गांव हो तो ऐसा.. एक ही विभाग में घर-घर मिली सरकारी नौकरी
बिहार का ऐसा गांव जहां हर घर सरकारी नौकरी है. सभी एक ही विभाग में या तो काम कर रहे हैं या फिर रिटायर हैं...पढ़ें-

Published : December 25, 2025 at 6:17 PM IST
रिपोर्ट: रत्नेश कुमार
गया : आज के दौर में सरकारी नौकरी जैसे रूठ गई है. लोग जितना इसे पाना चाहते हैं सरकारी नौकरी उतनी ही कठिन होती जा रही है. लेकिन एक वक्त था जब बिहार के छोटे से गांव के रहने वाले एक शख्स ने टेलीफोन विभाग में एंट्री ली, तो उसने पूरे गांव का माहौल ही बदल दिया. पहले जहां गांव में बेरोजगारी थी, वहीं आज हर घर खुशहाली है. लोग आज भी इस बदलाव का क्रेडिट उस शख्स को देते नहीं थकते. यहां के लोगों की सरकारी नौकरी पाने की कहानी अनूठी है.
हर घर सरकारी नौकरी वाला गांव : हम बात कर रहे हैं गयाजी के जमालपुर गांव की जिसे लोग आज भी 'टेलीफोन विभाग वाला गांव' के नाम से संबोधित करते हैं. इसकी वजह ये है कि इस गांव के हर घर से कोई न कोई सदस्य टेलीफोन विभाग से जुड़ा रहा है. इसकी शुरुआत साल 1950 से होती है. जब गांव का एक शख्स टेलीफोन विभाग को ज्वाइन करता है, उसकी मिलनसार छवि और लोगों को मदद करने की भावना ने अपने गांव की तस्वीर ही बदल दी. आज गांव के लोग मानते हैं कि उनके हालात बदलने वाला कोई और नहीं बल्कि 'भोला पासवान' ही हैं, जिसने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया.

टेलीफोन विभाग में गांव के 80 लोग : आज गांव की स्थिति ये है कि जमालपुर गांव से जुड़े लगभग 80 लोग टेलीफोन विभाग में या तो अपनी सेवाएं देकर रिटायर हो चुके हैं या फिर अभी भी वर्तमान नाम BSNL में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. यहां कदम-कदम पर टेलीफोन विभाग से जुड़े लोग दुआ-सलाम करते मिल जाएंगे. साल 2000 में दूर संचार विभाग से इसका नाम बदलकर BSNL हो गया था. आज भी गांव के कुछ युवा BSNL में जुड़कर अपना योगदान दे रहे हैं. गांव वालों ने बताया कि ज्यादातर लोग रिटायर हो चुके हैं. कुछ लोगों ने गांव को छोड़कर अब शहर में अपने बच्चों के पास शिफ्ट हो चुके हैं. कुछ की मौत भी हो चुकी है.
''1976 में मैं मैट्रिक पास कर धनबाद चला गया. वहां उस समय भोला पासवान जो कि टेलीफोन विभाग में सर्किल इंस्पेक्टर थे. उनसे संपर्क किया फिर सिग्नल मजदूर का काम मिला फिर लाइनमैन की नौकरी लगी. इसके बाद टेलीफोन विभाग की इस सरकारी नौकरी से मैं रिटायरमेंट हुआ. मैं 2020 में रिटायर हुआ हूं. यहां के लोग टेलीफोन विभाग में लाइनमैन, लाइन इंस्पेक्टर, टेक्नीशियन, साइड इंस्पेक्टर, सर्किल इंस्पेक्टर की सरकारी नौकरी में रहे हैं. टेक्नीशियन के पद से मैं रिटायरमेंट हुआ हूं.''- सरयू प्रजापति, टेलीफोन विभाग से रिटायर
गांव के टेलीफोन से कनेक्शन की कहानी : टेलीफोन विभाग वाला गांव के रूप में प्रसिद्ध जमालपुर गांव की कहानी 1950 के दौर से शुरू होती है. 1950 के आसपास के वर्षों से टेलीफोन विभाग की नौकरी में यहां के लोगों के जाने का सिलसिला शुरू हुआ. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ, तो वह बढ़ता ही गया. एक के बाद एक करके इस गांव के लगभग 80 लोग टेलीफोन विभाग की सरकारी नौकरी से जुड़ते चले गए. हालांकि सरकारी टेलीफोन विभागों की सेवाओं को वर्ष 2000 में भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनल) के नाम से बनाया गया. इसके बाद से इस विभाग में जाने वालों की संख्या में रिक्तियां कम होने के कारण कमी आने लगी. हालांकि टेलीफोन विभाग के लोगों के गांव के नाम से मशहूर जमालपुर के कई लोग आज भी बीएसएनल में नौकरी कर रहे हैं.

