Explainer: 5 साल पहले बात हो रही थी बिहार को इथेनॉल हब बनाने की, अब अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा, विस्तार से समझिए
नई इथेनॉल पॉलिसी से बिहार की कंपनियों के सामने संकट आ गया है. सरकार से मदद की गुहार लगाई है. विस्तार से पढ़ें

Published : January 10, 2026 at 7:05 AM IST
रिपोर्ट : आदित्य झा
पटना : 25 फरवरी 2021, नीतीश कुमार ने उच्च स्तरीय बैठक की, कहा बिहार में इथेनॉल उत्पादन के क्षेत्र में काफी निवेशक आएंगे. इससे प्रदेश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. राज्य के किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगी. पूरी मशीनरी काम पर लग गई. तत्कालीन उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन ने 25 मार्च 2021 को बैंक अधिकारियों के साथ बैठक कर निर्देश दिया था कि निवशकों को जल्द से जल्द ऋण मुहैया कराया जाए.
दरअसल, केंद्र सरकार ने अस्थाई और वैकल्पिक ईंधन को प्रोत्साहित करने तथा जीवाश्म ईंधन तेल के आयात पर भारत की निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने राष्ट्रीय बायोफ्यूल नीति 2018 बनाया था. अप्रैल 2019 से इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, अंडमान एवं निकोबार तथा लक्षद्वीप को छोड़कर पूरे भारत में शुरू किया गया.

इथेनॉल उत्पादन प्रोत्साहन नीति 2021 : इसी योजना के तहत बिहार सरकार ने भी 2021 में इथेनॉल उत्पादन प्रोत्साहन नीति लाया था. निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए पहले आओ पहले पाओ योजना की शुरुआत भी की थी. निवेश करने वालों को स्टांप ड्यूटी एवं निबंधन शुल्क में 100% की छूट, भूमि संपरिवर्तन शुल्क में 100% की छूट, 5 वर्ष के लिए टर्म लोन पर 10% ब्याज अनुदान सहित अनेक लाभ देने का विकल्प दिया गया.
बिहार में इथेनॉल फैक्ट्रियां लगाने के पीछे केंद्र और राज्य सरकार दोनों की नीतियों की अहम भूमिका रही है. पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने की नीति के तहत उद्योगपतियों ने बिहार में भारी निवेश किया. बिहार के अनेक जिलों में 22 फैक्ट्रियां नई तकनीक के साथ शुरू की गईं. इनवॉइस फैक्ट्री में 14 डेडीकेटेड ग्रीन बेस्ड इथेनॉल का प्लांट बैठाया गया. इसके अलावा बिहार की आठ चीनी मिल को भी इथेनॉल बनाने का परमिशन मिला.

हालांकि बिहार में स्थापित 14 डेडिकेटेड इथेनॉल फैक्ट्रियों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. नई नीति के तहत केंद्र सरकार ने इथेनॉल कंपनियों से खरीद को सीमित करते हुए 50 प्रतिशत तक कर दिया है. इसका सीधा असर बिहार के इथेनॉल की कंपनियों पर दिखने लगा है.
''हम लोगों को नहीं मालूम था कि इथेनॉल के कोटे में कटौती की जा रही है. हम लोग डेडीकेटेड इथेनॉल प्लांट हैं. भारत सरकार ने अचानक एक निर्णय लिया, इसके पीछे का मुख्य वजह यह है कि चीनी मिल की कंपनी को फायदा पहुंचाना है. सरकार के द्वारा किए गए एग्रीमेंट को खत्म कर दिया गया. हम लोगों का कोटा काटकर 400 करोड़ लीटर इथेनॉल शुगर कंपनियों को दिया गया.''- अजय सिंह, सीएमडी, भारत प्लस एथनॉल्स प्राइवेट लिमिटेड

