EXPLAINER: झारग्राम में पीएम मोदी का झालमुड़ी दांव बिहार में 'हिट', जानिए कितना है टर्नओवर
पीएम मोदी के झालमुड़ी खाते ही कैसे 10 रुपये का यह स्नैक बन गया लाखों लोगों के रोजगार, स्वाद, सेहत और सियासत का बड़ा केंद्र..पढ़ें-

Published : May 6, 2026 at 9:00 PM IST
|Updated : May 6, 2026 at 9:07 PM IST
पटना : सड़क किनारे ठेले पर मिलने वाली 10 रुपये की झालमुड़ी देखने में भले एक साधारण नाश्ता लगे, लेकिन इसकी एक अलग ही 'चटपटी' दुनिया है. यह सिर्फ मुरमुरा, प्याज, मसाला और सरसों तेल का मेल नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का मजबूत आधार है. कागजों में झालमुड़ी का टर्नओवर नहीं दिखता लेकिन यही करोड़ों परिवारों का सहारा है. किसान से लेकर मुरमुरा तैयार करने वाले मजदूर, तेल मिल, मसाला उद्योग, ठेला चलाने वाले छोटे दुकानदार—सभी की कमाई कहीं न कहीं इस छोटे स्नैक से जुड़ी है.
पीएम मोदी के वीडियो से बढ़ी मांग : बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी का सड़क किनारे झालमुड़ी खाते हुए वीडियो तेजी से वायरल हुआ. इसके बाद सोशल मीडिया पर झालमुड़ी चर्चा का बड़ा विषय बन गई. बिहार, झारखंड, यूपी और ओडिशा जैसे राज्यों में भी लोगों ने इसे नए नजरिए से देखना शुरू किया. पटना और मुजफ्फरपुर में कई दुकानदारों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में बिक्री में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
Jhalmuri break in Jhargram! pic.twitter.com/LJNjEojAW4
— Narendra Modi (@narendramodi) April 19, 2026
छोटे दुकानदारों की बढ़ी कमाई : पटना के मौर्यालोक परिसर के बाहर भुंजा बेचने वाले संदीप कुमार बताते हैं कि पहले ग्राहक 'भुंजा' मांगते थे, लेकिन अब अधिकतर लोग 'झालमुड़ी' के नाम से इसे खरीद रहे हैं. मांग बढ़ने से उनकी आमदनी में अच्छा इजाफा हुआ है.
''पिछले दो-तीन दिनों के अंदर बिक्री में करीब 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है. पहले ग्राहक 'भुंजा' मांगते थे, लेकिन अब अधिकांश लोग 'झालमुड़ी' के नाम से ही इसे खरीद रहे हैं. भुंजा में रोस्टेड अनाज, प्याज, हरी मिर्च, अचार का मसाला और तीखी चटनी मिलाई जाती है, जिससे इसका स्वाद और भी लाजवाब हो जाता है. प्रधानमंत्री ने इसे बंगाल में खाया जिसके बाद मांग बढ़ी है और मुनाफा भी बढ़ा है.''- संदीप कुमार, झालमुड़ी विक्रेता
झालमुड़ी विक्रेताओं पर बढ़ा बिक्री का लोड : मुजफ्फरपुर के पानी टंकी चौक पर पिछले 20 वर्षों से झालमुड़ी बेच रहे रत्नेश कुमार कहते हैं कि पहले रोज 500 से 600 रुपये की कमाई होती थी, लेकिन अब यह बढ़कर 3000 से 5000 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच रही है. शहर के कई अन्य विक्रेताओं ने भी यही अनुभव साझा किया है.
''पानी टंकी चौक पर पिछले 20 साल से यह काम कर रहे हैं, लेकिन इतनी मांग पहले कभी नहीं देखी. अब रोजाना हजारों रुपये की बिक्री हो रही है. काम का दबाव पहले से काफी बढ़ गया है और ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ रही है.''- रत्नेश कुमार, झालमुड़ी विक्रेता, मुजफ्फरपुर

कैसे बनती है झालमुड़ी? : झालमुड़ी को बनाना बहुत आसान है. सबसे पहले बारीक कटा प्याज, टमाटर, हरी मिर्च को काट लें. फिर उबले आलू और धनिया पत्ती को मैश कर लें. फिर मुरमुरे यानी पफ्ड राइस को कटे प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और उबले आलू के मैश किए हुए हिस्से को लेकर उसमें सरसों का तेल, नींबू का रस निचोड़ें, भुनीं मूंगफली, चना के साथ नमक और चाट मसाला अपने स्वाद के अनुसार मिलाएं. झटपट तैयार हो गई चटपटी झालमुड़ी.
20 रुपये में छिपी बड़ी इकोनॉमी : झालमुड़ी की असली ताकत इसकी सप्लाई चेन में छिपी है. इसका सबसे बड़ा हिस्सा मुरमुरा है, जो चावल से बनता है. यानी धान की खेती से लेकर राइस मिल तक कई लोगों को काम मिलता है. यह छोटा सा बिजनेस न जाने कितने परिवारों का भरण पोषण कर रहा है.

