'एक दिन तो मजदूरी ही करेगा..' समाज के तानों को हथियार बना बिहार का लाल आज सात समंदर पार अमेरिकियों को सिखा रहा भारतीय संस्कृति
गरीबी और नक्सली खौफ़ से लड़कर आज गया के बैरम खान अमेरिका की 'वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी' में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. पढ़ें खबर

Published : June 8, 2026 at 7:58 AM IST
गयाजी: "मां चिंता न करें, सब्र करें एक दिन मेरी भी किस्मत का ताला खुलेगा, आज मैं भूखा रहता हूं लेकिन यही परिश्रम मुझे सात समंदर पार पहुंचाएगा, कल का सवेरा मेरे लिए खुशियां लेकर आएगा." - अपने बेटे के इन अल्फाजों से मां इशरत खानम का दिल बैठ जाया करता था...लेकिन न उन्होंने खुद हिम्मत हारी न ही बेटे को हिम्मत हारने दी.
बुलंदियों के शिखर तक पहुंचे: शायद यहीं कारण रहा कि आज बिहार की धरती का लाल अमेरिका की नई पीढ़ियों को भारत की संस्कृति सभ्यता और भाषाओं का ज्ञान देता है. तमाम आर्थिक तंगियों और विपरीत परिस्थितियों में नक्सल प्रभावित क्षेत्र से निकल कर ये बेटा बुलंदियों के शिखर तक पहुंचने में कामयाब हो पाया.
डॉ बैरम खान की कहानी: यह कहानी है मूलरूप से गया जिला के बांके बाजार प्रखंड के खजूरिया गांव के रहने वाले डॉ बैरम खान की. बेटे का हौसला नहीं टूटे मां इशरत खानम बेटे को कहानी सुनाने लगती थीं, बेटे से उम्मीद जताने लगती थीं कि तुम ही हो जो नाम रोशन करोगे, घर आंगन में खुशहाली लाओगे. यह कहानी है डॉ बैरम खान और उनके परिवार की. जिन्होंने संघर्ष की सारी हदें पार कर दी.

'वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी' में असिस्टेंट प्रोफेसर:आज बैरम खान अमेरिका के एक बड़े विश्वविद्यालय 'वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी' में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. पहली बार वो अमेरिका 2015 में गए थे उनकी इस सफलता से मां, भाई-बहन सभी खुश हैं. मगर आज भी परिवार के सदस्य बैरम खान के संघर्षों की कहानी बताते हैं तो अपने आंसू नहीं रोक पाते
परिवार की आशाएं: घर का बड़ा बेटा होने की वजह से परिवार की आशाएं भी उन से ज्यादा थीं. संघर्ष ऐसा था कि ना सिर्फ भूख गरीबी से लड़ना था बल्कि जिंदगी के हर मोड़ पर हर सवेरे के साथ एक नए चैलेंज का सामना होता था, हर दिन समाज और परिवार के अलग-अलग लोगों हर दिन उनका पाला पड़ता था, जो किसी न किसी तरह ताने कसते थे.
छोटे से मकान में गुजरा बचपन: बैरम का बचपन गया जी शहर में एक छोटे से मकान में गुजरा है. एक कमरे में पूरा परिवार रहता था, लेकिन इसी घर में रहकर पिता दिवंगत शौकत हयात खान ने सफलता की सीढ़ी तैयार की. आज डॉ बैरम खान अमरीकियों को साउथ एशियन भाषाएं और कल्चर पढ़ाने में लगे हैं. यह उनकी सफलता माता पिता के भी संघर्ष का तोहफा है.
खूब पढ़ा लिखा परिवार: बचपन की बात याद करते हुए बैरम खान बताते है कि हमारा परिवार खूब पढ़ा लिखा था, जर जमीन भी अच्छी खासी थी, लेकिन तभी 1980 के दशक में गया जिला नक्सलवाद की जद में आ गया था. तब बांके बाजार का क्षेत्र सब से ज्यादा प्रभावित हुआ.पिता जी की 100 एकड़ से अधिक भूमि को नक्सलियों ने सीज करने का ऐलान कर दिया.
गांव से पलायन करना पड़ा: बैरम बताते है कि इसके बाद खेती बाड़ी पूरी तरह से ठप हो गई. नक्सलियों की प्रताड़ना से पिता शौकत हयात खान को गांव से पलायन करना पड़ा. पूरा परिवार धीरे धीरे गरीबी रेखा को भी पार कर गया. माता पिता ने संघर्ष कर बच्चों को किसी तरह तो पालन-पोषण किया, लेकिन वे आर्थिक रूप से इतने कमजोर हो गए थे कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकते थे.

