ETV Bharat / bharat

Explainer: क्या बिहार में 10 साल बाद खत्म होगी शराबबंदी?.. जानिए फायदा ज्यादा हुआ या नुकसान

क्या बिहार में शराबबंदी खत्म होगी? सत्ता पक्ष की तरफ से समीक्षा की मांग के बाद अटकलें शुरू हो गई है. पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट..

Bihar Liquor Ban
बिहार में शराबबंदी पर समीक्षा की मांग (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Bihar Team

Published : February 19, 2026 at 8:44 PM IST

15 Min Read
Choose ETV Bharat
  • रिपोर्ट: डॉ. रंजीत कुमार

पटना: अप्रैल 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किया गया था. विधानसभा में सर्वसम्मत प्रस्ताव के जरिए शराबबंदी को मूर्त रूप दिया था. जब बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू किया गया था, तब महागठबंधन की सरकार थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने भी पक्ष में आवाज बुलंद की थी. तमाम राजनीतिक दलों ने एक सुर से इस कानून का समर्थन किया था लेकिन बदलते वक्त के साथ सियासी दलों की राय भी बदलने लगी. कई दलों के नेता समीक्षा की मांग करने लगे. अब तो एनडीए के भीतर से ही आवाज उठने लगी है. जिस वजह से चर्चा शुरू हो गई है कि क्या 10वें साल में शराब से प्रतिबंध हटने वाला है?

शराबबंदी से महिलाएं काफी खुश: इससे पहले कि सियासी दलों के नेताओं की मांग और इसके आर्थिक पहलू पर चर्चा करें, उससे पहले ये समझना होगा कि आधी आबादी क्या सोचती है क्योंकि नीतीश कुमार ने महिलाओं की मांग पर ही 2015 के विधानसभा चुनाव में इसे लागू करना का वादा किया था. मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा की काली देवी और बेबी देवी काफी खुश हैं. वे कहती हैं कि जब से शराबबंदी कानून लागू हुआ है. घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अपराध में कमी आई है. हमलोग तो सरकार से आग्रह करेंगे कि इसे वापस न लें.

बिहार में शराबबंदी पर समीक्षा की मांग तेज (ETV Bharat)

"शराबबंदी कानून बेहतर कानून है और इसके लिए हम लोग नीतीश कुमार के प्रति आभार व्यक्त करते हैं. राज्य के अंदर शराबबंदी कानून लागू होने से अमन चयन कायम हुआ है और महिलाएं सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. शराबबंदी राज्य के अंदर हर हाल में लागू होना चाहिए और इसे सख्ती के साथ लागू किया जाना चाहिए."- बेबी देवी, स्थानीय, नालंदा

शराबबंदी पर सत्ता पक्ष से उठी आवाज: बजट सत्र के दौरान आरएलएम विधायक माधव आनंद ने नीतीश कुमार की मौजूदगी में बिहार विधानसभा में शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग कर दी. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हमेशा से ऐतिहासिक निर्णयों के लिए जाने जाते हैं. अपने शासनकाल में कई अभूतपूर्ण फैसले लिए, जिनमें शराबबंदी कानून भी शामिल है लेकिन अब उसमें समीक्षा करने का समय आ गया है. विधायक ने कहा कि जब समीक्षा होगी, तभी पता चलेगा कि लक्ष्य प्राप्त हुए हैं या नहीं? माधव आनंद ने कहा कि उनको विश्वास है कि सीएम जरूर शराबबंदी की समीक्षा करेंगे.

"सत्ता पक्ष और विपक्ष ने शराबबंदी का एक सुर में समर्थन किया था लेकिन मैं आसन के माध्यम से आदरणीय मुख्यमंत्री जी को कहना चाहता हूं कि सर वो वक्त आ गया है, जहां शराबबंदी की भी समीक्षा होनी चाहिए. अच्छे ढंग से लागू किया जाए. अवेयरनेस पर काम किया जाए और कानून में जहां भी संशोधन की आवश्यकता पड़े, संशोधन करते रहिये. सर आप हमेशा से करते आए हैं, और इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए."- माधव आनंद, विधायक, राष्ट्रीय लोक मोर्चा

मांझी ने भी की समीक्षा की मांग: एनडीए के एक और पार्टनर हम पार्टी के संरक्षक जीतनराम मांझी ने भी शराबबंदी को लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इसके क्रियान्वयन में काफी गड़बड़ियां हैं. धड़ल्ले से शराब की होम डिलीवरी हो रही है. केंद्रीय मंत्री ने कहा कि शराबबंदी से राज्य सरकार को आर्थिक नुकसान भी हो रहा है. यही वजह है कि वह पहले भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से समीक्षा की मांग करते रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि इस बार सीएम पर जरूर विचार करेंगे और शराबबंदी की गंभीरता से समीक्षा करेंगे.