छोटा धंधा करोड़ों की अर्थव्यवस्था : सरसों तेल के लिए किसान, तेल मिल और पैकेजिंग उद्योग काम करते हैं. प्याज, आलू, हरी मिर्च, नमकीन, मसाले और नींबू की सप्लाई अलग से रोजगार पैदा करती है. अंत में सड़क किनारे बैठा एक ठेला वाला इसे ग्राहक तक पहुंचाता है. यही वजह है कि यह छोटा स्नैक करोड़ों रुपये की लोकल अर्थव्यवस्था से जुड़ा माना जाता है.
रेलवे प्लेटफॉर्म और ट्रेनों में झालमुड़ी : वैसे भी झालमुड़ी को 'रेल स्नैक' भी कहा जाता है. ट्रेन में भूख लगी हो तो कोई झालमुड़ी वाला आ जाए तो लोगों के मुंह में पानी आ जाता है. यह एक सस्ता और फायदेमंद विकल्प है. प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहे यात्रियों और सफर के दौरान जल्दी नाश्ता चाहने वालों के बीच यह सबसे पसंदीदा विकल्पों में शामिल है. कम कीमत, तुरंत तैयार होना और हल्का नाश्ता होने के कारण इसकी मांग रेलवे स्टेशनों पर हमेशा बनी रहती है. हजारों स्टेशनों पर यह स्नैक रोज बड़ी मात्रा में बिकता है.
स्वाद जो इसे अलग बनाता है : झालमुड़ी का स्वाद इसे दूसरे स्नैक्स से अलग बनाता है. भेलपुरी जहां मीठे-खट्टे स्वाद के लिए जानी जाती है, वहीं झालमुड़ी में सरसों तेल की तेज खुशबू और मसालों का तीखापन इसकी पहचान है. इसमें उबले आलू, प्याज, हरी मिर्च, चाट मसाला, नमकीन, इमली, धनिया और नींबू का मिश्रण इसे चटपटी बनाता है. यही वजह है कि युवा वर्ग में यह सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि एक ट्रेंड बन चुका है.

सेहत के लिहाज से भी बेहतर विकल्प : विशेषज्ञ मानते हैं कि सूखा भुंजा या 'झालमुड़ी' कई दूसरे तले हुए स्नैक्स की तुलना में हल्का और बेहतर विकल्प है. इसमें तेल कम होता है, मुरमुरा आसानी से पच जाता है और सब्जियों की वजह से फाइबर भी मिलता है. कम कैलोरी होने के कारण वजन नियंत्रित रखने वालों के बीच भी यह लोकप्रिय है. कई लोग मधुमेह और लीवर संबंधी समस्याओं में भी इसे हल्के नाश्ते के रूप में चुनते हैं. मसाला, नमक और मिर्च की मात्रा कितनी होगी ये ग्राहक बनाते वक्त ही खुद ही तय कर सकता है. यही खासियत भी है.
''भुंजा स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी फायदेमंद है, क्योंकि यह बिना तेल के भुने हुए अनाजों से तैयार होता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर और आवश्यक विटामिन भरपूर मात्रा में होते हैं. मधुमेह या लीवर संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग भी सूखा भुंजा खाना पसंद करते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में भुंजा भूनने का काम एक विशेष समुदाय द्वारा किया जाता है, जो पीढ़ियों से इस काम में लगा हुआ है. भुंजा बिहार में सामाजिक आर्थिक परिवेश में गहराइयों से जमा हुआ है.''- विद्यार्थी विकास, अर्थशास्त्री, एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस

करोड़ों का सालाना टर्नओवर : आर्थिक पहलू पर बात करते हुए विद्यार्थी विकास कहते हैं कि भुंजा का कारोबार पूरी तरह असंगठित क्षेत्र में आता है, इसलिए इसका सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन अगर बिहार के लगभग ढाई करोड़ परिवारों में से केवल एक प्रतिशत परिवार भी सप्ताह में एक बार भुंजा खाते हैं, तो अनुमान के तौर पर राज्य में रोजाना 18 से 20 लाख रुपये का भुंजा कारोबार होता है. ऐसे में इसकी बढ़ती मांग सीधे तौर पर छोटे दुकानदारों और असंगठित कामगारों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है.
सियासत से बाजार तक : जब किसी बड़े नेता या लोकप्रिय चेहरे से कोई चीज जुड़ती है, तो उसका असर सीधे बाजार पर दिखाई देता है. पीएम मोदी के झालमुड़ी खाने के बाद यही हुआ. जो स्नैक पहले सिर्फ लोकल पहचान रखता था, वह अचानक राष्ट्रीय चर्चा में आ गया. अब उद्योग जगत भी इसे एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है. फूड प्रोसेसिंग कंपनियां इसे पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बड़े बाजार में उतारने की संभावनाएं तलाश रही हैं.