सबसे पहले भोला प्रसाद की लगी थी नौकरी : 1950 के आसपास के वर्ष में जमालपुर गांव के भोला प्रसाद की नौकरी टेलीफोन विभाग में हुई थी. भोला प्रसाद अत्यंत ही सामाजिक प्रवृत्ति के व्यक्तित्व के धनी थे. तब जमालपुर गांव बेरोजगारी के दंश से घिरा हुआ था. भोला प्रसाद ने अपनी गांव की स्थिति को सुधारने के लिए टेलीफोन विभाग में जमालपुर के लोगों को नौकरी के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. शुरू में तो कैजुअल तौर पर किसी तरह से जुड़वाया. फिर जुड़ने वाले लोगों की नौकरियां सरकारी होती चली गई.
''पहले मुझे प्राइवेट तौर पर लाइनमैन की नौकरी हुई. फिर यह नौकरी सरकारी हो गई. 1975 में जॉइनिंग किया था. 31 दिसंबर 2011 में रिटायरमेंट हुआ. यहां के बहुत से लोगों की नौकरी टेलीफोन विभाग में रही है. अधिकांश रिटायर हो गए. कुछ की मौतें भी हो गई है.''- शिवनंदन राम, टेलीफोन विभाग से रिटायर

नौकरी से खुशहाल है गांव : एक बार जो टेलीफोन विभाग से जुड़ाव का चलन शुरू हुआ. वह अगले कई दशकों तक चलता रहा. एक के बाद एक कर करीब 80 लोग टेलीफोन विभाग में सरकारी नौकरियां पाने में सफल रहे. जमालपुर गांव के भोला पासवान को इसका श्रेय आज भी गांव के लोग देते हैं. कहते हैं, कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो आज जमालपुर गांव इतना खुशहाल नहीं होता. उनके द्वारा नौकरियां दिलाने की पहल के कारण यहां खुशहाली आई. शिक्षा की स्थिति भी सुधारने का उन्होंने काम किया. यही वजह रही, कि जमालपुर गांव के लोग पढ़ लिखकर अब अलग-अलग नौकरियों में भी जाते रहे.
''गांव के लोगों ने जब मेरे दादाजी से बेरोजगारी की पीड़ा बताई. अपने परिवार या बेटों को भी टेलीफोन विभाग में नौकरी लगाने की बात कही, तो उन्होंने कईयों की नौकरी लगवा दी. पहले कैजुअल में फिर सरकारी नौकरी हो जाती थी. दादाजी के मार्गदर्शन में जमालपुर गांव के लोगों की नौकरी बिहार के डिहरी, गया में या अन्य स्थान पर ही नहीं, बल्कि झारखंड और गुजरात तक में होती रही.''- अजय कुमार, भोला पासवान के पोते

