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बिहार के हॉस्पिटल में इलाज के लिए लंबी कतारें, सरकारी अस्पतालों में मरीजों के धैर्य का होता है इम्तिहान

सरकारी अस्पताल में मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है. क्योंकि यहां मेडिकल कॉलेजों में ही मरीजों के धैर्य का इम्तिहान होता है-

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मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में इंतजार लंबा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : January 9, 2026 at 9:07 PM IST

10 Min Read
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पटना : बिहार के सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों को सबसे पहले लंबा इंतजार नसीब हो रहा है. सूबे के बड़े और प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में मरीजों की भीड़ इतनी ज्यादा है कि इलाज से पहले घंटों कतार में खड़ा रहना उनकी मजबूरी बन गया है. स्थिति यह है कि रजिस्ट्रेशन कराने से लेकर डॉक्टर से मिलने और दवा लेने तक में कई-कई घंटे लग रहे हैं. इससे मरीजों के साथ-साथ उनके परिजन भी मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान हो रहे हैं.

क्या है भव्या ऐप? : अस्पताल में मरीज के आने के बाद रजिस्ट्रेशन करने से लेकर डॉक्टर से दिखाने और दवा लेने तक इतना समय लग रहा है इसकी मॉनिटर के लिए सरकार ने भव्या ऐप तैयार की है. इसमें मरीज का सभी डाटा उपलब्ध होता है. इस ऐप में एक बार रजिस्ट्रेशन हो जाने के बाद मरीज को बार-बार डॉक्टर से दिखाने के लिए अपने फाइल को ढोकर साथ लाने की जरूरत नहीं होती है. डायग्नोसिस से लेकर जांच रिपोर्ट और प्रिसक्राइब की गई दवाओं का विवरण उपलब्ध होता है, जिससे भविष्य में भी डॉक्टर को देखते वक्त उसके टेबल पर सभी जानकारी उपलब्ध हो जाती है कि पूर्व में क्या इलाज हुआ है.

देखें रिपोर्ट- (ETV Bharat)

मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में इंतजार लंबा : पटना जैसे शहर, जहां पीएमसीएच, एनएमसीएच और आईजीआईएमएस जैसे बड़े मेडिकल संस्थान मौजूद हैं, वहां हालात संतोषजनक नहीं हैं. सुबह-सुबह अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को उम्मीद होती है कि दोपहर तक इलाज हो जाएगा, लेकिन कई मामलों में शाम तक भी नंबर नहीं आ पाता. बुजुर्ग, महिलाएं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए यह इंतजार और भी पीड़ादायक साबित हो रहा है. भव्या ऐप के आंकड़े बता रहे हैं कि बड़े मेडिकल संस्थानों में मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है.

पटना में औसत प्रतीक्षा समय अधिक : भव्या ऐप के आंकड़ों के मुताबिक, देश में ओपीडी में औसत प्रतीक्षा समय करीब 38 मिनट माना जाता है. लेकिन बिहार के बड़े सरकारी अस्पताल इस राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं. पीएमसीएच में मरीजों को औसतन 75 से 85 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है. आईजीआईएमएस में यह समय 60 से 70 मिनट और एनएमसीएच में 55 से 65 मिनट के बीच है. कई बार हालात इससे भी बदतर हो जाते हैं, खासकर तब जब डॉक्टरों की संख्या कम हो या किसी विभाग में विशेष भीड़ उमड़ जाए.

कटिहार में 25 मिनट का औसत प्रतीक्षा समय : सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मरीजों को सिर्फ डॉक्टर से मिलने के लिए ही नहीं, बल्कि दवा लेने के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है. पीएमसीएच और आईजीआईएमएस में मरीजों को रजिस्ट्रेशन और जांच के बाद दवा काउंटर पर 1.5 से 2 घंटे तक लाइन में खड़ा रहना पड़ रहा है. हालांकि बिहार के सभी जिलों में हालात एक जैसे नहीं हैं. कटिहार जैसे जिलों में बेहतर रजिस्ट्रेशन व्यवस्था के कारण औसत इंतजार समय करीब 25 मिनट तक सीमित है. वहीं सिवान जैसे जिलों में मरीजों को औसतन 65 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है.