ओएमसी के साथ एग्रीमेंट : बिहार में जो भी इथेनॉल के प्लांट लगे उसके साथ ओएमसी ने एग्रीमेंट किया था. इस एग्रीमेंट के हिसाब से प्लांट की क्षमता के हिसाब से जो भी प्रोडक्शन होगा वह पूरा का पूरा प्रोडक्शन ओएमसी खरीदेगा. इथेनॉल कंपनी के बैठने के बाद अनुबंध के हिसाब से इथेनॉल का खरीद भी हुआ.
भारत प्लस इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड नवानगर बक्सर के सीएमडी अजय कुमार सिंह ने बताया कि 1 मई 2024 से 31 अक्टूबर 2025 तक क्षमता के आधार पर उन लोगों से 100% मासिक सप्लाई ओएमसी लेती थी. उनके कंपनी की क्षमता 4.99 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष थी यानी 27.75 लीटर मासिक सप्लाई का आदेश दिया गया और उन्होंने पूरा का पूरा सप्लाई किया भी. यही स्थिति बिहार के अन्य इथेनॉल प्लांट्स का भी था. सबों से 100% उत्पादन ओएमसी खरीदता था.
'50 फीसदी की कटौती' : 1 नवंबर 2025 से केंद्र सरकार ने इथेनॉल की खरीद में 50% की कटौती कर दी. ओएमसी सभी इथेनॉल प्लांट से उत्पादन का मात्र 50% खरीदने की बात कही. वर्तमान में नवंबर से उन लोगों को केवल 50% सप्लाई का आर्डर आ रहा है. चुंकि इथेनॉल का कोई निजी बाजार उपलब्ध नहीं है यही कारण है कि प्लांट को चलाना अत्यंत कठिन हो गया है. यह स्थिति बिहार के सभी 14 ग्रीन बेस्ट इथेनॉल प्लांट की है जिन्हें केवल ओएमसी द्वारा 50% सप्लाई आर्डर ही आवंटित किया जा रहा है.
निवेशकों का भरोसा डगमगाया : पूरे देश में इथेनॉल के प्रोडक्शन के आंकड़ों को देखा जाए तो उत्पादन के मामले में बिहार छठे नंबर पर है. लेकिन नई इथेनॉल पॉलिसी में बदलाव का असर बिहार पर भी पड़ रहा है. बिहार में कुल उत्पादन का मात्र 50% आपूर्ति करने का आदेश दिया गया है. जिसके कारण कंपनी की स्थिति खराब होने लगी है. देश के अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में उत्पादन के हिसाब से कम बिक्री के कारण कंपनियों पर असर होने लगा है.
सप्लाई आर्डर हुआ आधा : बिहार में इथेनॉल की फैक्ट्री लगाने वाले निवेशकों के साथ राज्य की 22 इथेनॉल कंपनियों के साथ ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 88 करोड़ लीटर इथेनॉल प्रतिवर्ष खरीदने का अनुबंध किया था. लेकिन पिछले वर्ष नवंबर में उन्हें ओएमसी की तरफ से एक निर्देश आया जिसमें बिहार से मात्र 44 करोड़ लीटर इथेनॉल ही खरीदने की बात कही गई.

उसके बाद से इथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियां के सामने चुनौती उत्पन्न हो गई कि अब इथेनॉल का उत्पादन होने के बाद उसका क्या किया जाए. नए निर्देश आने के बाद वर्तमान में बिहार के चार प्लांट बंद हो गए हैं, जबकि दूसरे प्लांट पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है. 50% की कटौती होने के बाद अब इथेनॉल प्लांट मात्र 15 दिन ही चल पा रही है, क्योंकि इस स्टोर कैपेसिटी के हिसाब से उनके प्रोडक्शन कंपनियों लेती है.
कंपनी के सामने मुश्किल : अजय सिंह का कहना है कि 50% कटौती करने के कारण अब मार्केट में बने रहना मुश्किल हो गया है. इथेनॉल कंपनी खोलने में 200 करोड़ से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट हुआ है. अब यदि सिर्फ 13 से 14 दिन फैक्ट्री चलेगी तो फिर कैसे सरवाइव किया जाएगा. 2 महीने से उत्पादन आधा हो गया है जबकि कंपनी का खर्चा उतना ही आ रहा है.
"अपनी समस्या को लेकर हम लोगों ने केंद्र सरकार को पत्र भी लिखा है. आग्रह किया है कि बिहार में उद्योगों की कमी है इसलिए बिहार को अलग नजरिए से देखा जाए, ताकि यहां कंपनी सरवाइव कर सके. बिहार की 60% इथेनॉल कंपनियां बंद होने के कगार पर पहुंच गई है या बंद हो चुकी हैं."- अजय सिंह, सीएमडी, भारत प्लस एथनॉल्स प्राइवेट लिमिटेड

