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Bihar Election: जातीय समीकरण के सहारे पार्टियां! RJD की मुफ्त घोषणाओं पर BJP के सवाल

बिहार चुनाव में आरजेडी की नजर MY समीकरण और कुशवाहा वोट बैंक पर है. वहीं भाजपा का फोकस सवर्ण वोट बैंक पर है.

Bihar election 2025 RJD and JDU focus on caste-based political strategies BJP on freebies
21 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर में एक चुनावी रैली में. (ANI)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : October 22, 2025 at 5:17 PM IST

5 Min Read
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अनामिका रत्ना

नई दिल्ली: बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 के लिए प्रचार अभियान जोर पकड़ चुका है. सभी 243 सीटों पर उम्मीदवारों की तस्वीर साफ हो चुकी है. सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी महागठबंधन ने अपने-अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है. इस बार भी टिकट बंटवारे में जातीय समीकरणों का खास ख्याल रखा गया है, जिसने एक बार फिर बिहार में जाति आधारित राजनीति की चर्चा को हवा दे दी है.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने अपने परंपरागत MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई है. पार्टी ने 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें 51 यादव और 19 मुस्लिम प्रत्याशी शामिल हैं. इसके अलावा, जेडीयू के कुशवाहा वोट बैंक में सेंधमारी के लिए आरजेडी ने इस बार 11 कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा उम्मीदवारों को उतारने से आरजेडी को फायदा हुआ था, और तेजस्वी यादव ने इस रणनीति को विधानसभा चुनाव में दोहराया है.

जबकि जेडीयू ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में अपने 101 उम्मीदवारों में पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग को प्राथमिकता दी है. पार्टी ने 37 पिछड़ा वर्ग, 22 अति-पिछड़ा वर्ग, 13 कुशवाहा, 12 कुर्मी, 8 यादव और 8 धानुक उम्मीदवारों को टिकट दिया है. सामान्य वर्ग से 22 और केवल 4 मुस्लिम उम्मीदवारों को मौका मिला है. इसके अलावा, 13 महिला उम्मीदवार भी जेडीयू की सूची में शामिल हैं.

बिहार चुनाव पर बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह से बातचीत (ETV Bharat)

इस मुद्दे पर बात करते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि भाजपा जातिगत मुद्दों पर नहीं बल्कि अपने काम पर भरोसा करती है, जिस तरह से भाजपा ने राज्य और केंद्र में काम किया है उसपर वो वोट मांगेगी. आरजेडी पर बोलते हुए आरपी सिंह ने कहा कि उन्होंने बिहार के कुल बजट से भी ज्यादा चुनावी घोषणाएं कर दी हैं. उन्होंने कहा कि जितनी घोषणाएं उन्होंने की है वो पूरे बिहार के बजट का पांच गुना ज्यादा है क्या वो इतनी घोषणाएं अपने भ्रष्टाचार के पैसे से करेंगे. उन्होंने दावा किया कि पहले तो बिहार में राजद की सरकार बनने ही नहीं जा रही है, वहीं दूसरी तरफ मतदाताओं से झूठे वादे किए गए हैं.

जाति आधारित राजनीति की शुरुआत लालू ने की: बीजेपी
बिहार के चुनाव में यदि देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी अपने उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा है. बीजेपी की सूची में सामान्य वर्ग के 49 उम्मीदवार शामिल हैं, जिनमें 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण और 1 कायस्थ उम्मीदवार हैं. बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि जाति आधारित राजनीति की शुरुआत लालू यादव ने की थी, जबकि बीजेपी सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है.

बिहार में 2023 के जाति सर्वेक्षण ने राजनीतिक दलों की रणनीतियों को और प्रभावित किया है. सर्वेक्षण के आंकड़ों ने जातीय गोलबंदी को और तेज किया है. राजनीतिक दलों की रणनीति विकास के दावों के बावजूद जातीय समीकरणों पर टिकी हुई है. बिहार का चुनाव हमेशा से जातियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, और इस बार भी यही स्थिति बनती नजर आ रही है.

चुनावी प्रक्रिया के बीच महागठबंधन में आपसी खींचतान भी सामने आ रही है. बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि महागठबंधन न तो साझा घोषणा-पत्र बना पाया, न साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सका, और न ही मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री के चेहरे पर सहमति बना पाया. बीजेपी का कहना है कि जो गठबंधन अपनी सूची और रणनीति को ही अंतिम रूप नहीं दे पाया, वह जनता का भरोसा कैसे जीतेगा?

बीजेपी ने जनसुराज पार्टी जैसे नए प्रयोगों को भी खारिज करते हुए कहा कि बिहार को नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी जैसे अनुभवी नेताओं की जरूरत है.

महागठबंधन का कोई वजूद नहीं...
बीजेपी ने तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि वह बिहार की जनता के साथ मजाक करना बंद करें. पार्टी के प्रवक्ता सुधांश त्रिवेदी ने कहा कि "यह भगवान बुद्ध का प्रदेश है, इसे बुद्धू (यानी मूर्ख) बनाने की कोशिश न करें." बीजेपी ने यह भी दावा किया कि महागठबंधन का कोई वजूद नहीं है, और उनके झूठ को जनता समझ चुकी है.

बहरहाल बिहार विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण एक बार फिर केंद्र में हैं. सभी दल अपने-अपने वोट बैंक को साधने में जुटे हैं, और प्रचार अभियान चरम पर है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सी पार्टी अपने सामाजिक समीकरणों का कितना फायदा उठा पाती है, और बिहार की जनता किसे सत्ता की चाबी सौंपती है.

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