टीचिंग में दिलचस्पी: डॉ बैरम खान कहते हैं कि बचपन से ही उनके यहां पढ़ाई का शौक सभी भाई बहनों को था. मगर उनकी शिक्षा के बीच में आर्थिक तंगी आ रही थी, तब उन परिस्थितियों में उन्होंने घर की जिम्मेदारियों को संभाला. वो दिन में स्कूल जाते और शाम से देर रात तक ट्यूशन पढ़ाते थे ताकि उस से आने वाले पैसे से वह अपने और परिवार का खर्च उठा सकें.बैरम खान बताते हैं कि उन्होंने क्लास 6 से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था, शायद यही वजह है कि टीचिंग में उन्हें हमेशा के लिए दिलचस्पी हो गई.
माता-पिता ने हौसला बढ़ाया: बैरम के मुताबिक एक समय ऐसा आया जब मैट्रिक के बाद आगे की शिक्षा को लेकर वह सोचने पर मजबूर हुए की वह आगे की पढ़ाई छोड़कर काम करें ताकि घर के खर्च चला सकें, लेकिन फिर माता-पिता ने उनका हौसला बढ़ाया कि जिस तरह से चल रहा है वह चलता रहेगा.
"माता-पिता ने हौसला बढ़ाया. उन लोगों ने कहा कि एक समय का भोजन घर में नहीं वो बर्दाश्त है लेकिन तुम्हारी पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए, फिर तब मैने इंटर तक की पढ़ाई की."- डॉ बैरम खान
जामिया में लिया दाखिला: अपने संघर्षों को याद करते हुए बैरम खान कहते हैं कि जब उच्च शिक्षा का सोचकर बाहर जाने की सोची और दिल्ली गए तब काफी मुश्किलों से पैसे इकट्ठा किए थे, मुश्किल से 1500 से 2000 रुपए लेकर दिल्ली गए,कोई जानता नहीं था, कोई बैकअप नहीं था सिर्फ जुनून था कि अच्छे से पढ़ाई करनी है, और फिर इसी जुनून की बदौलत जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला ले लिया.
"दिल्ली जाने के दौरान मैने बैरम को साथ ले जाने के लिए सत्तू और चने दिए थे, बैरम उसी को खा कर अपना वक्त गुजरता था. उसने पहली सफलता तब पाई जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उनका ग्रेजुएशन के लिए नामांकन हुआ था." - इशरत खानम, बैरम खान की मां
गरीब नहीं थे बनाए गए थे: डॉ बैरम खान कहते हैं कि हमारा परिवार गरीब नहीं था लेकिन 80 के दशक के बाद गरीब बना दिया गया. मुझे पता नहीं कि नक्सलवाद की क्या विचारधारा थी, लेकिन हमने देखा है कि वह परिवार भी टूटे बिखरे और संघर्ष किया जो समाज की भलाई के लिए हमेशा लगे होते थे, वैसे परिवारों को सबसे ज्यादा नक्सलियों ने टारगेट किया था,

"एक समय था जब इस क्षेत्र के युवा मैट्रिक तक की भी शिक्षा प्राप्त नहीं करते थे, लेकिन हमारे परिवार में पढ़ने का माहौल हमेशा से रहा है, दादा भी स्कॉलर थे पिता भी पढ़े लिखे थे , परंतु 80 के दशक में जो स्थिति बिगड़ी थी, उसकी वजह से हमारे परिवार और कई अन्य परिवार इस क्षेत्र के थे उन्हें संघर्ष करना पड़ा." - डॉ. बैरम खान
नक्सलियों ने किया प्रताड़ित: बैरम कहते हैं कि वो परिवार ऐसे थे जिनकी क्षमता थी कि वह क्षेत्र को शिक्षा और आर्थिक रूप से आगे बढ़ाते, वैसे लोगों को नक्सलियों ने काफी प्रताड़ित किया,जिसकी वजह से लोग पलायन करने पर मजबूर हुए, हमारा परिवार भी घर से बेघर रहा.बहुत सारे लोग आज भी कोलकाता दिल्ली में मजदूरी का काम करते हैं,
पढ़ाई पर था फोकस: कई परिवार पीढी-दर पीढ़ी नक्सलियों के कारण प्रभावित रहे. शायद मैं भी उन्हीं में एक होता और मजदूरी करता लेकिन परिवार में पढ़ने की दिलचस्पी शुरू से रही है इस वजह से गरीबी में भी पढ़ाई पर फोकस था, दसवीं तो किसी तरह से बांके बाजार से ही किया.