क्यों उठ रही है समीक्षा की मांग?: असल में शराबबंदी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. शुरुआती दौर में कानून बेहद सख्त था लेकिन धीरे-धीरे इसके पालन में नरमी बरती जाने लगी. पहले शराब पीने और घर में रखे जाने पर सख्त सजा का प्रावधान था. घर में शराब मिलने पर पूरे परिवार पर कार्रवाई और सख्त जेल की सजा मुकर्रर थी. किसी के घर में शराब मिलने पर घर को भी जब्त करने का प्रावधान था. गाड़ी में शराब मिलने पर गाड़ी जब्त कर ली जाती थी. उन दिनों कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने शराबबंदी कानून को ड्रैकोनियन कानून करार दिया था.

जेलों में हो गए क्षमता से अधिक बंदी: कड़े कानून को लेकर सरकार को कई बार पीछे भी हटाना पड़ा. सामाजिक संगठनों का दबाव और न्यायालय के दबाव में सरकार को कानून में संशोधन के लिए बाध्य किया. समय के साथ कानून में बदलाव भी हुए. न्यायालय के दबाव में सरकार ने मकान और गाड़ी जब्त करने के कानून को वापस लिया. जेल में क्षमता से अधिक बंदी होना भी सरकार के लिए चिंता का सबब बना. शराबबंदी लागू होने के दो साल बाद यानी कि 2018 में सरकार को कानून में संशोधन करना पड़ा.

शराब पीने वालों के प्रति रवैया हुआ नरम: संशोधन के तहत शराब पीने वालों को लेकर सरकार थोड़ी नरम हुई और पहली बार शराब पीते पकड़े जाने पर सीधे जेल की बजाय जुर्माने का विकल्प दिया गया. शराब पीकर पहली बार पकड़े जाने पर ₹5000 जुर्माना देकर छूटने का प्रावधान है लेकिन दूसरी बार पकड़े जाने पर सजा थोड़ी कड़ी की गई. परिवार के सभी वयस्क सदस्यों पर सामूहिक कार्रवाई का प्रावधान नरम किया गया.

ETV Bharat GFX
ETV Bharat GFX (ETV Bharat)

जुर्माना भरने के बाद रिहाई: पहली बार पकड़े जाने पर अगर कोई व्यक्ति पहली बार शराब पीते हुए या नशे की हालत में पकड़ा जाता है तो उसे तुरंत जेल नहीं भेजा जाता है. पकड़े जाने पर कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) द्वारा ₹2,000 से ₹5,000 तक का जुर्माना लगाया जाता है और फिर छोड़ दिया जाता है. यदि अपराधी जुर्माना भरने में असमर्थ रहता है तो उसे 30 दिनों की जेल काटनी पड़ सकती है. जुर्माना भरने के बाद व्यक्ति को थाने या कोर्ट से ही रिहा किया जा सकता है.

दूसरी बार पीते पकड़े जाने पर जेल: दूसरी बार पकड़े जाने पर कानून को थोड़ा और सख्त किया गया है. अगर कोई व्यक्ति एक बार पकड़े जाने के बाद दोबारा शराब पीते हुए पकड़ा जाता है तो नियम काफी सख्त हैं. दूसरी बार पकड़े जाने पर जुर्माने का कोई विकल्प नहीं होता. इसमें आरोपी कोअनिवार्य रूप से जेल भेजे जाने का प्रावधान है. दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को एक साल की कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ती है.

NITISH KUMAR
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (ETV Bharat)

कोर्ट में 8 लाख से अधिक मामले लंबित: शराबबंदी कानून लागू होने के बाद से बिहार में न्यायालय और जेलों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा. अदालत में जहां केसों का भरमार हो गया, वहीं जेल में भी क्षमता से अधिक कैदी हो गए. अदालतों और जेलों पर बढ़ते बोझ को देखते हुए प्रक्रिया में बदलाव करने के लिए बाध्य होना पड़ा. बिहार के न्यायालयों में शराबबंदी कानून को लेकर 8 लाख से अधिक मामले लंबित हैं.

9 वर्षों में 13 लाख गिरफ्तारी: शराबबंदी कानून के बाद से राज्य में अब तक करीब 8.43 लाख से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में लगभग 12.79 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया. इस दौरान 6 लाख से अधिक लोगों को अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया.

