3% की आबादी.. फिर भी सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, बिहार चुनाव से बदलेंगे मुसहर समाज के हालात?
जाति की राजनीति में उलझी बिहार की सियासत में मुसहर आज भी संघर्ष कर रहा है. सामाजिक स्थिति तो और भी खराब है. स्पेशल रिपोर्ट..

Published : November 11, 2025 at 3:27 PM IST
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव अब समापन की ओर बढ़ रहा है. 14 नवंबर को तस्वीर साफ हो जाएगी कि सत्ता के सिंहासन पर कौन बैठेगा? अगले 5 सालों के सुंदर भविष्य का सपना संजोने की चाहत लिए मतदाताओं ने अपनी पसंद की सरकार चुनने के लिए वोट डाला है लेकिन आज भी बड़ी आबादी ऐसी है, जिसके लिए पिछले 77-78 वर्षों में बहुत कुछ नहीं बदला है. पारंपरिक पेशा और खान-पान उसी तरह है. समाज में बराबरी और सम्मानजनक जीवन के लिए आज भी संघर्ष जारी है. 3.1 फीसदी आबादी वाली मुसहर जाति की स्थिति बेहद चिंताजनक है.
बिहार में 40 लाख मुसहर: बिहार की 13 करोड़ से अधिक की आबादी में 40 लाख से अधिक मुसहर जाति के लोग हैं. जिन्हें मांझी, ऋषिदेव और सदा उपनाम से भी जाना जाता है. ये समाज पारंपरिक तौर पर खेतिहर मजदूर होते हैं, जो आज भी दूसरों के खेत में काम कर अपना गुजर-बसर करते हैं.

राजनीति में कहां है मुसहर?: राजनीतिक तौर पर मुसहर समाज सभी दलों के जातिगत समीकरण के लिए जरूरी है लेकिन नुमाइंदगी में आज भी पीछे है. इस समाज से आने वाले किराई मुसहर पहले शख्स थे, जो 1952 में लोकसभा सांसद बने थे. वह मधेपुरा के मुरहो गांव के रहने वाले थे और सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर भागलपुर सह पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए थे.

जीतनराम मांझी बड़े नेता: वहीं, जीतनराम मांझी मुसहर जाति से आने वाले पहले व्यक्ति हैं, जो विधानसभा पहुंचे. 1980 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर गया जिले के फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की. बाद में चंद्रशेखर सिंह की सरकार में मंत्री बने. इस समाज से मुख्यमंत्री बनने वाले भी वह एकमात्र शख्स हैं. इस वक्त वह मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं, जबकि बेटा संतोष सुमन बिहार सरकार में मंत्री हैं. उनकी बहू दीपा मांझी और समधन ज्योति देवी विधायक हैं.

राजनीति में भागीदारी बढ़ी: 2020 के विधानसभा चुनाव में मुसहर समाज के 7 विधायक चुने गए थे. इनमें जीतनराम मांझी (इमामगंज), ज्योति देवी (बाराचट्टी), प्रफुल्ल मांझी (सिकंदरा), रत्नेश सदा (सोनबरसा), अचमित ऋषिदेव (रानीगंज), कृष्ण कुमार ऋषि (बनमनखी) और रामवृक्ष सद (अलौली) शामिल हैं. आबादी के हिसाब से राजनीति में भागीदारी हाल के वर्षों में जरूर बढ़ी है लेकिन सरकार के कामकाज और फैसलों में इनकी कितनी मजबूत भूमिका है, यह बहस का विषय है.
2025 में मुसहर प्रत्याशी?: 2025 विधानसभा चुनाव में भी कई विधानसभा सीटों पर मुसहर जाति के उम्मीदवारों के जीतने की प्रबल संभावना है. वहीं इन सीटों में कई ऐसी भी हैं, जहां दोनों प्रमुख गठबंधन से मुसहर जाति के प्रत्याशी ही मैदान में हैं. केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा ने अपने हिस्से की 6 में तीन सीटों पर मुसहर समाज के कैंडिडेट को उतारा है.

सामाजिक-आर्थिक हालत खराब: सामाजिक तौर पर मुसहर समाज की स्थिति बेहद खराब है. 2023 के जाति आधारित सर्वे के मुताबिक मुसहर समाज की 18% आबादी के पास ही पक्का मकान है. 18% लोग खपरैल या टिन शेड में रहते हैं. 45% लोग झुग्गी में गुजर-बसर करते हैं. मात्र 0.3 प्रतिशत लोग ही सरकारी नौकरी करते हैं. कंप्यूटर या लैपटॉप एक फीसदी से कम लोगों के पास है. 99.6% लोगों के पास निजी वाहन नहीं है. 96.3% लोग भूमिहीन हैं. इस समाज के 92.5% लोग खेतों में मजदूरी कर जीवन-यापन करते हैं.

