Exit Poll में प्रशांत किशोर का नहीं दिख रहा प्रभाव, कहीं पुष्पम प्रिया चौधरी की तरह बिहार में 'ओझल' तो नहीं हो जाएंगे?
बिहार चुनाव में मतदान खत्म होते ही आए एक्जिट पोल के बाद सरगर्मी तेज है. काफी चर्चा प्रशांत किशोर को लेकर हो रही है.

Published : November 12, 2025 at 6:55 PM IST
रिपोर्ट : आदित्य झा
पटना : प्रशांत किशोर, जो कभी 'किंगमेकर' और चुनावी रणनीतिकार के तौर पर अजेय माने जाते हैं. हालांकि आज अपने ही राजनीतिक सफर में एक बड़ी चुनौती का सामना करते दिख रहे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के एग्जिट पोल ने राज्य की सियासत में नई बहस छेड़ दी है कि, क्या यह PK की राजनीति का अंत है? जन सुराज पार्टी के लिए जारी अधिकांश एग्जिट पोल ने उन्हें 0 से लेकर 13 सीटों के बीच मिलता दिखाया है.
'हर फैसले को स्वीकार करेंगे' : ईटीवी भारत से बातचीत में जन सुराज के प्रवक्ता संजय ठाकुर ने बताया कि हमने पूरी निष्ठा से बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा. बिहार की आम जनता, युवाओं, महिलाओं, दलितों एवं पिछड़ों की लड़ाई हमने लड़ी है. 14 तारीख को काउंटिंग है. काउंटिंग के बाद जो निर्णय आएगा उसे हमलोग स्वीकार करेंगे.

''पार्टी के पक्ष में यदि बिहार की जनता ने अपना जनादेश नहीं दिया तो पार्टी और पार्टी के संरक्षक प्रशांत किशोर फिर से नए सिरे से बिहार की जमीन पर अपना संघर्ष जारी रखेंगे. जन सुराज का उद्देश्य सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार में व्यवस्था का परिवर्तन है. जब तक बिहार के हित में व्यवस्था का परिवर्तन नहीं होगा हमारी लड़ाई जारी रहेगी.''- संजय ठाकुर, प्रवक्ता, जन सुराज
PK का राजनीति बदलने का दावा : प्रशांत किशोर ने बिहार के राजनीतिक में अपनी धमाकेदार एंट्री करते हुए अनेक बड़े दावे किए थे. उन्होंने बिहार में नए साफ-सुथरे और विकास परक राजनीति के विकल्प का वादा किया. बिहार की राजनीति में बिहार के युवाओं, महिलाओं और उन वर्गों को साधने की रणनीति बनाई. पलायन, इंडस्ट्री एवं परिवारवाद को लेकर बिहार के लोगों के बीच 3 वर्षों से अधिक तक पदयात्रा कर गांव-गांव तक पहुंचे.

डिजिटल संवाद के माध्यम से युवाओं को अपने साथ जोड़ने का पूरा प्रयास किया. उनके हर कार्यक्रम में युवाओं का उत्साह भी देखने को मिला था. प्रशांत किशोर ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि 2025 में जो बिहार के नौजवान बाहर नौकरी करते हैं और वह छठ में बिहार आएंगे उन्हें दोबारा नौकरी के लिए गांव छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ेगा. प्रशांत किशोर को लेकर युवाओं का एक बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा भी दिखाई दिया.

एग्जिट पोल का दावा : मतदान संपन्न होने के बाद एग्जिट पोल प्रशांत किशोर की इन सारी रणनीतियों पर पानी फेरते दिख रहे हैं. सभी प्रमुख मीडिया चैनलों के एग्जिट पोल जन सुराज को 0 से लेकर अधिकतम 13 सीटों तक का अनुमान दे रहे हैं. यह आंकड़ा प्रशांत किशोर के उस दावे के बिल्कुल विपरीत है, जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी को एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करने का सपना देखा था.
प्रशांत किशोर ने कई सार्वजनिक मंचों से दावा किया था कि यदि 135 से कम सीट उनकी पार्टी को मिलती है तो वह उसे अपना सबसे बड़ा हार मानेंगे. हालांकि बाद में प्रशांत किशोर ने यह कहना शुरू किया 'या तो अर्श पर, नहीं तो फर्श पर' यानी 150 से ज्यादा नहीं तो 10 से कम.

'रणनीति में थी खामी' : विधानसभा चुनाव को लेकर एग्जिट पोल में जिस तरीके से प्रशांत किशोर की पार्टी को कम सीट मिलते दिखाया गया है, उसपर वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय ने इसे उनकी रणनीति में चूक बताया है. इसके साथ ही कई कारण भी गिनाए.
''प्रशांत किशोर एक बेहतरीन रणनीतिकार हैं, लेकिन रणनीति और राजनीति के बीच का फर्क अक्सर नेतृत्व और जमीनी जुड़ाव से पाटा जाता है. प्रशांत किशोर ने बिहार की उस जमीनी हकीकत को शायद कम आंका, जहां राजनीति अभी भी जाति समीकरणों और स्थानीय नेताओं के नेटवर्क के इर्द-गिर्द घूमती है."- अरुण पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

