अंदर सरकार को घेरने का काम करते हैं.

''हम भले ही विधान पार्षद हैं, लेकिन हमारा काम शिक्षा जगत से ही जुड़ा है. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का में प्रतिनिधित्व करता हूं और शिक्षा में गुणात्मक सुधार के साथ-साथ शिक्षकों की मूलभूत समस्या को सदन के अंदर उठाना हमारी जिम्मेदारी होती है. जब कभी अवसर मिलता है तो हम छात्रों से भी रूबरू होते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं.''- नवल किशोर यादव, बीजेपी के वरिष्ठ नेता

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पूर्व शिक्षा मंत्री रह चुके हैं प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर : राजद विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ चंद्रशेखर भी प्रोफेसर रह चुके हैं. बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. चंद्रशेखर औरंगाबाद जिले के राम लखन सिंह यादव कॉलेज में प्राणी विज्ञान (Zoology) के प्रोफेसर रहे हैं. ​हलाकि वो मार्च 2026 में इस पद से रिटायर हुए हैं. बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. चंद्रशेखर मधेपुरा विधानसभा सीट से लगातार चार बार (2010, 2015, 2020 और 2025) विधायक चुने गए हैं.

रामानंद यादव रह चुके हैं प्रोफेसर : डॉ. रामानंद यादव राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं. रामानंद यादव भी प्रोफेसर रह चुके हैं. राष्ट्रीय जनता दल के विधायक डॉ. रामानंद यादव रसायन विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं. वह पटना यूनिवर्सिटी के बीएन कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे, फरवरी 2026 में वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं.
डॉ रामानंद यादव बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

डॉ संजीव रह चुके हैं चार बार विधान पार्षद : डॉ. संजीव कुमार सिंह जदयू के विधान पार्षद हैं और शिक्षक समुदाय से जुड़े रहे हैं. डॉ संजीव सिंह भी प्रोफेसर हैं. वो मोकामा स्थित राम लखन सिंह महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं. वह कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार बिहार विधान परिषद के सदस्य चुने जाते रहे हैं. डॉ संजीव विधान परिषद में शिक्षा और विश्वविद्यालयों के मुद्दे उठाते हैं. आपको बता दें कि डॉ. संजीव कुमार सिंह कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार 4 बार (वर्ष 2009 के उपचुनाव, 2011, 2017 और 2023) चुनाव जीत चुके हैं.

''हम कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. शिक्षा से जुड़े मुद्दों को सदन में उठते रहते हैं. शिक्षा में गुणात्मक सुधार और शिक्षकों की समस्या को लेकर सदन में गंभीर मुद्दों को हम सदन के अंदर जोरदार तरीके से उठते हैं. कभी वक़्त मिला तो छात्रों के साथ इंटरेक्शन भी कर लेते हैं. सबसे अहम यह है कि अधिकारियों के रवैया के चलते शिक्षकों के वेतन में काफी लेट लतीफी होती है. अधिकारियों के रवैया के चलते सरकार की फजीहत भी होती है.''- डॉक्टर संजीव कुमार सिंह, MLC, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र

अशोक चौधरी शिक्षा मंत्री रहते हुए बने प्रोफेसर : बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी का नाम इन दिनों सुर्खियों में है. आमतौर पर लोग पहले प्रोफेसर बनते हैं और फिर बाद में राजनीति में आते हैं, लेकिन अशोक चौधरी अपवाद साबित हुए. शिक्षा मंत्री रहते हुए अशोक चौधरी ने व्याख्याता पद के लिए आवेदन किया और वह चयनित भी हुए. वर्तमान में अशोक चौधरी पटना के एएन कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस विषय के प्रोफेसर हैं. वर्तमान में अशोक चौधरी बिहार सरकार में मंत्री हैं.

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''हमारे पिताजी की इच्छा थी कि हम प्रोफेसर बनें, उन्होंने छात्र जीवन में ही हमसे कमिटमेंट कराया था कि जब कभी वैकेंसी निकलेगी तो आप उसमें शामिल होंगे. हमने पिताजी को किया हुआ वादा को पूरा किया. इस बात को लेकर परिवार में लंबा विमर्श चला कि हमें शिक्षा मंत्री रहते हुए फॉर्म भरना चाहिए या नहीं? सहमति इस बात पर बनी कि अगर हमारे पास आर्हता है तो हमें परीक्षा में शामिल होना चाहिए. देश में कम ऐसे लोग होंगे जो मंत्री रहते हुए प्रोफेसर बने, कम से कम बिहार में तो यह पहला उदाहरण है.''- अशोक चौधरी, मंत्री, बिहार

अखिलेश प्रसाद सिंह भी रह चुके हैं मंत्री : कांग्रेस पार्टी नेता और राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह भी प्रोफेसर हैं. अखिलेश प्रसाद सिंह केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. कांग्रेस पार्टी ने अखिलेश प्रसाद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया था. वर्तमान में डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह एन कॉलेज में प्रोफेसर हैं. वो भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हैं. आपको बता दें कि डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह ​वर्ष 2004 से 2009 तक मोतिहारी सीट से लोकसभा सांसद और केंद्र सरकार (UPA) में कृषि तथा उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री रहे. वर्ष 2000 से 2004 तक अरवल से विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रहे.

आरजेडी के प्रो. मनोज झा राज्यसभा सांसद : मनोज झा दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजिक कार्य विभाग के प्रोफेसर हैं. मनोज झा राष्ट्रीय जनता दल में ताकतवर नेता माने जाते हैं. पार्टी ने शुरूआती दौर में इन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी थी. जब तेजस्वी राजनीति में आये थे तब इन्होंने तेजस्वी यादव को राजनीति के गुर भी सिखाये थे. वो राज्य सभा सांसद हैं. दूसरी बार राजद ने मनोज झा को राज्यसभा भेजा है. मनोज झा राज्यसभा में पार्टी के पक्ष को मजबूती से रखते हैं.

