20 साल में 1 इंच बढ़ता है ये पौधा, बिहार के इस IAS अधिकारी को कहते हैं 'कैक्टस मैन'
जीवनपर्यंत बिहार की सेवा करने वाले IAS अंजनी कुमार सिंह अब कांटों की रखवाली कर 'कैक्टस मैन' के रूप में प्रसिद्ध हो गए हैं. पढ़ें

Published : January 3, 2026 at 7:49 PM IST
रिपोर्ट: डॉक्टर रंजीत कुमार
पटना: पैडमैन, स्पाइडरमैन, माउंटनमैन जैसे कई नाम आपने सुने होंगे, लेकिन बिहार के पटना में एक शख्स 'कैक्टस मैन' के नाम से मशहूर हैं. कांटों की रखवाली करने वाले ये व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि बिहार के पूर्व मुख्य सचिव और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अंजनी कुमार सिंह हैं.
बिहार के कैक्टस मैन IAS अंजनी सिंह: ईटीवी भारत की टीम अंजनी सिंह के सरकारी आवास में जब पहुंची तो चारों तरफ कैक्टस की ऐसी प्रजातियां दिखीं जो विरले ही नजर आते हैं. बिहार में जन्मे 1981 बैच के सीनियर आईएएस ने 4000 से अधिक पौधों को संग्रह किया है. विश्व के कोने-कोने से दुर्लभ पौधे इकट्ठा किए हैं.
"मुझे पौधे संग्रहण करने का शौक है. मेरी पत्नी को फूल-पौधों का बहुत शौक था. धीरे-धीरे हमने दुनिया भर से दुर्लभ प्रजाति के पौधों को जमा करना शुरू किया. बहुत सारे पौधे अफ्रीका से और लैटिन अमेरिका से लाए गए हैं. बहुत से पौधे खतरे में हैं या खत्म हो रहे हैं, उनको बचाने की कोशिश जारी है."- अंजनी कुमार सिंह, पूर्व मुख्य सचिव, बिहार
20 साल में एक इंच हाइट: यू तो अंजनी सिंह के गार्डन में कई अनोखे पौधे देखने को मिले, लेकिन इनमें से सबसे अधिक आकर्षित करने वाला हवार्किया पौधा है, जो दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता है. यह फ्यूचर प्लांट के नाम से भी फेमस. सबसे खास बात ये कि 20 साल में एक इंच ही हवार्किया बढ़ता है. इसे बहुत कम पानी की जरूरत होती है और इसकी कीमत 1000 रुपये है.

गार्डन में हैं ये खास कैक्टस: उन्होंने बताया कि अगाभे पौधा मेक्सिको से लाया गया है और इस पौधा से वहां रस्सी बनायी जाती है. इसके 100 वैरायटी हमारे गार्डन में हैं. एक कैक्टस की प्रजाति अलो है, जिसे कटने पर लगाया जाता है. कुछ ऐसे पौधे हैं जिसे अमेजॉन इलाके से लाया गया है कोलंबिया पेरू जैसे देश से पौधे ले गए हैं.
पौधों को रेनफॉरेस्ट विधि से उगाया जाता है और यह पौधे हरे के बजाय रंगीन होते हैं. कई बार एक पौधे में दो कलर भी होते हैं. एन्युरिम पौधा कोस्टा रिका में पाया जाता है. यह पौधा आधा पीला और आधा उजाला होता है. कई बार एक पौधे में तीन रंग भी देखने को मिलते हैं.

अंजनी कुमार सिंह बताते हैं कि एग्रोनॉमीमा पौधा भी अपने आप में अनोखा है. इस पौधे को दक्षिण पूर्व एशिया से लाया जाता है. इसके पत्ते कई रंग के होते हैं. गुलाबी पत्ते देखने में काफी खूबसूरत होते हैं और पान के रंग के होते हैं. कार्मल मार्बल पौधे भी बेहद खूबसूरत होते हैं और इसे थाईलैंड से हमने लाया है. पत्तों में तीन या चार रंग होते हैं यह पत्ते भी बेहद खूबसूरत होते हैं.

