बिहार की इन दो पंचायतों का सालाना टर्नओवर चकरा देगा दिमाग, देश-विदेश से देखने आते हैं लोग
गया की बसाढ़ी और विशुनपुर पंचायत खेती, डेयरी और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाकर आत्मनिर्भर बने. पढ़ें पूरी खबर-

Published : February 22, 2026 at 8:08 PM IST
रिपोर्ट- सरताज
गया : बिहार के गया जिले की दो पंचायतें आज विकास और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं. एक ओर बोधगया प्रखंड की बसाढ़ी पंचायत है, जहां योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन हुआ है. वहीं दूसरी ओर वजीरगंज प्रखंड का विशुनपुर गांव है, जिसने डेयरी और खेती के दम पर करोड़ों का सालाना टर्नओवर हासिल कर लिया है.
बसाढ़ी इज द बेस्ट : बोधगया से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित बसाढ़ी पंचायत मुख्यालय का आदर्श गांव बतसपुर है. आज इसे पक्की सड़कों, सोलर लाइट, स्कूलों और व्यवस्थित गलियों के लिए पहचाना जाता है. पंचायत मुख्यालय बतसपुर की 3000 की आबादी है. जहां पर गांव में प्राथमिक, मध्य और प्लस टू हाई स्कूल की सुविधा है.
10 साल में बदली तस्वीर : पिछले 10 वर्षों में पंचायत की तस्वीर बदली है, लेकिन पिछले 4 वर्षों में विकास कार्यों ने गति पकड़ी है. केंद्र और राज्य सरकार की अधिकांश ग्रामीण योजनाओं का यहां प्रभावी क्रियान्वयन हुआ है. पंचायत फंड में राजस्व भी इकट्ठा हो रहा है, जिससे योजनाओं की देखरेख और नए विकास कार्य किए जा रहे हैं.
घर-घर सस्ती गैस की आपूर्ति : बसाढ़ी पंचायत की खास पहचान गोबर गैस संयंत्र है. 50 से अधिक घरों में पाइपलाइन से गैस आपूर्ति हो रही है. यहां 25 रुपए प्रति यूनिट की दर से गैस मिलती है और एक परिवार का मासिक खर्च 200 से 300 रुपए तक सीमित है. यानी इन लोगों का LPG गैस सिलिंडर का खर्च भी बच रहा है.

गांव में 3000 यूनिट गोबर गैस उत्पादन : किसानों से 50 पैसे प्रति किलो गोबर खरीदकर गैस उत्पादन किया जाता है. यही नहीं, साथ में वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार कर 6 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा जाता है. लगभग 3000 यूनिट गैस का उत्पादन हो रहा है. महिलाओं के लिए यह योजना राहत लेकर आई है. धुएं से मुक्ति और आर्थिक बचत दोनों संभव हुई है.
किसानों के लिए 60 काउंटर वाली मंडी : बसाढ़ी पंचायत में 60 काउंटर वाला व्यवस्थित हाट बाजार संचालित है. यहां पर पानी की सुविधा के साथ महिला-पुरुष के लिए अलग-अलग शौचालय की भी व्यवस्था है. इससे किसानों को बड़ा फायदा होता है. यहां पर जिला के थोक खरीदार पहुंचते हैं और साग-सब्जी खरीदकर ले जाते हैं.

गांव में हाट बाजार : झारखंड के जामताड़ा जिले से आए जनप्रतिनिधियों ने इस मॉडल की सराहना की और माना कि ऐसी योजनाएं उनके राज्य में सीमित हैं. गांव हाट बाजार योजना किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बनी है. पूरे मॉडल को देखकर उन्होंने इसके झारखंड में होने की इच्छा जताई.
''झारखंड सरकार में ऐसी योजना नहीं है, बिहार सरकार की 'मुख्यमंत्री ग्रामीण विकास योजना' के तहत हाट बाजार जिसे दो तरह से लागू किया जाता है, एक मनरेगा के तहत और दूसरा सात निश्चय के तहत लागू किया जाता है, ये स्थानीय किसानों के लिए बड़ी लाभदायक बाजार है. इसे झारखंड सरकार को भी अपनाना चाहिए.''- लता मरांडी, मुखिया, चपुड़िया पंचायत, जामताड़ा, झारखंड

सबको पसंद है बसाढ़ी पंचायत मॉडल : बोधगया आने वाले विदेशी पर्यटक भी आकर बसाढ़ी पंचायत का बेहतरीन प्रबंधन देखते हैं, अभी झारखंड राज्य से लगभग 50 लोगों ने आकर यहां के कार्यों को देखा और समझा है, इस में अधिकारी, पंचायत मुखिया, वार्ड सदस्य, पंचायत सचिव और झारखंड की दीदियां शामिल थीं.
शिक्षा और व्यवस्थित आधारभूत ढांचा : बसाढ़ी पंचायत में 5 मध्य विद्यालय, एक प्लस टू हाई स्कूल, 8 आंगनबाड़ी केंद्र, 2 स्वास्थ्य केंद्र, खेल मैदान, पार्क और मिनी प्रखंड भवन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं. सात निश्चय योजना के तहत पक्की गली-नाली और सोलर स्ट्रीट लाइट लगाए गए हैं.

