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Explainer: आरक्षण पर जीतनराम मांझी Vs चिराग पासवान.. क्या बिहार में बदलेगी दलित पॉलिटिक्स?

आरक्षण को लेकर जीतनराम मांझी और चिराग पासवान आमने-सामने आ गए हैं. इस्तीफे मांगे जा रहे हैं. आखिर वजह क्या है? रिपोर्ट- अविनाश कुमार

Dalit Politics
बिहार में दलित राजनीति गरमायी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 31, 2026 at 8:40 PM IST

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पटना: बिहार में एक बार फिर से दलित के नाम पर राजनीति तेज हो गई है. मुद्दा आरक्षण है लेकिन नजर दलित वोट बैंक पर है. दलितों के नेता बनने की कोशिश भी है और घमासान एनडीए के घटक दल के बीच ही हो रहा है. एक तरफ हम संरक्षक जीतनराम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन मांझी हैं तो दूसरी तरफ लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान हैं. दोनों तरफ से इस्तीफे की मांग भी हो रही है. दोनों एनडीए में हैं और मोदी कैबिनेट में मंत्री भी हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या सूबे की सियासत बदलने वाली है?

आरक्षण पर मांझी-चिराग में टकराव: असल में देश में आरक्षण को लेकर इन दोनों आंदोलन हो रहा है. एक तबका आरक्षण समाप्त करने की मांग कर रहा है लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा. वहीं, इस मुद्दे पर नेताओं की बयानबाजी भी शुरू हो गई है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दलित वर्ग के आरक्षण में उप वर्गीकरण की बात कही थी और उसके सपोर्ट में केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी मुखर हैं, जबकि चिराग पासवान का अलग रुख है.

चिराग पासवान और जीतनराम मांझी आमने-सामने (ETV Bharat)

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?: दरअसल, पंजाब के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 1 अगस्त 2024 को एक अहम फैसला सुनाया था. संविधान पीठ ने एससी-एसटी मामले में आरक्षण को लेकर सुनवाई करते हुए सरकार को कोटा के भीतर कोटा बनाने की अनुमति दे दी.

सर्वोच्च अदालत ने कहा, 'एससी-एसटी वर्ग में सभी जाति एक समान नहीं है. जो जातियां ज्यादा पिछड़ी हैं, राज्य सरकार उनके लिए उप कोटा तय कर सकती है.'

Chirag Paswan
मांझी और कुशवाहा के साथ चिराग पासवान (सौ. जीतनराम मांझी X हैंडल)

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से केंद्र सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दी है. सरकार कोटा में कोटा लागू करती है तो विशेषज्ञों का कहना है कि इससे विरोध शुरू हो सकता है. इसलिए केंद्र सरकार इस फैसले के बाद एक तरह से बैकफुट पर दिखाई दे रही है. इस फैसले के बाद एनडीए में भी घमासान मचा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जीतनराम मांझी समर्थन करते रहे हैं और अब उनके बेटे संतोष सुमन ने भी खुलकर बयानबाजी शुरू कर दी है, जबकि चिराग का रुख इसे उलट है.

"सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जीतनराम मांझी समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि जिस जाति से मांझी आते हैं, उसकी बहुत अधिक आबादी नहीं है और दलित में पासवान जाति सबसे अधिक सुविधा ले रही है. एक तरह से एक बड़े वर्ग को दलितों में साधने की कोशिश है. वहीं दूसरी तरफ चिराग पासवान इसका विरोध करते रहे हैं."- भोलानाथ, राजनीतिक विशेषज्ञ

Chirag Paswan
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान (सौ. चिराग पासवान X हैंडल)

बिहार में 243 विधानसभा सीटों में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 40 विधानसभा की सीटें हैं तो वहीं लोकसभा की 40 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए 6 सीटें आरक्षित हैं. इसके अलावे 19.65% दलित वोट कई सीटों पर जीत हार का फैसला करता है. इसीलिए दलित वोट बैंक पर सभी दलों और नेताओं की नजर है. कुछ पार्टियों तो दलित के नाम पर ही सियासत करती हैं.

