चिराग-मांझी-कुशवाहा, ओवैसी और मुकेश सहनी.. उम्मीदवारों से ज्यादा इन नेताओं की साख दांव पर!
बिहार चुनाव में इस बार कई छोटे दलों का अस्तित्व खतरे में है. कई नेताओं की साख पर भी गंभीर सवाल है. पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट..

Published : November 12, 2025 at 8:54 PM IST
रिपोर्ट: डॉ. रंजीत कुमार
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई चेहरे ऐसे हैं, जो चुनावी मैदान में तो नहीं हैं लेकिन असली परीक्षा का सामना करेंगे. इनमें चिराग पासवान, जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और असदुद्दीन ओवैसी शामिल हैं. ओवैसी की असली परीक्षा सीमांचल में, कुशवाहा की शाहाबाद में और मांझी की गया क्षेत्र में होनी है. वहीं चिराग पासवान और मुकेश सहनी की साख भी दांव पर है. एग्जिट पोल के अनुमान इनकी चिंता बढ़ा सकते हैं.
14 नवंबर को परिणाम: वैसे तो परिणाम 14 नवंबर को आएंगे लेकिन एग्जिट पोल और स्थानीय स्तर पर मिली रिपोर्ट के आधार पर लगता है कि छोटे दलों के लिए इस बार परेशानी बढ़ने वाली है. इनमें एनडीए और महागठबंधन के घटक दलों के अलावे वो नेता भी हैं, जो लगातार विस्तार की कोशिश कर रहे हैं.
मुश्किल में चिराग पासवान: सबकी निगाहें केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान पर टिकी है. लोकसभा चुनाव में 100% स्ट्राइक रेट वाले चिराग बिहार की 29 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. मढ़ौरा सीट पर उनकी प्रत्याशी सीमा सिंह का नामांकन खारिज हो गया था. ऐसे में 28 सीटों पर उनके उम्मीदवार मैदान में हैं. एग्जिट पोल के मुताबिक एलजेपीआर इस चुनाव में दहाई अंक के आंकड़े को भी नहीं छू पा रही है. हालांकि 5 प्रतिशत वोट को हासिल करने में कामयाब होते दिख रहे हैं.

जीतनराम मांझी दिखाएंगे दम: पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को सीट शेयरिंग के तहत 6 सीटें मिली है. 2020 चुनाव में 7 सीटों पर लड़कर उनकी पार्टी 4 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. ट्रेंड के मुताबिक मांझी पिछली बार के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. यानी 4 या उससे अधिक सीट जीत सकते हैं.

उपेंद्र कुशवाहा के लिए चुनौती: उपेंद्र कुशवाहा की नेतृत्व वाली पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रही है. उनकी जिद के चलते जीतनराम मांझी के बराबर यानी 6 सीटें दी गई है. सासाराम से उनकी पत्नी स्नेहलता चुनाव लड़ रही हैं. इस इलाके में उनकी मजबूत पकड़ के बावजूद उनको अपेक्षित परिणाम मिलता नहीं दिख रहा है. एनडीए के अंदर कुशवाहा की स्थिति को विशेषज्ञ कमतर आंक रहे हैं.

क्या कहते हैं जानकार?: वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडे का कहना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में जीतनराम मांझी का स्ट्राइक रेट सबसे बेहतर होता दिख रहा है. चिराग पासवान का लोकसभा चुनाव में बेहतर स्ट्राइक रेट था लेकिन विधानसभा चुनाव में हाल के कुछ वर्षों में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाए हैं. उपेंद्र कुशवाहा के सामने भी मुश्किल है. उनकी पार्टी अगर किसी तरीके से खाता खोल लें तो यह उनके लिए उपलब्धि होने वाली है.

महागठबंधन की नैया पार लगाएंगे सहनी?: लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान मुकेश सहनी की महागठबंधन में एंट्री हुई थी. 3 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन सफलता नहीं मिली. विधानसभा चुनाव में 60 सीट चाहते थे लेकिन महज 15 सीटें दी गई. अपने भाई और विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष संतोष सहनी को उन्होंने गौरा बोराम सीट से उम्मीदवार बनाया लेकिन मतदान से दो दिन पहले उम्मीदवारी वापस लेना पड़ा. उनके हिस्से की कई ऐसी सीटें हैं, जहां आरजेडी के साथ उनका दोस्ताना मुकाबला हो रहा है. राजनीतिक विश्लेषक अरुण पांडे के मुताबिक सहनी के प्रदर्शन पर महागठबंधन का परिणाम तय होगा.

"मुकेश साहनी दबाव की राजनीति के लिए जाने जाते हैं. महागठबंधन का हिस्सा होने के बाद खुद को उपमुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर लिया. बाद में उनके भाई को भी बैठना पड़ा. बिहार में जितने भी चुनाव हुए हैं, उसमें अब तक वह उम्मीद के मुताबिक परफॉर्म नहीं कर पाए हैं. 2025 में भी उनके लिए रहे आसान नहीं है. मुकेश सहनी के लिए महागठबंधन में संकट जैसी स्थिति है. अगर एक या दो सीट जीत लें तो काफी है."- अरुण पांडे, राजनीतिक विश्लेषक

सीमांचल में उड़ेगी ओवैसी की 'पतंग'?: असदुद्दीन ओवैसी इस बार आरजेडी के साथ गठबंधन करना चाहते थे लेकिन जब बात नहीं बनी तो उनकी पार्टी एआईएमआईएम ने 25 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए. खुद 10 दिनों से अधिक समय तक सीमांचल में कैंप किया. उनको विशेष रूप से सीमांचल से उम्मीदें हैं. हालांकि जो रिपोर्ट मिल रही है, उसके मुताबिक लगता नहीं है कि पिछली बार की तरह इस बार वह कुछ खास कमाल कर पाएंगे.

2020 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी ने 20 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और उन्हें 5 सीटों पर जीत मिली थी. कई सीटों पर उनकी वजह से महागठबंधन को नुकसान पहुंचा था. हालांकि 2022 में उनके 4 विधायकों ने राष्ट्रीय जनता दल की सदस्यता ग्रहण कर ली.
छोटे दलों का लिटमस टेस्ट: वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक संतोष कुमार कहते हैं कि इस बार के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अंदर छोटे दलों का लिटमस टेस्ट होना है. उपेंद्र कुशवाहा जहां खाता खोलने की स्थिति में दिख रहे हैं, वहीं जीतनराम मांझी की बेहतर स्थिति होने वाली है. सबसे बड़ी मुश्किल चिराग पासवान के लिए है, वह 5 का आंकड़ा भी पार करते नहीं दिख रहे हैं.

संतोष कुमार कहते हैं कि जहां तक महागठबंधन का सवाल है तो मुकेश सहनी के लिए करो या मरो की स्थिति है. दबाव बनाकर उन्होंने खुद को उपमुख्यमंत्री तो प्रोजेक्ट कर लिया लेकिन उस हिसाब से उन्हें सीट मिलती नहीं दिख रही है. वह भी किसी तरह से खाता खोलने लायक दिख रहे हैं. वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने इस बार पूरी ताकत झोंक रखी है. सीमांचल इलाके में उनको अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल हुआ है. इस बार वह ठीक-ठाक स्थिति में रहने वाले हैं. 2025 के चुनाव में तेजस्वी यादव को एआईएमआईएम ने गठबंधन नहीं करने का नुकसान होता दिख रहा है.
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