जहरीली शराब से 190 मौतें: शराबबंदी कानून का साइड इफेक्ट भी सामने आया है. इसके बाद से राज्य के अंदर जहरीली शराब से बेतहाशा मौत के मामले सामने आए हैं. जहरीली शराब से मौत के मामले में सारण क्षेत्र हॉटस्पॉट की तरह है. साल 2016 से लेकर साल 2025 के बीच जहरीली शराब से राज्य के अंदर 190 से अधिक लोगों की मौत हुई है. दीपावली, छठ और होली त्यौहार के दौरान जब बाहर से लोग आते हैं, उस दौरान मौत का सिलसिला बढ़ जाता है.

ETV Bharat GFX
ETV Bharat GFX (ETV Bharat)

सरकारी दस्तावेज में आंकड़े कम: हालांकि सरकारी आंकड़ों में मौत की संख्या कम बताई जाती है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2016 में जहरीली शराब से 6 लोगों की मौत हुई थी. 2017 और 2018 में कोई मौत नहीं हुई. साल 2019 में जहरीली शराब से 9 लोगों की मौत हुई. 2020 में 6 लोगों की जान गई. 2021 में सिर्फ दो लोगों की मौत बताई गई, जबकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उस वर्ष 66 लोगों की मौत जहरीली शराब से होने की बात सामने आई थी.

साल 2022 में हुई सबसे अधिक मौत: साल 2022 में मौत के आंकड़ों में जबरदस्त उछाल आया और इस साल जहरीली शराब से 114 लोगों की मौत हुई. साल 2023 में जहरीली शराब से मौत को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा तो सामने नहीं आया लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2023 में 30 से अधिक लोगों की मौत जहरीली शराब से हुई.

राज्य को राजस्व का भारी नुकसान: शराबबंदी लागू होने के बाद से बिहार सरकार को राजस्व का नुकसान भी हुआ. जब 2016 में शराबबंदी कानून लागू किया गया था, तब बिहार सरकार को शराब से 3142 करोड़ रुपये का आय होता था. आमतौर पर यह माना जाता है कि राज्य को कुल आय का 12 से 15% के बीच आय शराब से होता है. बिहार सरकार का बजट 3 लाख 47000 करोड़ का है. इस हिसाब से आज की तारीख में बिहार को हर साल लगभग 40000 करोड़ रुपये का रिवेन्यू लॉस होता है.

NITISH KUMAR
नीतीश कुमार (ETV Bharat)

शराबबंदी पर करोड़ों खर्च: शराबबंदी के बाद से एक तरफ जहां सरकार का इनकम बंद हो गया, वहीं दूसरी तरफ शराबबंदी को लागू करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करना पड़ रहा है. बिहार सरकार को पूर्ण शराबबंदी लागू करने के लिए हर साल 800 करोड़ से लेकर 1000 करोड़ के बीच खर्च करना पड़ता है. मतलब कि सरकार को शराबबंदी को सफल बनाने के लिए हर साल करोड़ों खर्च करना पड़ रहा है, बावजूद इसके शराब माफिया राज्य के अंदर सक्रिय हैं.

एनडीपीएस के मामलों में भी वृद्धि: इतनी ही नहीं शराबबंदी लागू होने के बाद से बड़ी संख्या में युवा वैकल्पिक नशा की ओर मुड़ चुके हैं. राज्य के अंदर दूसरे नशा के सामग्री का कारोबार 30 से 40% तक बढ़ चुका है. बिहार में युवा गंजा, ब्राउन शुगर, डोडा, नशीली गोलियां और सूखा नशा का प्रयोग कर रहे हैं. राज्य में एनडीपीएस के मामलों में भी 30% का इजाफा हुआ है. 2016 में बिहार में एनडीपीएस एक्ट के तहत 518 ड्रग-संबंधित मामले दर्ज हुए थे. 2024 तक यह संख्या बढ़कर 2,411 तक पहुंच गई, यानी कि दर्ज मामलों की संख्या में चार गुना तक का इजाफा हुआ है.

शराबबंदी पर NFHS-5 सर्वेक्षण के आंकड़े: आर्थिक मोर्चे पर शराबबंदी भले ही बिहार के लिए बड़ी चुनौती हो, लेकिन आंकड़े गवाह है कि इससे प्रदेश में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले. एक रिसर्च के मुताबिक, शराब पीने से वैवाहिक जीवन पर गहरा असर पड़ता है. NFHS-5 यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 83 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उनके पति काम से लौटकर रोज शराब का सेवन करते थे, उनके साथ मारपीट करते थे. वहीं जिन महिलाओं के पति शराब नहीं पीते थे उनकी संख्या 34 फीसदी थी.

NITISH KUMAR
शराबबंदी के कारण नीतीश सरकार से महिलाएं खुश (ETV Bharat)

शराबबंदी पर द लैंसेट की रिपोर्ट : वहीं द लैंसेट की रिपोर्ट (IFPRI- अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान) के अनुसार शराबबंदी से स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा है. जो लोग रोज शराब पीते थे, उसमें कमी आई है. महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और उनके मानसिक तनाव में कमी देखी गई.