Jitan Ram Manjhi
जीतनराम मांझी और संतोष सुमन (सौ. जीतनराम मांझी X हैंडल)

बिहार में 22 अनुसूचित जातियां: 2023 में बिहार सरकार ने जाति आधारित गणना करवाई थी. उसके मुताबिक अनुसूचित जाति की कुल आबादी 2 करोड़ 56 लाख 89820 है, जो बिहार की कुल आबादी का 19.65% है.

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बिहार की 22 अनुसूचित जातियों में दुसाध/पासवान/धारी, चमार/मोची/रविदास, बंटार, बौरी, भोगता, भुइंया, चौपाल, दबगर, धोबी/रजक, मुसहर, नट, पान/स्वासी, डोम/धंकार/बांसफोड़, घासी, हलालखोर, हरि/मेहतर/भंगी, कंजर, कुरारियार, लालबेगी, पासी, रजवार और तुरी शामिल हैं.

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दलितों में पासवान की आबादी अधिक: प्रमुख दलित जातियों में सबसे अधिक पासवान जाति की आबादी है. पासवान सबसे अधिक 5.31% है. इसके बाद रविदास 5.26% है. मुसहर की आबादी 3.08% है. वहीं धोबी 0.8% और पासी 0.9% हैं.

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दलित जातियों की नुमाइंदगी: 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में दलित समाज से आने वाली पासवान और रविदास जातियों की नुमाइंदगी सबसे अधिक 11-11 है, जबकि मुसहर जाति के 9 विधायक हैं. पासी और धोबी समाज से 2-2 विधायक हैं. वहीं भुइयां और रजवार जाति से एक-एक विधायक 2025 चुनाव में जीते हैं.

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किस दल से कितने दलित विधायक?: 2025 विधानसभा चुनाव में एससी-एसटी की 40 विधानसभा सीटों में से 35 सीट पर एनडीए को जीत मिली, केवल पांच सीटों पर महागठबंधन को जीत हासिल हो पाई. सबसे अधिक जेडीयू ने 14 सीटें जीती हैं, जबकि बीजेपी ने 12 सीट, लोजपा (रामविलास) 5 सीट, हम को चार सीट, आरजेडी चार सीट और कांग्रेस को एक सीट पर जीत हासिल हुई.

नीतीश कुमार ने भी बिहार की सत्ता संभालने के बाद इस वोट बैंक को पहचाना और अपने पक्ष में करने के लिए कई उपाय किए, जिसमें महादलित आयोग का गठन भी एक था. दलितों को महादलित में बांटा, तब से दलित पर सियासत खूब हो रही है. हालांकि बाद में राजनीति करवट बदली और सभी दलित जातियों को महादलित में शामिल कर लिया गया.

महादलित आयोग का गठन क्यों हुआ थी?: बिहार राज्य महादलित आयोग का गठन 2007 में हुआ था. तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलितों की स्थिति कैसे सुधार हो, उसको लेकर इस आयोग का गठन किया था. महादलित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को कई सिफारिशें की.

'महादलित' श्रेणी में शामिल करना: विकास प्रक्रिया में पीछे छूट गई अनुसूचित जातियों (SC) की पहचान कर उन्हें 'महादलित' श्रेणी में शामिल करना और उनके उत्थान के लिए विशेष उपाय करना था. आयोग ने शुरुआत में 22 में से 18 अत्यंत कमजोर अनुसूचित जातियों को महादलित श्रेणी में रखने की सिफारिश की थी, नीतीश सरकार ने सभी 18 जातियों को महा दलित में शामिल कर दिया.

हालांकि बाद में आयोग ने पासवान को छोड़कर सभी 21 जाति को महादलित में शामिल करने की सिफारिश कर दिया और नीतीश सरकार ने शामिल भी कर दिया. पासवान को नीतीश सरकार ने इसलिए बाहर रखा क्योंकि रामविलास पासवान के साथ नीतीश कुमार के उसे समय बेहतर संबंध नहीं थे. बाद में जब नीतीश कुमार और रामविलास के संबंध बेहतर हुए तो पासवान को भी महादलित में शामिल कर लिया गया यानी सभी 22 जातियों को महान दलित में शामिल किया गया.