भोला पासवान की धनबाद में थी पोस्टिंग : भोला पासवान की पोस्टिंग धनबाद में थी. उनके गुजरे कई दशक हो गए. किंतु जमालपुर के लोग उन्हें नहीं भूले. उनके मार्गदर्शन में ही टेलीफोन विभाग में जमालपुर गांव के कई लोग सरकारी नौकरी पाए थे. इस संबंध में भोला पासवान के पोते अजय कुमार बताते हैं, कि मेरे दादाजी भोला पासवान टेलीफोन विभाग में धनबाद में पोस्टेड थे. टेलीफोन विभाग में उनका पद सर्किल इंस्पेक्टर का था. वह जब गांव आते थे, तो लोगों से मिलते थे. काफी मिलनसार और सामाजिक प्रवृत्ति के थे. गांव के लोगों की बात मानते थे. कोई समस्या होती थी, तो उसे दूर भी करते थे.
''इस गांव में पहले सभी के यहां टेलीफोन लगे थे. तब मोबाइल का दौर नहीं था. तब इस गांव में तकरीबन हर घरों में टेलीफोन होती थी. क्योंकि 80 लोग टेलीफोन विभाग से जुड़े थे, तो यह होना स्वाभाविक है. हमारे गांव के भोला पासवान टेलीफोन विभाग में सर्किल इंस्पेक्टर के पद पर थे. उन्होंने जमालपुर गांव के लोगों को धीरे-धीरे कर टेलीफोन विभाग की नौकरियों से जोड़ना शुरु किया था. किसी को लाइनमैन, किसी को लाइन इंस्पेक्टर, कोई टेक्नीशियन कोई सर्किल इंस्पेक्टर की नौकरी पर बहाल हुआ. शुरुआत में सभी को सरकार मास्टर रोल से काम देती थी. फिर कुछ सालों के बाद उनकी नौकरी सरकारी हो जाती थी.''- मिथिलेश कुमार, टेलीफोन विभाग से रिटायर्ड

शिक्षित है पूरा गांव : वहीं, इस संबंध में जमालपुर गांव के मिथिलेश कुमार बताते हैं, कि हमारे गांव का इतिहास 1950 के दशक से बेहतर होता चला गया. 1952 में इस गांव की कमेटी द्वारा विद्यालय संचालित की जाती थी, जो कि प्राइवेट होती थी. करीब 150 से अधिक घर जमालपुर गांव में है. कुछ घर को छोड़ दें, तो अधिकांश घर से नौकरी है. किंतु जमालपुर गांव की मुख्य पहचान टेलीफोन विभाग से जुड़ी हुई है. इस गांव को टेलीफोन विभाग के लोगों का गांव के नाम से जाना जाता है. यहां के रहने वाले टेलीफोन विभाग से कम से कम 80 लोग जरूर जुड़े रहे हैं. कई रिटायर हुए कुछ छिटपुट अब भी टेलीफोन विभाग का वर्तमान नाम बीएसएनएल विभाग में नौकरी कर रहे हैं, जिसमें सुरेंद्र पासवान समेत अन्य शामिल हैं.

''यहां के जितने लोग भी टेलीफोन विभाग से जुड़े सभी की नौकरी सरकारी हुई. काफी संख्या में जमालपुर से लोगों की नौकरी टेलीफोन विभाग में लगी. यह भोला पासवान की देन थी. अभी छिटपुट लोग हैं, जो टेलीफोन विभाग यानी कि आज के दौर के बीएसएनल की नौकरी से जुड़े हैं. हमारे घर से तीन रिटायर हुए, जिसमें मेरे भाई अखिलेश कुमार, सुरेंद्र प्रसाद, चंद्रिका प्रसाद शामिल है. एक तरफ से यह गांव अनोखा है, क्योंकि यहां एकमुश्त इतने लोग टेलीफोन विभाग की सरकारी नौकरी से जुड़े. ऐसा गांव और नजर नहीं आता देश में या बिहार में संभवत ऐसा कोई गांव नहीं होगा, जहां इतनी तादाद में लोग टेलीफोन विभाग की नौकरी से जुड़े होंगे.''- मिथिलेश कुमार, टेलीफोन विभाग से रिटायर हुए अखिलेश प्रसाद के भाई
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