2000 से अधिक कैक्टस के पौधे: सीनियर आईएएस अधिकारी अंजनी सिंह को पौधे इकट्ठा करने का शौक रहा है. पिछले 30 साल से अंजनी कुमार सिंह दुर्लभ प्रजाति के पौधे को इकट्ठा करने में जुटे हैं. आज की तारीख में 4000 से अधिक पौधे इकट्ठा कर रखे हैं, जिसमें की 2000 से अधिक कैक्टस के पौधे हैं. देश भर में पौधों का अपने आप में यह अनोखा संग्रह है. विश्व के कई देशों से लाए गए पौधे अंजनी सिंह के बगीचे को अलग पहचान दिलाते हैं.
विश्व के कई देशों से लाये पौधे: 67 साल के अंजनी सिंह पिछले 30 साल से अलग-अलग प्रजातियों के पौधों को इकट्ठा कर रहे हैं. विश्व के कई देशों से पूर्व मुख्य सचिव ने पौधे लाए हैं. दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, अमेरिका, ब्राज़ील और इंग्लैंड जैसे देशों से भी अंजनी कुमार सिंह ने दुर्लभ पौधे लाए हैं और अपने सरकारी आवास पर एक अनूठे बगीचे को आकार दिया है. पूर्व मुख्य सचिव की सुबह पौधों के साथ शुरू होती है और 2 से 3 घंटे समय पौधों पर देते हैं.

रिकॉर्ड कैक्टस पौधों का किया संग्रह: 1981 बैच के तेज तर्रार आईएएस ऑफिसर अंजनी कुमार सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं है. अंजनी सिंह बिहार के मुख्य सचिव रहे और वर्तमान में बिहार म्यूजियम के डीजी के पद पर पदस्थापित हैं. अंजनी कुमार सिंह का जन्म स्थान बिहार का सीवान जिला है. उनका बचपन बेगूसराय के चमथा गांव में बीता था. 67 साल के अंजनी कुमार सिंह ने पौधों को इकट्ठा करने के मामले में कीर्तिमान बना रखा है.
शिक्षा विभाग में दिया महत्वपूर्ण योगदान: उन्होंने 4 वर्षों तक बिहार के मुख्य सचिव के रूप में कार्य किया. वर्तमान में वे बिहार संग्रहालय (Bihar Museum) के महानिदेशक और मुख्यमंत्री के सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं. शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव रहते हुए उन्होंने 'मुख्यमंत्री साइकिल योजना' और 'मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना' जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी भूमिका निभाई.

सम्मान: साक्षरता के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा UNESCO पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.उन्होंने 'काफ़ी है एक ज़िंदगी' (One Life Is Enough) नामक पुस्तक भी लिखी है.
पत्नी से मिली प्रेरणा: ईटीवी भारत की टीम ने भी अंजनी सिंह के बगीचे का दौरा किया. खास बातचीत के दौरान अंजनी कुमार सिंह ने बताया कि उनकी पत्नी को पेड़ पौधों का शौक था और उनसे ही पेड़ पौधों को इकट्ठा करने की प्रेरणा उन्हें मिली. पूर्व मुख्य सचिव ने कहा कि अमेजॉन के जंगलों में पाया जाने वाला पौधा जो कि भारत में दुर्लभ है उसे भी मैंने वहां से लाने का काम किया है.
"20 साल से पौधा सरवाइव कर रहा है और उसकी लंबाई महज एक या दो इंच का है. अलग-अलग प्रजातियों के 2000 से अधिक कैक्टस के पौधे भी मैंने इकट्ठा किए हैं जो की अलग-अलग देशों से ले गए हैं. पौधों का रंग आकार और उसकी खासियत आपको निहारने के लिए मजबूर कर देगी."- अंजनी सिंह, पूर्व मुख्य सचिव, बिहार
अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि जब हम विदेशों से किसी पौधे को लाते हैं तो उसे बॉक्स में रखकर यहां के वातावरण के मुताबिक ढालने की कोशिश करते हैं और इस प्रक्रिया में 3 महीने से अधिक का समय लगता है. पौधों को कई बार नमी दी जाती है तो कई बार ठंड बढ़ने के चलते गर्मी भी दी जाती है. इन दोनों बिहार में ठंड है जिसके चलते पौधों के इर्द-गिर्द आग भी जलाना होता है. पूर्व मुख्य सचिव ने बताया कि कई ऐसे पौधे हैं जो आयुर्वेदिक भी हैं. जानने वाले लोग उनसे पौधे मांग कर भी ले जाते हैं.

