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20 बीघा जमीन पर बसाया जंगल... हजारों चमगादड़ों का सुरक्षित ठिकाना बना असम का यह गांव

धेमाजी जिले के जोनाई कस्बे के निवासी बोलेन पेगु और उनका परिवार पिछले कई दशकों से चमगादड़ों और पर्यावरण के संरक्षण में जुटा है.

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35 वर्षों का समर्पण: बोलेन पेगु ने विरासत में मिले जंगल को बनाया हजारों चमगादड़ों का घर" (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : January 8, 2026 at 5:37 PM IST

5 Min Read
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जोनाई (असम): आज जब असम सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में जंगल तेजी से घट रहे हैं, अवैध कटाई और मानव अतिक्रमण के कारण वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में है, ऐसे समय में जोनाई के अमृतपुर गांव से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है. यहां एक परिवार ने न केवल जंगल को बचाया, बल्कि हजारों चमगादड़ों को अपने घर के आसपास सुरक्षित आश्रय देकर यह साबित कर दिया कि इंसान और प्रकृति का सह-अस्तित्व संभव है.

अमृतपुर का बांस का जंगल बना ‘बैट किंगडम’
जोनाई के अमृतपुर गांव में लगभग 20 बीघा भूमि पर फैला घना बांस का जंगल आज हजारों चमगादड़ों का घर है. इस जंगल को पिछले 30–35 वर्षों से पेगू परिवार ने संरक्षित कर रखा है. लाखीकांत पेगू, नारायण पेगू, बोलेन पेगू और उनके चार अन्य भाई मिलकर इस जंगल की देखभाल करते हैं. खास बात यह है कि यह जंगल उनके घर से अलग नहीं, बल्कि उनके जीवन का ही हिस्सा है. उनका घर पेड़ों, पक्षियों और चमगादड़ों से घिरा हुआ है.

चमगादड़ों का सुरक्षित ठिकाना बना असम का यह गांव (Etv Bharat)

पिता की दूरदर्शिता से शुरू हुई संरक्षण की कहानी
नारायण पेगू बताते हैं कि इस संरक्षण की नींव उनके पिता ने रखी थी. हमारे पिता के पास हाथी थे और हाथियों के लिए जंगल जरूरी होता है. इसलिए उन्होंने इस जमीन को कभी साफ नहीं किया. जब आसपास के जंगल खत्म होने लगे, तो चमगादड़ यहां आने लगे और धीरे-धीरे यह जगह उनका स्थायी घर बन गई.

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पेगू परिवार खेती और बागवानी के जरिए अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करता है. (ETV Bharat)

शिकार के प्रयासों के खिलाफ डटकर खड़ा रहा परिवार
इस जंगल को बचाने की राह आसान नहीं थी. कई बार स्थानीय युवकों ने गुलेल से चमगादड़ों का शिकार करने की कोशिश की. ऐसे हर मौके पर पेगू परिवार ने सख्ती से हस्तक्षेप किया. नारायण कहते हैं, हमने साफ कर दिया कि इस जंगल में किसी भी जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. तभी यह बैट किंगडम सुरक्षित रह सका.

पीढ़ियों से जुड़ा रिश्ता, आज भी कायम
भले ही सातों भाई अलग-अलग पेशों में हों और काम के कारण अलग-अलग जगह रहते हों, लेकिन अपने पैतृक गांव और जंगल से उनका रिश्ता अटूट है. जब भी वे घर लौटते हैं, जंगल की देखभाल और खेती-बाड़ी में हाथ बंटाते हैं. वे पेड़ काटते नहीं, बल्कि नए पेड़ लगाते हैं. यही वजह है कि आज उनकी जमीन एक समृद्ध हरित क्षेत्र में बदल चुकी है.

मछली पालन के लिए बनाया तालाब
तालाबों में मछली पालन से परिवार को सालाना 4–5 लाख रुपये की आमदनी होती है. (ETV Bharat)

खेती, जंगल और जैव विविधता का अनोखा संगम
पेगू परिवार की जमीन पर बांस के झुरमुटों के साथ-साथ सुपारी के बागान, सुपारी के नीचे संतरे के पेड़, नींबू, नारियल, सब्जियों की खेती, मछली के तालाब और पशुपालन भी किया जाता है. बोलेन पेगू बताते हैं कि जैसे-जैसे जंगल बढ़ा, वैसे-वैसे चमगादड़ों की संख्या भी बढ़ती गई. बचपन में कुछ ही चमगादड़ थे, आज हजारों हैं.

हर सुबह-शाम प्रकृति का अनोखा नजारा
हर शाम सूर्यास्त के समय चमगादड़ों के विशाल झुंड भोजन की तलाश में उड़ान भरते हैं और सुबह होते ही वापस लौट आते हैं. सुबह के समय पूरा इलाका पक्षियों और चमगादड़ों की आवाजों से गूंज उठता है, जो एक शांत और अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है.

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पेगु परिवार की मेहनत से चमगादड़ों और पक्षियों का यह आश्रय आज एक जीवंत सेंक्चुरी बन गया है. (ETV Bharat)

सिर्फ चमगादड़ नहीं, कई प्रजातियों का घर
यह जंगल केवल चमगादड़ों का आश्रय नहीं है. यहां हाथी सेब, हरितकी, चंपा, दुबंगा और विशाल बांस प्रजातियों के पेड़ पाए जाते हैं. साथ ही बगुले, हॉर्नबिल, उल्लू, बंदर, गिद्ध, मैना, कठफोड़वा सहित कई पक्षी और वन्यजीव भी यहां देखे जाते हैं. जोनाई और पासीघाट के स्कूलों के छात्र और प्रकृति प्रेमी इस जंगल को देखने अक्सर आते हैं.

सुरक्षा के लिए सरकार से सहयोग की मांग
खुले जंगल की सुरक्षा आसान नहीं है. पेगू परिवार का कहना है कि बाहरी लोगों द्वारा पेड़ काटने या चमगादड़ों को नुकसान पहुंचाने का खतरा बना रहता है. उन्होंने सरकार से बाड़बंदी और बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग की है.

जोनाई का यह अनोखा जंगल तीन दशकों से प्रकृति और जीव-जंतुओं की सुरक्षा का प्रतीक है.
तालाब में मछली पकड़ता बगुला. (ETV Bharat)

संरक्षण के साथ मजबूत आजीविका
यह उदाहरण यह भी साबित करता है कि संरक्षण और आजीविका साथ-साथ चल सकते हैं. परिवार को नारियल से सालाना लगभग 60 हजार रुपये, सुपारी से 2–3 लाख रुपये, पान और मछली पालन से 4–5 लाख रुपये की आय होती है. इसके अलावा सब्जी, संतरा और पशुपालन से भी आमदनी होती है.

समाज के लिए प्रेरणा बना पेगू परिवार
पेगू परिवार का मानना है, जैसे इंसान को घर चाहिए, वैसे ही पक्षियों और जानवरों को भी. अगर पेड़ रहेंगे, तभी इंसान बचेगा. अमृतपुर का यह बांस का जंगल आज पूरे समाज के लिए एक संदेश है कि थोड़ी सी संवेदनशीलता और संकल्प से प्रकृति को बचाया जा सकता है. बिना किसी पुरस्कार या पहचान की चाह के, यह परिवार दशकों से संरक्षण की मिसाल बना हुआ है.

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जंगल के बीच सुपारी और नारियल की खेती कर आजीविका और संरक्षण का संतुलन बनाए रखा गया है. (ETV Bharat)

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