"तब बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव था सड़के नहीं थी, नदी में पुल नहीं था बिजली नहीं थी उस स्थिति में गांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर हर दिन पैदल जाकर पढ़ाई करते थे, उस समय से ही संघर्ष का मामला चलता रहा था,आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद पढ़ाई को बाधित होने नहीं दिया." - डॉ. बैरम खान
अंग्रेजी में तंग थी जुबान: डॉ बैरम खान बताते हैं कि दिल्ली जाने से पहले अंग्रेजी उनकी अच्छी नहीं थी, उनकी ही क्या तब इस क्षेत्र के ग्रेजुएट लोगों की भी अंग्रेजी भाषा में जुबान तंग थी. वह कहते हैं कि इस क्षेत्र में पहले शिक्षा तो होती थी लेकिन हम छात्रों को एक तरह से अंग्रेजी से दुश्मनी थी. यहां पढ़ने वाले छात्र अंग्रेजी बोलने में शून्य हुआ करते थे.
"मैं जब दिल्ली जाने का प्लान कर रहा था तब मैंने यह निर्णय लिया कि जाने से पहले एक साल तक यहां रहकर अपनी इंग्लिश को अच्छी करूंगा और मैने वैसा किया भी जिसका फायदा मुझे दिल्ली में बहुत मिला था."- डॉ. बैरम खान
बीच में ही छोड़ दी पढ़ाई: डॉ बैरम खान उन छात्रों के लिए भी प्रेरणा हैं जो किसी कारण ड्रॉप ईयर लेते हैं, या बीच में कोर्स बंद कर कुछ अच्छा करने के लिए कंफ्यूज रहते हैं. डॉ बैरम खान बताते हैं कि वह जामिया में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे तब उसी दौरान 2006 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में जाना हुआ. वहां मैंने पहली बार भाषा विज्ञान संकाय का नाम सुना था. कुछ जानने वाले उसी संकाय में पढ़ रहे थे, मुझे भी क्लास ज्वाइन करने का अवसर मिला.
भाषा विज्ञान में बढ़ी रूचि: बैरम के मुताबिक उस क्लास के बाद मुझे भाषा विज्ञान में पढ़ने की रुचि अचानक बढ़ गई, तब यह स्थिति थी कि मैं जामिया में अपने स्नातक की पढ़ाई को छोड़ता तो मेरे दो वर्ष यूं ही बर्बाद होते. घर की स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि मैं कोई जल्द बाजी में निर्णय लेता, काफी असमंजस की स्थिति थी.
पिता ने दिया हौसला: बैरम के मुताबिक उस असमंजस की स्थिति में फिर मैंने अपने पिता से इस संबंध में बात की. उन्होंने मुझे हौसला दिया और मेरे फैसले का स्वागत किया. इसके बाद मैं जामिया मिलिया की पढ़ाई बीच में छोड़कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान में नामांकन कराया यहीं से मेरा टर्निंग पॉइंट शुरू हुआ.
पीएचडी तक की पढ़ाई की: डॉक्टर बैरम खान ने अलीगढ़ से स्नातक के बाद मास्टर इन लिंग्विस्टिक्स अलीगढ़ विश्वविद्यालय से ही किया. लेकिन इस दौरान भी आर्थिक तंगी ने पीछा नहीं छोड़ा. वह कहते हैं की क्लास 6 की पढ़ाई के समय से ही जो कमाने के दौड़ में लगा वो सिलसिला पूरी उच्च शिक्षा तक लग रहा ताकि परिवार को संभाल सकूं. उन्होंने आगे बताया कि इसी संघर्ष के साथ ही नेट पास किया और फिर पीएचडी की.

2015 में गए अमेरिका: पहली नौकरी मास्टर इन लिंग्विस्टिक्स के बाद ही सऊदी अरब की एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के लिए मिल चुकी थी लेकिन मैंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए उसको जॉइन नहीं किया. हालांकि फिर 2015 में मुझे अमरीका के विश्वविद्यालय से ऑफर मिला तो मैंने वहां जाकर असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर ज्वाइन कर लिया. वहां मैने एशियाई भाषा और संस्कृत विषय पढ़ाना शुरू किया.
दो बार बेस्ट टीचर का अवॉर्ड: बैरम खान ने दो बार नेट क्वालीफाई किया है. वे बताते हैं कि पहली बार उन्होंने 2013 में लिंग्विस्टिक्स में नेट क्वालीफाई किया था जबकि 2025 में उन्होंने इंग्लिश में नेट क्वालीफाई किया है. उन्होंने 3 बार एमए किया है, पहली बार लिंग्विस्टिक्स में, फिर इंग्लिश में और तीसरी बार उन्होंने दुनिया की बड़ी यूनिवर्सिटी में एक अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से एजुकेशनल स्टडी में एमए किया है.
सम्मान से बढ़ती है जिम्मेदारी: मिशिगन यूनिवर्सिटी से एमए करने के साथ ही वे वहां वो गेस्ट फैकल्टी के रूप में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर बहाल रहे हैं. इस दौरान बैरम खान को दो बार 2019 और 2021 में बेस्ट टीचर अवार्ड से भी अमेरिका में सम्मानित किया जा चुका है. बैरम कहते हैं कि जब आपको इस तरह का कोई सम्मान मिलता है तो फिर आपकी जिम्मेदारियां और बढ़ा जाती हैं.