कैक्टस की प्रजातियों की संख्या: कैक्टस को नागफनी भी कहा जाता है. भारत सहित विश्व के कई देशों में कैक्टस की अलग-अलग प्रजातियां हैं. विश्व भर में कैक्टस की लगभग 1,750 से 2,000 प्रजातियां पाई जाती हैं. ये सभी प्रजातियां मुख्य रूप से 'कैक्टेसी' परिवार के अंतर्गत आती हैं, जिन्हें लगभग 127 अलग-अलग वंशों (Genera) में विभाजित किया गया है.

30 साल पुराने कैक्टस: मुख्य प्रजातियां और उनके नाम कैक्टस की प्रजातियों को उनके आकार, फूलों और रहने के स्थान के आधार पर पहचाना जाता है. अंजनी कुमार सिंह के कैक्टस के ज्यादातर प्रजातियों को अपने आवास पर सहेज कर रखा है. कई तो 30 साल पुराने कैक्टस भी हैं. कुछ कैक्टस को अमेजॉन इलाके से भी लाया गया है.
कैक्टस के कुछ प्रमुख प्रजातियां: सगुआरों कैक्टस सबसे ऊंचा और प्रसिद्ध कैक्टस है, जो अक्सर फिल्मों में रेगिस्तानी दृश्यों में दिखता है. इसका वैज्ञानिक नाम Carnegiea gigantea है. यह कैक्टस के पौधे 150 साल से लेकर 200 साल तक जीवित रह सकते हैं. प्रिकली पियर को हिंदी में 'नागफनी' भी कहते हैं. इसके पत्ते चपटे होते हैं और इस पर कांटेदार फल (कांटेदार नाशपाती) लगते हैं.

बैरल कैक्टस एक गोल मटके या ड्रम जैसा दिखता है और रेगिस्तान में पानी के स्रोत के रूप में जाना जाता है. बनी इयर कैक्टस के छोटे-छोटे कान जैसे हिस्से खरगोश के कान की तरह दिखते हैं, इसलिए इसे यह नाम मिला है. क्रिसमस कैक्टस, यह प्रजाति सर्दियों में फूल देने के लिए जानी जाती है और अक्सर घरों के अंदर सजावट के लिए उपयोग की जाती है.
गोल्डन बैरल, यह पूरी तरह गोल होता है और इस पर पीले रंग के घने कांटे होते हैं. ओल्ड लेडी कैक्टस में सफेद रेशे जैसे बाल होते हैं, जो इसे एक अलग रूप देते हैं. स्टार कैक्टस, कैक्टस प्रजातियां प्राकृतिक रूप से अमेरिका (उत्तर और दक्षिण) महाद्वीपों की मूल निवासी हैं. ब्लू कॉलम्र कैक्टस यह अपनी नीली रंगत और खंभे जैसे आकार के लिए प्रसिद्ध है.

लगभग सभी प्रकार के कैक्टस 'सुकुलेंट्स' (Succulents) होते हैं, यानी वे अपने तनों में पानी जमा करते हैं, लेकिन सभी सुकुलेंट्स कैक्टस नहीं होते हैं. रैट टेल कैक्टस इसकी लंबी, पूंछ जैसी टहनियां होती हैं जो नीचे की ओर लटकती हैं. यह कैक्टस घर की शोभा को बढ़ाने का काम करता है.

ये भी पढ़ें
मक्के के छिलके से बना कप-प्लेट देखा है कहीं, कैंसर से इनोवेशन की ये कहानी है खास
INSPIRING STORY: विदेश की नौकरी छोड़ बिहार के अमेश विशाल बने किसान, ताइवान पिंक अमरूद से हुए मालामाल
बिहार की सीमा, मरियम और राधिका की कहानी, कूड़ा चुनने से लेकर शेफ तक का सफर
बेटा-बहू IPS, बेटी PCS, फिर भी किताब बेचते हैं 64 साल के अनिल कुमार