विशेषज्ञ मानते हैं डॉक्टरों की है कमी : विशेषज्ञ इन हालातों के लिए सबसे बड़ा कारण सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या के अनुपात में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी मानते हैं. आईएमए बिहार के पूर्व अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने बताया कि राज्य में सरकारी क्षेत्र में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी निजी क्षेत्र के तुलना में अधिक है. वजह है कि बड़े पैमाने पर डॉक्टर आउटसोर्सिंग से आते हैं और अनुबंध समाप्त होने के बाद आगे की कंटिन्यूटी का प्रोसेस पेचीदा है. इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट में प्रमोशन और वेतन वृद्धि का कोई नियम नहीं है. इसलिए सरकारी क्षेत्र में कुछ दिनों काम करने के बाद डॉक्टर अपना प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं.

मेडिकल कॉलेज का बड़ा क्षेत्रफल भी बड़ा वजह : डॉ अजय कुमार बताते हैं कि सरकारी अस्पतालों में एक-एक डॉक्टर पर सैकड़ों मरीजों की जिम्मेदारी होने से ओपीडी में भीड़ लगना स्वाभाविक हो जाता है. रजिस्ट्रेशन काउंटर पर 1 मिनट में एक पर्ची कट जाएगी लेकिन डॉक्टर जब मरीज को देखा है तो 5 से 10 मिनट का समय लग जाता है. ऐसे में डॉक्टर के पास कतार लंबी हो जाती है. मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में रजिस्ट्रेशन से लेकर दवा लेने तक में समय अधिक इसलिए लगता है क्योंकि मेडिकल कॉलेज अस्पताल बड़े परिसर में होते हैं. इसमें रजिस्ट्रेशन काउंटर कहीं और होता है और विभिन्न विभाग का ओपीडी कहीं और होता है. इसके अलावा दवा काउंटर भी किसी और छोड़ पर होता है.

''मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में मरीज की डायग्नोसिस अच्छे से की जाती है. बेहतर इलाज होता है, क्योंकि सीनियर डॉक्टर वहां मरीज पर ही अपने जूनियर को सिखाते हैं. जो भी मरीज आते हैं उन्हें पर्याप्त समय लेकर आना चाहिए और इमरजेंसी की स्थिति के लिए अलग इमरजेंसी डिपार्टमेंट होता है. अस्पताल में दिखाने आ रहे हैं तो दो से चार घंटे का समय लेकर आना चाहिए. अन्यथा टाइम स्लॉट बुक करके आने के निर्धारित आधे घंटे की अवधि में ही उन्हें देखा जाएगा और उनका नंबर आएगा.''- डॉ अजय कुमार, पूर्व अध्यक्ष, IMA बिहार

मेडिकल कॉलेज में दवा काउंटर पर ओवरलोड : डायग्नोसिस के बाद अस्पताल में एक दवा काउंटर पर भीड़ लगने के मामले में डॉक्टर अजय कुमार ने कहा कि अलग-अलग डिपार्टमेंट की ओपीडी के मरीज दवा के लिए आ जाते हैं. इसके कारण दवा देने में भी अधिक समय लगता है. दवा काउंटर पर लंबी लाइन नजर आती है. मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक से दो दवा के काउंटर होते हैं. एसे में यहां के 26 से 27 ओपीडी में कहीं 3000 तो कहीं 7000 मरीज देखे जाते हैं. किसी को एक दवा लिखी जाती है तो किसी को 7 दवा लिखी जाती है. दवा ढूंढ कर पेशेंट को उपलब्ध कराने में भी केमिस्ट को काफी समय लगता है. यह सब व्यावहारिक कारण है, जिसके कारण थोड़ा समय लगता है. ध्यान यह होना चाहिए कि मरीज को बेहतर इलाज मिले ना की जल्दी मिल जाए.

''बिहार के सरकारी अस्पतालों में अभी भी चिकित्सकों की कमी बरकरार है और मैनपावर की भी भारी कमी है. सरकार को चाहिए कि एक ऐसी पॉलिसी बनाएं की सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर लंबे समय तक टिक सके. 5 साल एमबीबीएस की पढ़ाई करके आने के बाद कॉन्ट्रैक्ट पर डॉक्टर को 65000 की सैलरी दी जाती है. इसके बाद पीएचसी लेवल पर आवासीय डॉक्टर को आवास की सुविधा नहीं मिलती है जिसके कारण केंद्र पर आने के लिए लंबी ट्रैवल करनी पड़ती है. इसके अलावा अस्पताल में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और एमआरआई मशीन पर बहुत अधिक पेशेंट लोड होता है. जिसके कारण कई बार एमआरआई जैसी जांच के लिए 10 से 15 दिन बाद का नंबर मिलता है.''- डॉ अजय कुमार, पूर्व अध्यक्ष, IMA बिहार