महादलित विकास मिशन: आयोग महादलित विकास मिशन बनाने की सिफारिश की थी. सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक विकास के लिए 'महादलित विकास मिशन' के गठन की सिफारिश की गई नीतीश सरकार ने महादलित विकास मिशन का गठन कर दिया.

भूमिहीनों को जमीन: महादलित आयोग की सिफारिश के तहत भूमिहीनों को जमीन और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ इन जातियों तक पहुंचाने के उपाय सुझाए गए, जिस पर सरकार ने कई कदम भी उठाए.

छात्रवृत्ति आवास और आर्थिक सहायता: विशेष शैक्षणिक सामाजिक स्थिति का अध्ययन कर छात्रवृत्ति आवास और आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं को लागू करने की सिफारिश की गई, जिस पर सरकार ने कई फैसला लिए. आज हर जिले में एससी-एसटी छात्रावास हैं. छात्रवृत्ति सहित कई तरह के लाभ में दिए जा रहे हैं.

Jitan Ram Manjhi
सम्राट चौधरी के साथ जीतनराम मांझी (सौ. जीतनराम मांझी X हैंडल)

राजनीतिक विशेषज्ञ भोलानाथ का कहना है कि जिस मकसद से दलित विकास मिशन का गठन किया गया, उतना रिजल्ट नहीं दे पाया. एक तो महादलित बनाने के पीछे भी राजनीति थी लेकिन इसके बावजूद महादलित आयोग ने जो जो सिफारिश की और सरकार की तरफ से जो पहल की गई, उसमें बहुत बेहतर रिजल्ट नहीं आया और यही कारण है कि आज भी महादलित बनाए जाने के बावजूद दलित वर्ग के अधिकांश जातियों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है.

नीतीश कुमार के कारण आए बदलाव: हालांकि बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री और दलित वर्ग से आने वाले सुनील कुमार का कहना है कि नीतीश कुमार ने विजनरी नेता के तौर पर समाज के सबसे पिछड़े तबके को आगे लाने के लिए महादलित आयोग और फिर दलित विकास मिशन बनाकर उनके लिए कई योजनाओं को लागू किया. महादलित टोलों को सड़क से जोड़ा गया.

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नीतीश कुमार के साथ चिराग पासवान (ETV Bharat)

नीतीश कुमार जी की पहल के कारण महादलित समाज के लोगों को कई तरह की सुविधा मुहैया कराई गई. शैक्षणिक स्थिति में सुधार के लिए काम किया गया. आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए भी काम किया गया. अभी जो आरक्षण के मुद्दे पर बयानबाजी हो रही है तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है लेकिन सच यही है कि फिलहाल आरक्षण पर जो संवैधानिक व्यवस्था है, वही कायम रहेगा."- सुनील कुमार, जेडीयू नेता सह ग्रामीण कार्य मंत्री

2000 में लोजपा का गठन: पासवान मतों पर चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोजपा (रामविलास) का एकछत्र राज है. लोक जनशक्ति पार्टी का गठन 2000 में रामविलास पासवान ने किया था. हालांकि 2000 के चुनाव में पार्टी को केवल 10 सीटों पर जीत मिली लेकिन 2005 फरवरी में हुए चुनाव में लोजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 29 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की. बिहार में किसी को बहुमत नहीं मिला. रामविलास पासवान उस समय सरकार बनाने की 'चाबी' लेकर घूम रहे थे.

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रामविलास पासवान के राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं चिराग (सौ. चिराग पासवान X हैंडल)

2010 और 2015 में खराब प्रदर्शन: हालांकि बाद में विधायकों में टूट हुई और 2005 में अक्टूबर में फिर से दोबारा चुनाव हुआ तो उस समय लोजपा का प्रदर्शन काफी खराब रहा. 2010 विधानसभा चुनाव में भी लोजपा केवल तीन सीटों पर सिमट गई. 2015 विधानसभा चुनाव में लोजपा को केवल दो सीट पर जीत मिली.