युवाओं के रोजगार पर सीधा प्रभाव : इथेनॉल उद्योग सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी दांव पर हैं. अजय सिंह का कहना है कि बिहार के युवाओं के लिए ये फैक्ट्रियां रोजगार का एक बड़ा जरिया था. तकनीकी स्टाफ, मजदूर, ट्रांसपोर्ट, सप्लाई चेन और किसानों तक इसका प्रभाव पड़ता है.
अजय सिंह का कहना है 24 जनवरी को उन्होंने प्लांट बंद कर दिया था क्योंकि जितना सप्लाई का आर्डर आया था वह उनके यहां बन गया था. अब स्थिति ऐसी है कि 13 दिन का ही ऑर्डर आता है. फैक्ट्री बंद होने से सबसे ज्यादा प्रभाव यहां काम करने वाले लोगों पर पड़ा.
यदि इथेनॉल फैक्ट्रियां बंद होती हैं, तो सबसे पहले स्थानीय स्तर पर रोजगार खत्म होगा. इससे बेरोजगारी बढ़ेगी और पहले से रोजगार की तलाश में जूझ रहे बिहार के युवाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. काम करने वाले कर्मचारियों का महीने का खर्च होता है. परिवार चलाना होता है. मेडिकल के पीछे खर्च होता है. बच्चों का स्कूल किस देना होता है. यदि फैक्ट्री बंद हो जाएगी तो हजारों आदमी इससे प्रभावित होंगे.

हजारों लोगों की नौकरी पर खतरा : अजय सिंह बताते हैं कि इथेनॉल की एक यूनिट में लगभग 600 कर्मचारी काम करते हैं. बिहार में 14 डेडीकेटेड इथेनॉल की कंपनी है. सभी मिलों में औसत 600 और आठ शुगर मिल के अंदर बनने वाले इथेनॉल प्लांट में प्रति प्लांट 400 जोड़ दें तो लगभग 11500 हजार वर्कर काम करते हैं. इन प्लांट्स के बंद हो जाने से सबसे ज्यादा असर इन्हीं कामगार मजदूर एवं कर्मचारियों पर होगा.
"मजदूरों के कारण ही हमें फिर से अपना प्लांट शुरू करना पड़ा. मुझे हर दिन 2 लाख के आसपास का घाटा लग रहा है. फिर भी वह मजबूरी में अपना प्लांट चल रहे हैं."- अजय सिंह, सीएमडी, भारत प्लस एथनॉल्स प्राइवेट लिमिटेड
हर महीने दो करोड़ रुपये का नुकसान : मुजफ्फरपुर बायोफ्यूल्स कंपनी के साइट मैनेजर पिंटू सिंह ने बताया कि प्लांट की उत्पादन क्षमता एक लाख लीटर प्रतिदिन यानी लगभग 30 लाख लीटर प्रतिमाह है, लेकिन नई नीति के तहत अब सिर्फ 14 लाख लीटर प्रतिमाह का ही ऑर्डर मिल रहा है. उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत कटौती के बाद प्लांट को नियमित रूप से चलाना संभव नहीं है, जिससे कंपनी को हर महीने करीब दो करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.