परिवार ने भी किया संघर्ष: ऐसा नहीं है कि सिर्फ डॉ बैरम खान ने ही सत्तू खाकर या भूखे रहकर वक्त गुजारा. उनके माता-पिता भी काफी संघर्ष और कठिनाइयों से गुजरे हैं. पिता शौकत हयात खान का देहांत हो चुका है. मां इशरत खानम कहती हैं, जब बेटा बाहर रहकर संघर्ष कर रहा था तो मैं कैसे अच्छे से रहती? कैसे अच्छा खाना खाती ? बेटे के आने का इंतजार रहता था. जब वह दिल्ली से या अलीगढ़ से आता उस समय घर में अच्छा खाना बनता था, ताकि सभी लोग एक साथ खाएं, मेरे बेटे ने जितना संघर्ष किया है शायद के इस क्षेत्र के किसी युवा ने किया हो.
"गांव के कुछ परिवार के लोग ताना मारते थे कि गरीब हो चुके हो ऐसे में बेटा क्या ही कर लेगा? एक दिन तो मजदूरी ही करनी होगी, आज वही लोग न सिर्फ इनकी तारीफ करते हैं बल्कि अपने बच्चों को बैरम से पढ़वाने के लिए मुझ से पैरवी कराते हैं, मुझे वह पुरानी बातें याद आती है लेकिन लेकिन फिर मुझे गर्व महसूस होता है कि मेरे बेटे ने वो मुकाम पाया है कि आज ताने मारने वाले उसके सामने झुक रहे हैं." - इशरत खानम, बैरम खान की मां
ताने का जवाब सफलता से दें: डॉ बैरम खान उन छात्रों का हौसला बढ़ाते हैं जो गरीबी या अन्य कारणों से रिश्तेदारों और समाज के लोगों का ताना सुनते हैं. बैरम कहते हैं कि इस की तरह की बातों से कभी मायूस नहीं हों, उन्हें पलट कर जवाब नहीं दें, समय का इंतजार करें बल्कि इसको अपनी सफलता के लिए हथियार बनाएं. खुद को इतना सशक्त करें कि एक दिन आपकी सफलता शोर मचाए. ताने देने वाले आपके पास खुद ही आएं और झुकी हुई नजरों से अपना काम कराने के लिए आग्रह करें, विनम्रता ही आपकी सब से बड़ी पूंजी है.

खुद को सशक्त बनाना: डॉ बैरम खान इमामगंज विधानसभा ही नहीं बल्कि शेरघाटी अनुमंडल के पहले ऐसे युवा हैं जो अमेरिका में प्रोफेसर के पद पर रहकर भारतीय संस्कृति और भाषण पढ़ा रहे हैं. वह कहते हैं कि गरीबी सफलता के लिए बाधा नहीं है, हां यह जरूर है कि आम छात्रों की तुलना में कठिनाई अधिक होगी. आपको भूखे प्यासे रहना पड़ सकता है. लेकिन उन परेशानियों का सामना करना है खुद को सशक्त बनाना है.
स्कूल से ही बनाया जाए जिम्मेदार: डॉ बैरम खान कहते हैं कि अपने देश में टैलेंट और ज्ञान की कमी नहीं है, बस डिस्प्लिन और जिम्मेदारी की कमी है, अमरीका में मैने देखा है कि स्कूल से बच्चों को पढ़ाया जाता है कि वो कैसे जिम्मेदार नागरिक बनें. मॉडल एजुकेशन भी जरूरी है, अगर बच्चा छोटे से समझेगा कि उसे गाड़ी चलाते हुए ट्रैफिक नियमों का पालन करना है, बिना जरूरत के हॉर्न सड़कों पर नहीं बजाना चाहिए तो वो बड़ा हो कर जब गाड़ी चलाएगा तो ऐसा नहीं करेगा.
देश की सेवा में करें मदद: बैरम खान कहते हैं कि देश सेवा में एक बड़ा कार्य यह भी है कि हम जैसे व्यक्ति जो जिस क्षेत्र में हो वो अपने क्षेत्र के छात्रों की मदद करें. उनके भविष्य को संभालें, उन्हें मार्गदर्शन दें कि उन्हें क्या करना चाहिए. यहां के छात्रों में वो क्षमता है कि वह अमरीका और बड़े देशों के छात्रों को पछाड़ सकते हैं सिर्फ उन्हें मदद की आवश्यकता है. सरकार और प्रशासन और शिक्षा प्रबंधन के भरोसे ही सब कुछ निर्भर नहीं होना चाहिए बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी हमें एक दूसरे की सहायता करनी चहिए.
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