''अब तक झालमुड़ी या भुंजा पूरी तरह असंगठित क्षेत्र का हिस्सा था, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा इसकी लोकप्रियता बढ़ने के बाद इसमें ब्रांडिंग और पैकेजिंग की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं. अगर फूड प्रोसेसिंग कंपनियां इसे सही तरीके से पैक कर बाजार में उतारें और इसके पोषण मूल्य को प्रमुखता से पेश करें, तो यह स्नैक बड़े स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है.''- एनके ठाकुर, उपाध्यक्ष, बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज
लोकल से ब्रांड बनने की तैयारी : उद्योग जगत का मानना है कि अगर झालमुड़ी को बेहतर पैकेजिंग, पोषण मूल्य और आधुनिक मार्केटिंग के साथ पेश किया जाए, तो यह बड़े ब्रांड के रूप में उभर सकता है. जिस तरह दूसरे रेडी-टू-ईट स्नैक्स बाजार में सफल हुए हैं, उसी तरह भुंजा और झालमुड़ी भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह बना सकते हैं. इससे छोटे विक्रेताओं को भी संगठित उद्योग से जुड़ने का मौका मिलेगा.
''यह समय झालमुड़ी को एक बड़े ब्रांड के रूप में स्थापित करने का है. जिस तरह बंगाल में लोग विक्टोरिया मेमोरियल के आसपास झालमुड़ी खाने के लिए जाते हैं, उसी तरह बिहार में भी इसकी एक मजबूत परंपरा है. अब अगर इसे बेहतर पैकेजिंग और मार्केटिंग के साथ पेश किया जाए, तो यह न केवल देश बल्कि विदेशों में भी अपनी जगह बना सकता है.''- केपी केसरी, बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और फूड प्रोसेसिंग उद्यमी

'छोटे विक्रेता बन सकते हैं संगठित उद्योग का हिस्सा' : उद्यमी केपी केसरी का मानना है कि जब किसी लोकप्रिय व्यक्ति या उच्च पद पर बैठे नेता द्वारा किसी चीज को अपनाया जाता है, तो उसका प्रभाव समाज पर तेजी से पड़ता है. यही वजह है कि झालमुड़ी अब एक लोकल स्नैक से आगे बढ़कर एक संभावित ब्रांड बनता नजर आ रहा है. वे यह भी उम्मीद जताते हैं कि आने वाले समय में इस क्षेत्र से जुड़े कई छोटे विक्रेता संगठित उद्योग का हिस्सा बन सकते हैं, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
सिर्फ नाश्ता नहीं, पहचान भी : आज झालमुड़ी सिर्फ भूख मिटाने का साधन नहीं है. यह रोजगार, संस्कृति, स्वाद, स्वास्थ्य और राजनीति—इन सभी का संगम बन चुकी है. बिहार में भुंजा और बंगाल में झालमुड़ी के रूप में यह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. पीएम मोदी के एक वीडियो ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया, लेकिन इसकी असली ताकत उन लाखों लोगों की जिंदगी में है, जिनका घर इसी छोटे से स्नैक से चलता है.
झालमुड़ी से 'चटपटी' जीत का जश्न : पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झालमुड़ी खाते हुए वीडियो ने इस लोकल स्नैक को राष्ट्रीय फलक पर चर्चा का हिस्सा बना दिया. अब बिहार में भी इसका असर साफ दिख रहा है, जहां बिहार का पारंपरिक 'भुंजा' और बंगाल की 'झालमुड़ी' फिर से ट्रेंड में लौट आयी है. वैसे बंगाल की जीत के बाद 'झालमुड़ी' पर सियासी ठप्पा भी लग चुका है. देशभर में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने झालमुड़ी खाकर बंगाल की जीत का जश्न मनाया.
बंगाल-बिहार की सांस्कृतिक समानता : 'भुंजा' और 'झालमुड़ी' का स्वाद और बनाने का तरीका एक जैसा है. मुरमुरा, चना, भुने अनाज, प्याज, हरी मिर्च, अचार का मसाला और तीखी चटनी से तैयार यह नाश्ता शाम की भूख मिटाने का सबसे सस्ता और लोकप्रिय विकल्प माना जाता है. बंगाल और बिहार के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों के कारण यह परंपरा दोनों राज्यों में समान रूप से हैं.
बिहार-बंगाल का झालमुड़ी इतिहास : इतिहास की बात करें तो बिहार और बंगाल का सांस्कृतिक जुड़ाव पुराना रहा है. वर्ष 1911 तक बिहार, बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जिसके कारण खान-पान की कई परंपराएं दोनों क्षेत्रों में समान रूप से विकसित हुईं. बंगाल में जिस स्नैक को 'झालमुड़ी' कहा जाता है, वही बिहार में 'भुंजा' के नाम से जाना जाता है. यही वजह है कि इस व्यंजन की जड़ें दोनों राज्यों में गहराई से जुड़ी हुई हैं.
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