डॉ राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता बीजेपी से एमएलसी: बिहार विधान परिषद में भाजपा के उपनेता प्रो. डॉ. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस, पटना में प्रोफेसर हैं. वे वाणिज्य विषय के प्रोफेसर हैं. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए रहे हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के साथ राजेंद्र प्रसाद गुप्ता के पारिवारिक संबंध हैं. भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता दो बार बिहार विधान परिषद के सदस्य (MLC) बने हैं. ​पहली बार 11 मई 2006 से 10 मई 2012 तक और ​दूसरी बार 17 मार्च 2021 को विधान पार्षद बने हैं.

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प्रो. राम वचन राय जेडीयू एमएलसी : वर्तमान में बिहार विधान परिषद के उपाध्यक्ष हैं. राम बच्चन राय जनता दल यूनाइटेड में हैं और वे राज्यपाल कोटे से मनोनीत विधान पार्षद हैं. वह वर्तमान में बिहार विधान परिषद के उप-सभापति भी हैं. जनता दल यूनाइटेड के अंदर प्रशिक्षण के कार्य को देखते हैं. रामबचन राय पटना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके हैं और वह हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में काम कर चुके हैं.

प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव : सारण स्नातक क्षेत्र से प्रो. वीरेन्द्र नारायण यादव विधान पार्षद हैं. डॉ वीरेंद्र नारायण यादव जनता दल यूनाइटेड से सम्बद्ध हैं. ये जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा में हिंदी विषय के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रह चुके हैं. शिक्षकों का पक्ष यह सदन के पटल पर मजबूती से रखते रहे हैं.

प्रोफेसर और दलित चिंतक डॉ. संजय पासवान: डॉ. संजय पासवान पटना विश्वविद्यालय में मुख्य रूप से श्रम एवं समाज कल्याण (LSW) विभाग के प्रोफेसर रह चुके हैं. राजनीति के साथ-साथ उनकी पहचान एक प्रखर दलित चिंतक के रूप में भी है. उनके राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, जिसमें वे एक बार लोकसभा सांसद और एक बार बिहार विधान परिषद के सदस्य (MLC) रहे हैं.

वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री: उन्होंने पहली बार वर्ष 1999 के आम चुनाव में बिहार की नवादा लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी. 13वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में, वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, सामाजिक न्याय और अधिकारिता, तथा मानव संसाधन विकास (HRD) जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में राज्य मंत्री रहे.

अन्य दलों का सफर और भाजपा में वापसी: वर्ष 2004 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद वे कुछ समय के लिए राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) में भी रहे. उन्होंने 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव आरजेडी के सिंबल पर लड़ा था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसके बाद वे 2008 में पुनः भाजपा में वापस लौट आए.

संगठन और विधान परिषद में भूमिका: भाजपा में वापसी के बाद उन्होंने पार्टी के अनुसूचित जाति (SC) मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण कार्य किया. संगठन में सक्रिय भूमिका को देखते हुए मई 2018 में भाजपा ने उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया, जहां वे मार्च 2024 तक इस गरिमामयी पद पर बने रहे.

बौद्धिक योगदान और ख्याति: संजय पासवान राजनीति के साथ-साथ अकादमिक और लेखन क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं. उनके द्वारा संपादित की गई 11 खंडों की 'एन्साइक्लोपीडिया ऑफ दलित्स' (Encyclopaedia of Dalits) को देश और दुनिया में काफी ख्याति मिली है, जिसे दलित विमर्श और शोध के क्षेत्र में एक बड़ा बौद्धिक योगदान माना जाता है.

कैसे निभाते हैं दोहरी जिम्मेदारी? : यदि कोई विश्वविद्यालय या कॉलेज का शिक्षक विधायक, विधान पार्षद या सांसद चुना जाता है, तो उसकी सेवा स्थिति संबंधित विश्वविद्यालय अधिनियम और सेवा नियमों के अनुसार तय होती है. कई मामलों में अध्ययन, अवकाश, असाधारण अवकाश या अन्य वैधानिक प्रावधान लागू किए जाते हैं. नियमित अध्यापन संभव नहीं होने पर संस्थान के द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है.

शिक्षा का राजनीति में महत्व : राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे के अनुसार, बिहार की राजनीति में प्रोफेसरों का सक्रिय होना एक पुराना चलन है, जिसका उद्देश्य शिक्षा जगत में सुधार लाना है. शिक्षा में गुणात्मक सुधार के माध्यम से ही राज्य से पलायन को कम किया जा सकता है, इसलिए शिक्षा जगत से राजनीति में आने वाले प्रतिनिधियों से ठोस कार्यों की अपेक्षा की जाती है.

''बिहार के राजनीति में अतीत में भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं, जब प्रोफेसर राजनीति के क्षितिज पर देखे गए हैं. तमाम दलों में कॉलेज में पदस्थापित प्रोफेसर विधायक, विधान पार्षद या सांसद हैं. हम जैसे लोगों की चिंता भी शिक्षा में सुधार को लेकर है. शिक्षा में सुधार होगा तभी बिहार से पलायन काम हो सकता है. प्रोफेसर को राजनीति में छूट देने के पीछे भी तर्क यही दिया जाता था कि इससे शिक्षा जगत की बेहतरी होगी.''- सुनील पांडे, राजनीतिक विश्लेषक

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