बढ़ानी होगी मैन पॉवर क्षमता : विशेषज्ञ का मानना है कि समस्या का समाधान सिर्फ नए भवन या किसी ऐप से नहीं होगा. इसके लिए डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की संख्या बढ़ाने, रजिस्ट्रेशन और दवा वितरण प्रक्रिया को सरल बनाने (जैसे काउंटर बढ़ाने) और मरीजों की संख्या के अनुसार ओपीडी स्लॉट तय करने की जरूरत है. इसके अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत किया जाए, ताकि छोटे इलाज के लिए मरीजों को बड़े अस्पतालों की ओर न दौड़ना पड़े. इसके अलावा बड़े अस्पतालों में जांच मशीन की संख्या अधिक करने की भी जरूरत है.

न्यू गार्डिनर में स्थिति बेहतर : हालांकि बिहार के दो-चार डिपार्टमेंट वाले सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल हैं वहां मरीजों को कम इंतजार करना पड़ रहा है. पटना के न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल में मरीज को आधे घंटे से 1 घंटे का समय लग रहा है और इस दौरान उनका पर्ची काटने से लेकर डॉक्टर से दिखाने और दवा मिलने का काम पूरा हो जा रहा है. यहां स्किन से संबंधित समस्या को लेकर दिखाने पहुंचे विशाल कुमार ने कहा कि रजिस्ट्रेशन करने वक्त मोबाइल नंबर मांगा गया और मोबाइल पर मैसेज भी आया. इसके बाद डॉक्टर से दिखाने में 5 मिनट का समय लगा और अब वह दवा काउंटर पर दवा लेने जा रहे हैं.

''मैं एक दिन पहले इलाज कराने आया था और आज जांच रिपोर्ट दिखाने आया हूंं. कल मुझे एक से डेढ़ घंटा तक लग गया. मेरा पर्ची काटा गया तब मुझसे मोबाइल नंबर लिया गया और उसके बाद डॉक्टर से दिखाने और फिर ब्लड टेस्ट का सैंपल देने और दवा लेने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगा.''- अविनाश मिश्रा, मरीज के परिजन

भव्या ऐप में अपना स्लॉट बुक कर सकते हैं : न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर मनोज कुमार सिन्हा ने कहा कि अस्पताल में 20 मिनट से 30 मिनट के भीतर सभी प्रक्रिया हो जा रहे हैं. भव्या ऐप बहुत ही शानदार ऐप है. घर बैठे ही रजिस्ट्रेशन करके आप अपना स्लॉट बुक कर सकते हैं.

''यहां जिन बुजुर्गों का अपना मोबाइल नंबर नहीं होता, उनका यहां के डाटा ऑपरेटर अपने नंबर से रजिस्ट्रेशन कर देते हैं. ऐप पर दवाइयां के प्रिस्क्रिप्शन से लेकर जांच रिपोर्ट तक उपलब्ध होते हैं जिससे डॉक्टर को आगे की डायग्नोसिस में भी मदद मिलती है और मरीज को भी जांच रिपोर्ट की भारी फाइल ढोकर नहीं लानी पड़ती है.''- डॉ. मनोज कुमार सिन्हा, अधीक्षक, न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल

बिहार हाई फोकस स्टेट की श्रेणी में : केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भव्या ऐप के संबंध में बिहार को ‘हाई फोकस स्टेट’ की श्रेणी में रखा है. इसका मतलब यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए यहां विशेष ध्यान और संसाधन दिए जाने हैं. सरकार की ओर से अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, नए डॉक्टरों की बहाली और डिजिटल सिस्टम को बेहतर बनाने की योजनाएं बनाई गई हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन सुधारों का असर अभी जमीन पर साफ नजर नहीं आ रहा है. हालांकि अगर बिहार की तुलना अन्य राज्यों से की जाए, तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है. केरल, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों में सरकारी अस्पतालों में औसत इंतजार समय काफी कम है. दिल्ली और पंजाब में मरीजों को 25 से 40 मिनट के भीतर डॉक्टर से मिलने का मौका मिल जाता है.

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