यौन हिंसा के मामलों में गिरावट : एक्सपर्ट की माने तो यह आंकड़ें बताते है कि भले ही शराबबंदी लागू होने से राजस्व में सरकार को नुकसान हुआ, लेकिन स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिले. इससे न सिर्फ यौन हिंसा में कमी आई, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा में भी सुधार हुआ.

शराबबंदी पर विपक्ष हमलावर: विपक्ष लगातार शराबबंदी को लेकर सवाल उठाता रहा है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत तमाम नेता सरकार पर हमलावर है. कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन समीक्षा की मांग करते हुए कहते हैं कि बिहार में शराब की होम डिलीवरी होती है. वे तो यहां तक आरोप लगाते हैं कि अगर विधानसभा में विधायकों का ब्लड टेस्ट हो जाए तो शराबबंदी की सच्चाई सामने आ जाएगी.

Bihar Liquor Ban
कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन (ETV Bharat)

"शराबबंदी एक अच्छा फैसला है लेकिन बिहार में शराबबंदी पूरी तरह असफल रही है. शराब माफियाओं का राज है और अवैध शराब का कारोबार फल फूल रहा है. हम लोगों की मांग है कि शराबबंदी कानून की समीक्षा होनी चाहिए."- अभिषेक रंजन, विधायक, कांग्रेस

'शराबबंदी असफल, जवाब दे सरकार': सीपीएम विधायक अजय कुमार भी मानते हैं कि शराबबंदी अब सफल प्रयोग बनकर रह गई है. वे कहते हैं, 'बिहार में शराबबंदी असफल साबित हुई है और यह पुलिस पदाधिकारी के कमाई का साधन बन गया है. लोग जहरीली शराब से मार रहे हैं. जब राज्य में शराबबंदी है तो दूसरे राज्यों से कैसे शराब पहुंच रही है? सरकार को यह भी बताना चाहिए.'

क्या करेगी सरकार?: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार कहते रहे हैं कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा में कमी आई और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है. जेडीयू का आधिकारिक रुख अब भी कानून के समर्थन में है. पूर्व मद्य निषेध मंत्री और जेडीयू विधायक रत्नेश सदा कहते हैं कि शराबबंदी से कई तरह के फायदे हैं. महिलाएं इससे काफी खुश है. इसलिए हमें नहीं लगता कि कानून में कोई दिक्कत है.

Bihar Liquor Ban
पूर्व मंत्री सह जेडीयू विधायक रत्नेश सदा (ETV Bharat)

"शराबबंदी लागू होने के बाद से राज्य में अमन चैन है. अब कोई शराब पीकर इधर-उधर नहीं करता है. शराबबंदी से महिलाएं खुश हैं और सुरक्षित महसूस कर रही हैं."- रत्नेश सदा, जेडीयू विधायक सह पूर्व मद्य निषेध मंत्री, बिहार सरकार

क्या कहते हैं जानकार?: वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे कहते हैं कि शराबबंदी कानून को बिहार में नेक नीयत से लागू किया गया था. नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू करते हुए मजबूत इरादे का परिचय दिया था लेकिन 9 साल बीत जाने के बाद इसे जिस तरीके से लागू होना चाहिए था, उस तरीके से लागू नहीं हुआ है. वे भी मानते हैं कि आसानी से लोगों को शराब उपलब्ध हो जाती है. लिहाजा सरकार को इसे कड़ाई से लागू करने पर नए सिरे से काम करना होगा, तभी इसका मकसद कामयाब होगा.

Bihar Liquor Ban
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे (ETV Bharat)

"2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेक इरादे और साहस के साथ शराबबंदी कानून लागू किया था लेकिन आज की तारीख में घर-घर तक शराब पहुंच रही है. इसके परिणाम भी देखने को मिले हैं. हालांकि समाज में कोई शराब पीकर बदमाशी नहीं करता है लेकिन शराबबंदी को सही अर्थ में अब भी लागू किए जाने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है."- अरुण पांडे, वरिष्ठ पत्रकार

ये भी पढ़ें:

क्या बिहार में खत्म हो जाएगी शराबबंदी? जीतन राम मांझी के बाद राबड़ी देवी ने खोला मोर्चा

'शराबबंदी से बिहार को बहुत नुकसान हो रहा है, CM नीतीश को सोचना चाहिए', बोले जीतन राम मांझी

बिहार में सत्ता पक्ष ने की शराबबंदी पर समीक्षा की मांग, विजय चौधरी बोले- इसकी जरूरत नहीं

बिहार में शराबबंदी कानून की समीक्षा पर संग्राम, NDA के नेताओं में उभरे मतभेद