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'राजेश राम और कृष्णा अल्लावरु को हटाया जाए', बोले कांग्रेस के दिग्गज नेता- RJD से तोड़ा जाए गठबंधन

बिहार में हार के बाद जहां कांग्रेस मंथन में जुटी है. वहीं इस्तीफे की डिमांड भी होने लगी है. आगे पढ़ें खबर

BIHAR CONGRESS CRISIS
पार्टी के अंदर विरोध के स्वर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : November 29, 2025 at 8:59 PM IST

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रिपोर्ट : आदित्य कुमार झा

पटना : बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष खत्म होती नहीं दिख रही है. पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद अब इसकी जिम्मेदारी तय करने और नेतृत्व में बदलाव की मांग उठने लगी है. विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए विरोध हो रहे हैं. नेताओं ने इसके लिए प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी को जिम्मेदार ठहराया है.

हार से संगठन में भूचाल : दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा. 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस मात्र 6 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस ने जिन सीटों पर दावेदारी जताई, वहां उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा.

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ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

हार की समीक्षा : विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से खराब प्रदर्शन के बाद दिल्ली में बिहार चुनाव परिणाम को लेकर समीक्षा बैठक का दौर चल रहा है. पिछले तीन दिनों में कई बार बिहार प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक हो रही है.

दिल्ली में हुई समीक्षा बैठक में राहुल गांधी ने हालांकि नैतिक जिम्मेदारी लेने की बात कही. पर इससे असंतोष कम नहीं हुआ. कई असंतुष्ट नेताओं ने साफ कहा कि सही मायनों में जिम्मेदारी प्रदेश स्तर पर तय होनी चाहिए.

नेताओं को कारण बताओ नोटिस : चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेता खुलकर प्रदेश नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर रही है. कुछ दिनों पहले प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ जमकर हंगामा किया. पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव का सदाकत आश्रम के अंदर विरोध किया गया.

लोगों ने प्रदेश नेतृत्व के कई नेताओं पर टिकट वितरण में गड़बड़ी का आरोप लगाया. कांग्रेस ने पार्टी के खिलाफ आवाज उठा रहे तीन दर्जन नेताओं को 18 नवंबर को कारण बताओ नोटिस जारी किया. 21 नवंबर तक इन लोगों को जवाब देने का वक्त दिया गया था. संतोष जनक जवाब नहीं मिलने के कारण कई नेताओं को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित भी कर दिया है.

प्रदेश नेतृत्व पर सवाल : कांग्रेस सेवा दल के अध्यक्ष आदित्य पासवान खुलकर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रभारी पर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं. आदित्य पासवान ने कहा कि विधानसभा चुनाव के परिणाम से पहले वह लोग टिकट वितरण में गड़बड़ी का आरोप लगाते रहे हैं. विधानसभा चुनाव के बीच एक सिटिंग विधायक का ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें किस तरीके से टिकट को लेकर हेरफेर किया गया था वह लोगों के सामने आया.

''विधानसभा चुनाव में पार्टी के तरफ से वैसे लोगों को टिकट दिया गया जो आरएसएस, बीजेपी, जदयू, लोजपा में थे. उनको बुलाकर कांग्रेस का टिकट दिया गया. इसी को लेकर पूरे पार्टी के अंदर असंतोष है."- आदित्य पासवान, अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस सेवा दल

आदित्य पासवान से खास बातचीत (ETV Bharat)

राहुल गांधी ने बनाया था माहौल : आदित्य पासवान कहते हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले वोटर अधिकार यात्रा निकाली गयी थी. पूरे बिहार में राहुल गांधी ने कांग्रेस के पक्ष में एक माहौल बनाया था. बिहार के लोग के बीच कांग्रेस को लेकर एक माहौल तैयार हो रहा था, लेकिन प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व की गलती के कारण इसका उलट परिणाम आया.

किन-किन पर आरोप? : कांग्रेस सेवा दल के अध्यक्ष आदित्य पासवान ने सीधा आरोप पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, पार्टी के प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावारु, विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के नेता रह चुके शकील अहमद खान, बिहार कांग्रेस के तीनों सह प्रभारी सुशील पासी, शाहनवाज आलम और देवेंद्र यादव पर लगाया. कहा कि यह लोग उस माहौल में सौदेबाजी करने का काम किये. जिसका परिणाम है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा.

प्रदेश अध्यक्ष पर सवाल : आदित्य पासवान ने आरोप लगाया कि 2010 के चुनाव में कांग्रेस बिहार के सभी 243 सीट पर चुनाव लड़ी थी और चार सीटों पर जीत हासिल हुई. इस बार तो महागठबंधन में शामिल होकर विधानसभा का चुनाव लड़ा गया. मात्र 6 सीट कांग्रेस जीत पाई. इस हाल के लिए यदि कोई जिम्मेदार हैं तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम हैं. उनको इस हार का नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

"यदि राजेश राम के पास नैतिकता होती तो 22000 वोटों से चुनाव हारने के बाद उन्हें औरंगाबाद से ही अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था. इसके अलावा प्रदेश प्रभारी और जितने भी पार्टी के प्रदेश संगठन सचिव हैं उन सबों को पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. जब तक प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी सहित जो भी दोषी हैं पार्टी से इस्तीफा नहीं देंगे तब तक आंदोलन चलता रहेगा."- आदित्य पासवान, अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस सेवा दल

राहुल गांधी की तारीफ : दिल्ली में हुई कांग्रेस की समीक्षा बैठक में राहुल गांधी ने बिहार में हुई पार्टी की हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली. राहुल गांधी के इस कदम पर आदित्य पासवान का कहना है कि राहुल गांधी का यह बड़प्पन है.