'राजनीति में सुपर एंट्री' : वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय का मानना है कि, PK एक 'सुपरमैन' की तरह प्रवेश किये, मानों वे अकेले ही बिहार की राजनीति को बदल देंगे. लेकिन बिहार का मतदाता भावनाओं से ज्यादा व्यावहारिकता से वोट डालता है. उन्होंने जिस तरह से पारंपरिक दलों और उनके नेताओं पर हमला बोला, वह आक्रामक जरूर था, लेकिन उसने उन्हें एक 'आउटसाइडर' का टैग भी दे दिया.
''जन सुराज के पास न तो कोई स्थापित नेता था, न ही कोई मजबूत संगठन, और न ही कोई स्पष्ट विचारधारा. राजनीति में केवल एक चेहरा पर पूरा चुनाव नहीं जीता जाता."- सुनील पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

ब्रांड प्रशांत किशोर का टूटता जादू : राजनीतिक विश्लेषक प्रो. नवल किशोर चौधरी इस एक्जिट पोल को 'ब्रांड प्रशांत किशोर' के जादू के टूटने के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं, प्रशांत किशोर ने जब काम किया तो वे किसी पार्टी के रणनीतिकार की तरह थे. उनकी सफलता का श्रेय उनकी रणनीति के साथ-साथ उन पार्टियों के संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी जाता था. अब जब वह खुद मैदान में हैं, तो पता चल रहा है कि रणनीति अकेले चुनाव नहीं जीता सकती. बिहार में आपको जमीन पर पैर जमाने के लिए एक ठोस संगठन चाहिए, जो गांव-गांव तक फैला हो.
''जन सुराज के टिकट बंटवारे में भी कोई खास रणनीति नजर नहीं आई. प्रशांत किशोर ने न तो किसी बड़े सामाजिक समीकरण को तोड़ा और न ही कोई ऐसा गढ़ बनाया, जहां से वे जीत की उम्मीद कर सकें. बिहार की राजनीति में राजनीतिक दलों का अपना कोर वोट बैंक है. प्रशांत किशोर की पार्टी का कोर वोट बैंक क्या है वह कहीं दिखाई नहीं दिया. उनका वोट बैंक बिखरा हुआ रह गया. यह वही गलती है, जो पुष्पम प्रिया चौधरी जैसे नए उभरते चेहरे कर चुके हैं."- प्रो. नवल किशोर चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

क्या पुष्पम प्रिया चौधरी जैसी हालत हो जाएगी? : एग्जिट पोल के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या प्रशांत किशोर की स्थिति भी 2020 बिहार विधानसभा चुनाव के बाद द प्लूरल्स पार्टी की पुष्पम प्रिया चौधरी जैसी हो जाएगी? जिनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और राजनीतिक सफर लगभग समाप्त-सा हो गया.

वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय का मानना है कि प्रशांत किशोर और पुष्पम प्रिया चौधरी में अंतर है. प्रशांत किशोर भले ही इस चुनाव में बहुत ज्यादा सफल होते नहीं दिख रहे लेकिन बिहार में 3 वर्ष से वह गांव गांव में संघर्ष करते नजर आए हैं. राजनीति में आते ही कोई राजनीतिक दल सत्ता में नहीं बैठ जाता है.
''प्रशांत किशोर ने इन तीन-साढ़े तीन वर्षों में इतना तो जरूर कर दिया है कि बिहार के गांव गांव तक जन सुराज को लोग जानने लगे हैं. पिछले साल बिहार विधानसभा के उपचुनाव में उनकी पार्टी पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थी और चार सीटों पर 60000 से अधिक वोट प्राप्त किया था.''- रवि उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार

'प्रशांत किशोर बिहार नहीं छोड़ेंगे' : रवि उपाध्याय आगे बताते हैं कि प्रशांत किशोर ने कई बार साफ कर दिया है कि यदि उनकी बिहार विधानसभा चुनाव में हार भी होती है तो वह अगले 5 वर्ष तक और ज्यादा मेहनत करेंगे. प्रशांत किशोर ने तो कई सार्वजनिक मंचों से यह भी कहा है कि वह कोई भी रणनीति आगामी 10 वर्ष के लिए बनाते हैं. तो इस चुनाव के बाद भी उन्हें नहीं लगता कि प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति को छोड़कर बाहर चले जाएंगे.
PK की भविष्य की राजनीति कहां पर? : रवि उपाध्याय का मानना है कि प्रशांत किशोर के पास अपनी रणनीतिक सूझबूझ और संसाधन हैं. अगर वे इस हार से सबक लेते हैं और अपनी गलतियों को सुधारते हैं, तो भविष्य में वे एक छोटी लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभर सकते हैं. क्योंकि प्रशांत किशोर को यह लग रहा है कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू यादव सरीखे बड़े नेताओं की यह अंतिम राजनीतिक पारी होगी.

''बिहार के पॉलिटिक्स में युवाओं के लिए बेहतर भविष्य खुला हुआ है. यही कारण है कि प्रशांत किशोर अपने संगठन को इस तरीके से बिहार के पॉलिटिक्स में एक्टिव रखना चाहेंगे. जिसका राजनीतिक प्रभाव 2029 लोकसभा चुनाव एवं आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में दिख सके."- रवि उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
ये भी पढ़ें :-
एग्जिट पोल से नीतीश कुमार गदगद, मंदिर-गुरुद्वारा के बाद मजार पर जाकर की चादरपोशी
501 किलो लड्डू का ऑर्डर, अनंत सिंह देंगे महाभोज.. नतीजों से पहले NDA में जश्न की तैयारी