''यदि यही स्थिति बनी रही, तो प्लांट को पूरी तरह बंद करना पड़ सकता है. उत्पादन आधा होने के कारण कंपनी को छह महीने प्लांट चलाने और छह महीने बंद रखने की मजबूरी बन गई है. इसका असर न सिर्फ कामगारों पर पड़ा है, बल्कि स्थानीय किसानों पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है.''- पिंटू सिंह, साइट मैनेजर, मुजफ्फरपुर बायोफ्यूल्स कंपनी
पिंटू सिंह आगे कहते हैं कि कंपनी मुख्य रूप से मक्का आधारित इथेनॉल का उत्पादन करती है, जिसके लिए आसपास के किसानों से मक्का की खरीद की जाती है. सप्लाई ऑर्डर घटने से किसानों को भी अपनी फसल बेचने में नुकसान झेलना पड़ रहा है. बिहार में कुल 14 ग्रेन आधारित इथेनॉल प्लांट हैं, जिनमें से मुजफ्फरपुर में तीन प्लांट फिलहाल संचालित हैं, जबकि चौथा नेचुरल डेयरी का इथेनॉल प्लांट जल्द शुरू होने वाला था. हालांकि, मौजूदा नीति परिवर्तन को देखते हुए इसके शुरू होने में भी देरी की आशंका जताई जा रही है.
50 प्रतिशत कटौती क्या है? : मुजफ्फरपुर बायोफ्यूल्स कंपनी साइट मैनेजर पिंटू सिंह ने इसे विस्तार से समझाया. पिंटू सिंह ने कहा कि जब बिहार में प्लांट लग रहे थे, तब सरकारी कंपनियों ने सभी प्लांट से एग्रिमेंट किया था कि 50 प्रतिशत आपका इथेनॉल लिया जाएगा. बचे हुए 50 प्रतिशत पर प्रिफरेंस (प्राथमिकता) दिया जाएगा. अब नई नीति के अनुसार इस प्रिफरेंस को हटा लिया गया है. इसका असर हुआ है कि 90 दिन में हमें 45 दिन ही प्लांट चलाना पड़ता है, 45 दिन इसे मजबूरन बंद रखना पड़ता है. जिससे काफी डर का माहौल हो जाता है.

CM से हस्तक्षेप की मांग : बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन अध्यक्ष रामलाल खेतान का मानना है कि बिहार सरकार को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए. रामलाल खेतान के अनुसार, अभी केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही गठबंधन की सरकार है. ऐसे में बिहार सरकार को केंद्र सरकार से बात कर इस नीति में बिहार के लिए राहत की मांग करनी चाहिए.
"इथेनॉल उत्पादन में बिहार देश का छठा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है. केंद्र सरकार के द्वारा नई नीति में किए गए बदलाव के कारण बिहार के उद्योगपतियों को हानि उठाना पड़ रहा है. नई नीति की वजह से इथेनॉल कंपनियों के कोटे में 50% तक कटौती कर दी गई है. जब खरीद ही नहीं होगी, तो फैक्ट्रियां कैसे चलेंगी."- रामलाल खेतान, अध्यक्ष, बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन

सरकार ने भी संकट माना : बिहार में इथेनॉल के निवेशकों के साथ हो रही समस्या पर बिहार के उद्योग मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है कि नई पॉलिसी आने के कारण आधा प्रोडक्शन का ही परचेस किया जा रहा है. इथेनॉल कंपनी के ऊपर न केवल खतरा मंडरा रहा है बल्कि बंद होने की कगार पर आ गयी है. कंपनी अब 6 महीना ही फैक्ट्री चलाने की स्थिति में आ गई है. सभी कंपनियों में अच्छी तादात में वर्कर काम कर रहे हैं.
"पूरे देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिक्स किया जाता है. बिहार सरकार केंद्र सरकार से मांग कर रही है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 20 से बढ़ाकर 22 से 25 प्रतिशत किया जाए. इससे इथेनॉल कंपनियों के ऊपर संकट भी कम होगा और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. बिहार सरकार की मांग पर केंद्र सरकार विचार कर रही है. 15 जनवरी को फिर हमलोगों की इस मामले में बैठक होने जा रही है. उम्मीद है कि इससे संकट के बादल छट जाएंगे."- दिलीप जायसवाल, उद्योग मंत्री, बिहार