''राहुल गांधी ने बड़े ही भरोसे के साथ प्रदेश में नए अध्यक्ष, नए कांग्रेस प्रभारी के रूप में कृष्णा अल्लावारु को बिहार भेजा था. बिहार में कांग्रेस की खोई हुई पहचान दिलाने की जिम्मेदारी इन लोगों के ऊपर दी गई थी. बिहार में दलित को फिर से पार्टी के साथ जोड़ने के लिए दलित प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राजेश राम का चयन किया गया था. लेकिन राजेश राम राहुल गांधी की अपेक्षा पर खड़ा नहीं उतर पाए.''- आदित्य पासवान, अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस सेवा दल

राष्ट्रीय नेतृत्व को अवगत कराया : आदित्य पासवान ने कहा कि हम लोगों ने अपनी बातें सीर्ष नेतृत्व, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राहुल गांधी को बता दी है. हम लोगों को पूरा भरोसा है कि बहुत जल्द बिहार में पार्टी का नेतृत्व परिवर्तन होगा. अब कब तक होगा यह पार्टी के आला कमान तय करेंगे. क्योंकि राजेश राम कांग्रेस के अब तक के सबसे कमजोर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में जाने जाएंगे. ऐसा कमजोर नेतृत्व बिहार में मंजूर नहीं है.

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'टिकट देने में हुआ गड़बड़झाला' (ETV Bharat)

गठबंधन तोड़ने की सलाह : आदित्य पासवान का कहना है कि बिहार में गठबंधन तोड़ने का समय आ गया है. हम लोगों ने राष्ट्रीय नेतृत्व को सलाह दिया है कि जब तक राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन रहेगा तब तक बिहार में कांग्रेस अपने पैर पर खड़ा नहीं हो सकती है. गठबंधन के कारण कांग्रेस उन मजबूत सीटों पर चुनाव नहीं लड़ पा रही है जहां पर अभी भी कांग्रेस का संगठन मजबूत है.

''राजद के द्वारा कमजोर सीट कांग्रेस को दे दी जाती है. कांग्रेस की हार के कारण कार्यकर्ता मायूस हैं, कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए पार्टी के संगठन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस जब तक अकेले चुनाव नहीं लड़ेगी तब तक 80 का दौर फिर से वापस नहीं आएगा."- आदित्य पासवान, अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस सेवा दल

'आत्म चिंतन की जरूरत' : वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है बिहार में महागठबंधन की हार चुनाव के समय से ही स्पष्ट दिख रहा था. जिस तरीके से महागठबंधन के घटक दलों के बीच में ही सामंजस्य नहीं था. 11 सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ प्रत्याशी खड़े कर दिए गए थे. सीटों के चयन को लेकर विवाद था. यही कारण है कि महागठबंधन कहीं भी मजबूती के साथ एकजुट होकर चुनावी मैदान में नजर नहीं आया.

कांग्रेस पार्टी 2010 के विधानसभा चुनाव के बाद सबसे खराब दौर से गुजरी. 2020 में जहां कांग्रेस को 19 सीट पर सफलता मिली थी. महागठबंधन में रहते हुए मात्र 6 सीटों पर सिमट गई. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि पार्टी के जो भी सीनियर लीडर चुनावी मैदान में थे वे सब चुनाव हार गए. प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम विधायक दल के नेता शकील अहमद खान विधायक दल के पूर्व नेता अजीत शर्मा सहित सभी बड़े चेहरे को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

"90 के दशक से कांग्रेस बिहार में बैसाखी के सहारे राजनीतिक करती रही है. 2025 का विधानसभा चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महागठबंधन में रहते हुए राजद और कांग्रेस सहित गठबंधन के सभी दलों की करारी हार हुई है. वैसे में यदि कांग्रेस को बिहार में फिर से अपने पैरों पर खड़ा होना है तो इसके लिए सही रणनीति, अपने पुराने वोट बैंक को फोकस करते हुए आगे की राजनीति करनी होगी."- अरुण पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

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जब वोटर अधिकार यात्रा पर निकले थे राहुल गांधी (ETV Bharat)

पुराने जातीय समीकरण पर फोकस : वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. नवल किशोर चौधरी मानना है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद समीक्षा होनी चाहिए. प्रो एनके चौधरी का कहना है कि बिहार में पार्टी को फिर से अपने पारंपरिक सामाजिक वोटबैंक की ओर लौटना होगा. 90 के दशक से पहले कांग्रेस का बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार, मुस्लिम और दलित का कॉम्बिनेशन रहता था. यह वही समीकरण है जिसने 1980 के दशक तक कांग्रेस को मजबूती दी थी. लेकिन लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति में प्रभाव के बाद यह आधार बिखर गया.

''RJD के साथ रहकर सवर्ण वोटर कांग्रेस से दूर गया. दलित वोटर पासवान और रविदास वोटर अन्य दलों की ओर खिसक गया. मुस्लिम वोटर RJD की ओर चला गया. नीतीश कुमार और लालू प्रसाद राजनीति के अब आखरी पड़ाव में हैं. अभी उपयुक्त समय है कि कांग्रेस पार्टी नए सिरे से इन वोटबैंकों को जोड़ने की कोशिश करे. इसके लिए पार्टी के सामने यह चुनौती है कि निष्ठावान नेताओं को फिर से पार्टी में तरजीह दे. मजबूत नेतृत्व के हाथ में पार्टी की बागडोर हो जो सबों को एक साथ लेकर आगे की राजनीति कर सके."- प्रो एनके चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

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