2020 में निराशा और 2025 में शानदार प्रदर्शन: वहीं, रामविलास पासवान के निधन के बाद 2020 विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के नेतृत्व में पार्टी अकेले चुनाव लड़ी. 137 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन जीत केवल एक सीट (मटिहानी) पर मिली. हालांकि 2020 के चुनाव में चिराग ने जेडीयू और एनडीए को काफी नुकसान पहुंचाया. बाद में पारिवारिक कलह के कारण पार्टी टूट गई. 2025 के चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 19 सीटों पर जीत मिली है.

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एक तरह से देखें तो महादलित आयोग बनने से पहले लोजपा का सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा. उसके बाद 2025 में जब एनडीए के साथ समझौता हुआ, तब जाकर पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ.

लोकसभा में लोजपा का प्रदर्शन: जहां तक लोकसभा चुनाव की बात है तो लोजपा को 2005 में 4 सीटों पर जीत मिली थी, उस समय आरजेडी और कांग्रेस के साथ गठबंधन में रामविलास पासवान ने चुनाव लड़ा था. कुल 6.2% वोट प्राप्त हुआ था. वहीं, 2009 के चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाए. खुद रामविलास पासवान हाजीपुर में हार गए.

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एलजेपीआर चीफ चिराग पासवान (सौ. चिराग पासवान X हैंडल)

मोदी हवा में सुधरा स्ट्राइक रेट: 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ तालमेल होने के कारण लोजपा ने 7 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटों पर जीत हासिल हुई. 2019 के चुनाव में एक बार फिर से एनडीए के साथ तालमेल हुआ और 6 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 पर जीत हासिल की. वोट प्रतिशत में बढ़कर 7.9% हो गया. पारिवारिक कलह के बाद लोजपा रामविलास पासवान नाम से पार्टी बनाकर चिराग पासवान ने एनडीए के साथ तालमेल कर 2024 के चुनाव में पांच सीटों पर चुनाव लड़कर सभी पांचो सीट पर जीत हासिल की. लगातार दो लोकसभा चुनाव से 100% स्ट्राइक रेट रहा है.

जीतनराम मांझी का प्रदर्शन: नीतीश कुमार ने 2014 में जेडीयू के खराब प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया लेकिन कुछ ही महीने में उनके साथ विवाद हो गया. सीएम पद से हटाने के बाद मांझी ने अलग पार्टी (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) बना ली. 2015 में एनडीए के साथ मिलकर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन केवल एक सीट पर जीत मिली.

Jitan Ram Manjhi
जीतनराम मांझी (सौ. जीतनराम मांझी X हैंडल)

2020 में एक बार फिर से एनडीए के साथ 7 सीटों पर हम ने चुनाव लड़ा और 4 पर जीत मिली. वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में जीतनराम मांझी की पार्टी को एक सीट मिली और खुद उस पर जीतन मांझी चुनाव जीते. 2025 विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से एनडीए के साथ तालमेल हुआ और 6 में से 5 विधानसभा सीटों पर जीत मिली.

क्या बोले संतोष सुमन?: हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन का कहना है कि कभी राजनीतिक मंचों और बयानबाजी से बाहर निकलकर उन गरीबों की झोपड़ियों और मलीन बस्तियों में जाकर देखिए, जहां सूरज की किरण तो पहुंचती है लेकिन सरकारी योजनाओं, शिक्षा, अवसर और आरक्षण के लाभ की किरण आज भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है.

santosh Suman
हम अध्यक्ष संतोष सुमन (ETV Bharat)

"हम किसी के खिलाफ नहीं हैं. हम सबसे पीछे खड़े व्यक्ति के पक्ष में हैं. इसलिए राजनीतिक रोटी कौन सेंक रहा है, यह जनता बहुत अच्छी तरह समझती है. हम तो चाहते हैं कि आंकड़ों के आधार पर समीक्षा हो, वास्तविक स्थिति सामने आए और ऐसी व्यवस्था बने, जिससे जो लोग दशकों से पीछे रह गए हैं, उन्हें भी आगे आने का अवसर मिले."- संतोष सुमन, मंत्री सह अध्यक्ष, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा

क्या बोले चिराग पासवान?: केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने आरक्षण पर कहा कि आरक्षण प्रणाली में किसी तरह का बदलाव या अप वर्गीकरण समाज और दलित समुदाय को कमजोर करने का प्रयास है. उन्होंने कहा कि जब तक मैं यहां हूं और जब तक रामविलास पासवान जी का बेटा चिराग पासवान सरकार का हिस्सा है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर या समाप्त करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा.