क्या बोले मतदाता?: वोटिंग करने आए मुसहर समाज के लोगों से जब ईटीवी भारत संवाददाता ने सरकारी योजनाओं को लेकर सवाल किया तो कई लोगों ने कहा कि हमें न तो वृद्धा पेंशन मिलती है और न ही आवास योजना के तहत पक्का मकान मिला है. पीने के पानी की भी दिक्कत होती है.
"मेरे घर में चापाकल नहीं है. दूर से पानी भरकर लाते हैं. घर भी नहीं मिला है. बाढ़ आती है तो सड़क किनारे रहते हैं. जो राहत कार्य के तहत मिलता है, खा लेते हैं."- रमा देवी, स्थानीय

कहां है मुसहरों की अधिक आबादी?: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक गया, भोजपुर, भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सारण और चंपारण में बड़ी तादाद में मुसहर जाति की आबादी रहती है.

मुसहर नाम क्यों पड़ा?: हालांकि इसको लेकर कई तर्क दिए जाते हैं. एक तर्क है कि नियमित रूप से ये समाज मांस का आहार करता है, इसलिए इसे मुसहर कहा गया है. वहीं दूसरा तर्क ये है कि चूकि इस समुदाय के लोग आहार में मूसा (मूस) यानी चूहे को काते हैं, इसलिए इन्हें मुसहर समाज कहा जाता है. जब अकाल पड़ता है या गरीबी-मुफलिसी में भी इस समाज के बच्चों को चूहे को पकाकर खाते देखा जाता है, जो चिंताजनक है.
"इन्हें मुसहर कहने के पीछे की वजह ये है कि ये लोग भूख मिटाने के लिए मूस यानी चूहा तक खाने से परहेज नहीं करते. ये लोग पारंपरिक तौर पर खेती-किसानी से जुड़े होते हैं लेकिन खेतिहर के रूप में नहीं, बल्कि खेतिहर मजदूर के रूप में."- डॉ. सचींद्र नारायण, लेखक, मुसहर: ए सोशियो-इकोनॉमिक स्टडी

कौन है मुसहर?: मुसहर समाज पर काम करने वाले डॉ. सचींद्र नारायण ने अपनी किताब 'मुसहर: ए सोशियो-इकोनॉमिक स्टडी' में मुहसरों की स्थिति पर विस्तार से लिखा है. वे लिखते हैं, 'बिहार में मुसहर समुदाय के लोग मांझी और मंडल जैसे उपनामों का इस्तेमाल करते हैं. ज्यादातर लोग आज भी मजदूरी और खेती-किसानी काम करते हैं. उनके पास जमीनें बेहद कम हैं या नहीं है. ये लोग हिंदू धर्म का पालन करते हैं. मुसहरों के साथ पहले खाना सिर्फ दलित समाज के लोग ही खाते थे. इन्हें सामाजिक तौर पर बेहद पिछड़ा समाज समझा जाता है.'
पिछड़ेपन की वजह?: जानकार बताते हैं कि मुसहर समाज राजनीतिक रूप से एकजुट नहीं है. बेहद छोट-छोटे समूह में बिखरा हुआ होना और कम साक्षरता दर होने के कारण ये समाज में पीछे हैं. बौद्धिक वर्ग का नहीं पनप पाना भी एक बड़ी वजह है.

क्या बोलीं सुधा वर्गीज?: वहीं, दलित समाज के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज बिहार में मुसहरों के पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह आर्थिक स्थिति को मानती हैं. वे कहती हैं कि जब 95 फीसदी लोगों के पास खेत ही नहीं है तो खेती कैसे करेंगे? 3 महीने के लिए दूसरों के खेत में मजदूरी करते हैं, फिर बाकी के 9 महीने बेरोजगार हो जाते हैं. ज्यादातर लोगों के पास कोई स्क्लिड नहीं, जिस वजह से कोई दूसरे प्रकार के काम भी नहीं कर पाते हैं. वे कहती हैं कि कई परिवारों की स्थिति ऐसी है कि कई बार दो वक्त का खाना जुटाना भी मुश्किल हो जाता है.
"सामाजिक तौर पर मुसहर समाज काफी पीछे. आज भी सोशली इंटरेक्शन और एक्सेप्टेंस नहीं है. एजुकेशन और स्किल के मामले में भी स्तिथि बहुत खराब है. जिस वजह से इनको दूसरों के खेत में मजदूरी करके अपना गुजारा करना पड़ता है."- सुधा वर्गीज, सामाजिक कार्यकर्ता
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