'औद्योगिक विकास की रफ्तार पर ब्रेक' : वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रो. एनके चौधरी का मानना है कि बिहार सरकार हाल के वर्षों में निवेशकों को आकर्षित करने में सफल रही है. इथेनॉल उद्योग इसका एक बड़ा उदाहरण रहा है. लेकिन यदि यह सेक्टर संकट में पड़ता है, तो इसका संदेश अन्य उद्योगों तक भी जाएगा.
प्रो. एनके चौधरी का मानना है कि किसी भी राज्य की औद्योगिक छवि नीतिगत स्थिरता पर निर्भर करती है. बार-बार नीति बदलने से निवेशक असमंजस में पड़ जाते हैं. बिहार जैसे राज्य के लिए यह और भी संवेदनशील मुद्दा है, जो अभी औद्योगिक नक्शे पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है. समाधान की जरूरत उद्योग जगत की मांग है.
"केंद्र सरकार इथेनॉल नीति की समीक्षा करे और राज्यों की उत्पादन क्षमता को ध्यान में रखते हुए खरीद नीति तय करे. वहीं, बिहार सरकार से अपेक्षा है कि वह उद्योगपतियों और केंद्र सरकार के बीच सेतु बनकर इस संकट का समाधान निकाले. यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इथेनॉल फैक्ट्रियों के बंद होने का असर बिहार के उद्योग, रोजगार, कृषि और निवेश माहौल चारों पर गहरा पड़ सकता है."- प्रो. एनके चौधरी, वरिष्ठ अर्थशास्त्री

'चिंता की लकीरें खींच दी' : कुल मिलाकर कहें तो बिहार में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए राज्य सरकार लगातार नीतिगत सुधार और निवेश प्रोत्साहन योजनाएं ला रही है. स्टार्टअप पॉलिसी, औद्योगिक प्रोत्साहन नीति और निवेशकों को दी जा रही सब्सिडी के जरिए बिहार को उद्योगों के लिए अनुकूल राज्य बनाने की कोशिशें की जा रही हैं. लेकिन इसी बीच केंद्र सरकार की नई इथेनॉल पॉलिसी ने बिहार के औद्योगिक परिदृश्य में चिंता की लकीरें खींच दी हैं.
किससे बनता है इथेनॉल? : बायोफ्यूल्स नीति के तहत इथेनॉल बनाने की अनुमति सरकार के द्वारा दी गई है. इसके बनने में कई प्राकृतिक चीजों का उपयोग होता है. इथेनॉल बनाने में जिन चीजों का उपयोग होता है उसमें मोलासेस यानी छोआ, गन्ना का जूस एवं क्षतिग्रस्त ग्रेन जैसे गेहूं, ब्रोकन राइस एवं मक्का. बिहार में गन्ना, मक्का, गेहूं एवं चावल जैसे बहुत सारे कच्चे माल उपलब्ध हैं. यही कारण है कि इथेनॉल लगाने के लिए उद्योगपति ने अपना उत्साह दिखाया था.
इथेनॉल का उपयोग : इथेनॉल का उपयोग मुख्य रूप से इंधन, दवाइयां, मेकअप के सामान एवं अन्य उद्योग उत्पादकों के निर्माण में होता है. पेट्रोल में इथेनॉल के उपयोग से प्रदूषण कम होता है. यही कारण है कि पेट्रोल में सरकार ने 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने का परमिशन दिया है.

मोलासेस और मक्के से उत्पादन : बिहार में सीतामढ़ी जिले की रीगा चीनी मिल, पश्चिम चंपारण की हरिनगर चीनी मिल लौरिया चीनी मिल, मझौलिया चीनी मिल, नरकटियागंज और मगध सूगर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड में मोलासेस से इथेनॉल का उत्पादन हो रहा है. जबकि मुजफ्फरपुर में मुजफ्फरपुर बायो फ्यूल्स माइक्रोमैक्स और भारत ऊर्जा से मक्के से इथेनॉल बनाया जा रहा है.
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