Chirag Paswan
चिराग पासवान (सौ. चिराग पासवान X हैंडल)

"आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है. इसे समाप्त करने की बात तो दूर, इसकी समीक्षा या इसमें बदलाव की सोच भी उन लोगों की सोच को दर्शाती है, जो यह नहीं समझते कि आरक्षण आज भी क्यों आवश्यक है. आज भी सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. छुआछूत और भेदभाव की मानसिकता आज भी समाज में मौजूद है. ऐसे में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर क्या हम आगे बढ़ पाएंगे?"- चिराग पासवान, केंद्रीय मंत्री सह अध्यक्ष लोजपा (रामविलास)

तेजस्वी यादव का तंज: केंद्रीय मंत्रियों चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के बीच जारी तकरार पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने जोरदार हमला बोला है. उन्होंने कहा, 'ये नेता खुद आरक्षित सीटों से चुनाव जीतकर मंत्री बनते हैं, लेकिन ऐसे लोगों के साथ खड़े हैं, जो आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं. अगर दम है तो दोनों आरक्षित सीटों से इस्तीफा दें और सामान्य सीटों से चुनाव लड़कर अपनी लोकप्रियता साबित करें.'

Tejashwi Yadav
तेजस्वी यादव (ETV Bharat)

वहीं आरजेडी के बड़े दलित नेता और दो बार विधानसभा के अध्यक्ष रहे उदय नारायण चौधरी का कहना है कि जीतनराम मांझी और चिराग पासवान एनडीए के घटक दल से हैं. ऐसे में जब पूरे देश में इन दिनों लोग बीजेपी से नाराज हैं तो भाजपा अपने सहयोगियों के माध्यम से ध्यान हटाने के लिए ऐसे मुद्दों को चर्चा में लाती है.

"यह एक तरह से बीजेपी की यह साजिश है. एक केंद्रीय मंत्री आरक्षण की समीक्षा की मांग का समर्थन कर रहे हैं और दूसरा विरोध कर रहे हैं. जहां तक दलितों के आरक्षण का सवाल है तो वह संवैधानिक अधिकार है. यह आर्थिक आधार पर नहीं, सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है."- उदय नारायण चौधरी, नेता, राष्ट्रीय जनता दल

बीजेपी के दलित मंत्री क्या बोले?: बीजेपी कोटे से एससी-एसटी मंत्री लखेंद्र पासवान ने आरक्षण को लेकर कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, आरक्षण की समीक्षा या इसे छूना तो दूर, कोई इससे छेड़छाड़ भी नहीं कर सकता. उन्होंने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इसे किसी की खैरात नहीं समझना चाहिए. उन्होंने चिराग और मांझी को नसीहत भी दी है.

Lakhendra Paswan
मंत्री लखेंद्र पासवान (ETV Bharat)

"चिराग पासवान और जीतनराम मांझी दोनों एनडीए के बड़े नेता हैं. ऐसे में उन्हें अपने परिवार के दायरे से बाहर निकलकर समाज के दूसरे लोगों को भी राजनीतिक अवसर देना चाहिए."- लखेंद्र पासवान, बीजेपी नेता सह मंत्री, एससी/एसटी कल्याण विभाग

दलित वोट बैंक पर जेडीयू की नजर: वैसे 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए महादलित आयोग और फिर महादलित विकास मिशन बनाकर कई योजनाएं चलाई थी, जिसका उन्हें लाभ भी मिला लेकिन बिहार में रामविलास पासवान दलितों के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर उभरे. वहीं अब उनके बेटे चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के बीच भी दलितों का सबसे बड़ा बनने की अघोषित लड़ाई चल रही है. इसलिए आरक्षण के बहाने दोनों दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहे हैं.

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