''गांव में शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, कृषि, खेल, सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है. गांव में 3 एकड़ भूमि पर खेल ग्राउंड है, 50 डिसमिल पर एक भव्य पार्क है, गोवर्धन 50 डिसमिल पर बना हुआ है, 2 छठघाट बने हुए हैं, 8 आंगनबाड़ी केंद्र, 2 स्वस्थ केंद्र , जीविका भवन , मिनी प्रखंड भवन , सोलर स्ट्रीट लाइट, पक्की गली नली, सात निश्चय के तहत कई कार्य हुए हैं.''- मनोरजंन प्रसाद समदर्शी, बसाढ़ी पंचायत
परफेक्ट पंचायत है बसाढ़ी : बसाढ़ी पंचायत में बेहतरीन प्रबंधन देखकर लोग यहां विदेशों से इसे देखने आते हैं. यह गांव न सिर्फ आदर्श है बल्कि अपने-आप में पूर्ण है या यूं कह सकते हैं कि यह आत्मनिर्भर है. देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से प्रतिनिधिमंडल यहां आकर विकास कार्यों का अध्ययन कर चुके हैं.

विशुनपुर पंचायत भी समृद्ध : गया के वजीरगंज प्रखंड का विशुनपुर गांव भी बसाढ़ी पंचायत की तरह आत्मनिर्भरता का मॉडल बन गया है. करीब 200 घरों वाले इस गांव में 90 प्रतिशत परिवार दूध उत्पादन से जुड़े हैं. प्रतिदिन 1400 से 1500 लीटर तक दूध का उत्पादन होता है.
डेयरी उत्पाद से कमाई : एफपीओ के माध्यम से 350 किसान 40 रुपए प्रति लीटर की दर से दूध बेचते हैं. गांव में लगभग हर घर में कम से कम एक गाय है. 20 से अधिक परिवारों के पास 5 या उससे अधिक गायें हैं. डेयरी उत्पाद से बिक्री ही इस गांव का मुख्य अर्निंग जरिया है.

2000 एकड़ में खेती से क्रांति : लगभग 2200 एकड़ भूमि में खेती होती है, जिसमें 2000 एकड़ पर धान की खेती हुई. अनुमानित 50,000 क्विंटल धान का उत्पादन हुआ है. धान, गेहूं, प्याज, आलू, सरसों और सब्जियों की बहुस्तरीय खेती की जा रही है.
पंजाब से आते हैं काम करने : नई तकनीक और आधुनिक मशीनों के उपयोग से खेती की लागत और उत्पादन दोनों में संतुलन बना है. पंजाब और हरियाणा से मशीन ऑपरेटर बुलाए गए हैं. पंजाब से आये मशीन ऑपरेटर गुरुप्रीत बताते हैं कि पहले लोग बिहार से पंजाब जाते थे लेकिन अब वह खुद वहां से यहां आकर काम कर रहे हैं.

''बिहार में खेती का तरीका बदला है, अब यहां के लोग भी खेती के लिए नई नई मशीनों को अपना रहे हैं, मैं पंजाब से आया हूं और मेरे अन्य साथी भी हैं, यहां के लोग पहले पंजाब मजदूरी के लिए जाते थे, अब वहां के लोग यहां आ रहे हैं. अभी संख्या में भले कमी हो लेकिन आने वाले समय में बड़े स्तर पर आ सकते हैं.''- गुरुप्रीत सिंह, मशीन ऑपरेटर, पंजाब
डेयरी फार्म से बदलाव : गांव के नीति रंजन प्रताप और रवि रंजन प्रताप ने 2021 में डेयरी फार्म की शुरुआत की. इसके बाद गांव में दूध उत्पादन तेजी से बढ़ा. आज गांव का अनुमानित सालाना टर्नओवर 25 से 27 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है. जिसमें फसलों का सालाना टर्नओवर भी शामिल है.
एनआरवी अभियान में गांव से जुड़े लोग लौटे : गांव के युवाओं ने बाहर रहने वाले लोगों को NRV यानी नॉन रेजिडेंट विलेज नाम देकर जोड़ने का अभियान चलाया. उन्हें गांव लौटने और निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया. इसका सकारात्मक असर दिखा और कई परिवार फिर से गांव से जुड़ गए.
आधारभूत सुविधाएं और सरकारी सेवा में योगदान : विशुनपुर में प्राइमरी हेल्थ सेंटर, प्लस टू स्कूल, सड़क और बिजली जैसी सुविधाएं हैं. गांव में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. इस गांव ने देश और प्रदेश को डीएसपी, वैज्ञानिक, डॉक्टर, शिक्षक, बैंक अधिकारी और सेना के जवान दिए हैं. लगभग 30 लोग सेना में, 30 बिहार पुलिस में और कई बैंकिंग व रेलवे सेवा में कार्यरत हैं.
योजनाओं का सही उपयोग और सामूहिक सोच : बसाढ़ी और विशुनपुर दोनों पंचायतों की कहानी बताती है कि अगर योजनाओं का सही उपयोग हो और समुदाय एकजुट हो तो गांवों की तस्वीर बदल सकती है. एक पंचायत ने सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन से विकास का मॉडल प्रस्तुत किया है. दूसरी ने खेती और डेयरी के माध्यम से आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा है.
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