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गाजियाबाद में बढ़ी हुई दरों पर प्रॉपर्टी टैक्स की वसूली का रास्ता साफ़, HC ने जनहित याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टैक्स बढ़ोतरी के खिलाफ दायर जनहित याचिका को खारिज किया और नगर आयुक्त के फैसले को वैध करार दिया.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश. (Photo Credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 25, 2026 at 9:59 PM IST

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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय गाजियाबाद नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी कानूनी जीत है. मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने प्रॉपर्टी टैक्स की नई दरों के खिलाफ दायर जनहित याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. कोर्ट के इस फैसले से 1 अप्रैल 2025 से लागू हुई बढ़ी हुई दरों पर टैक्स वसूली का रास्ता साफ हो गया है. यह याचिका वर्तमान पार्षद राजेंद्र त्यागी और अन्य पूर्व पार्षदों द्वारा नगर निगम के वर्गीकरण और किराया दरों में वृद्धि के खिलाफ दायर की गई थी.

नगर आयुक्त के वैधानिक अधिकार और वर्गीकरण: हाईकोर्ट ने अपने 77 पन्नों के विस्तृत फैसले में उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 174 का हवाला दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नगर आयुक्त को संपत्तियों का वार्षिक मूल्य और किराया दरें निर्धारित करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है. शहर को सड़कों की चौड़ाई और विकास के आधार पर तीन श्रेणियों (A, B और C) में बांटना पूरी तरह तर्कसंगत और पारदर्शी माना गया है. अदालत ने यह भी पाया कि नई दरें लागू करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए जनता से आपत्तियां मांगी गई थीं.

आपत्तियों का निस्तारण और पारदर्शिता की पुष्टि: मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नगर निगम ने प्राप्त हुई लगभग 318 आपत्तियों का निस्तारण करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया था. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि यह मामला जनहित के बजाय "राजनीतिक हिसाब बराबर करने" के उद्देश्य से प्रेरित प्रतीत होता है. न्यायपीठ ने माना कि प्रशासन ने जनता के हितों और निगम के राजस्व के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है. इसलिए, प्रक्रियात्मक आधार पर इस टैक्स वृद्धि को अवैध नहीं ठहराया जा सकता.

राज्य सरकार का हस्तक्षेप और अंतिम निर्णय: जब नगर निगम बोर्ड और प्रशासन के बीच टैक्स वृद्धि को लेकर गतिरोध पैदा हुआ, तब राज्य सरकार ने धारा 116 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था. हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा नगर आयुक्त को दिए गए निर्देशों और इस हस्तक्षेप को पूरी तरह से कानूनी और उचित ठहराया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सेवाओं के बेहतर संचालन के लिए राजस्व जुटाना अनिवार्य है और इसमें दी गई छूट को खत्म करना निगम का नीतिगत निर्णय है. इस फैसले ने नगर निकायों को अपने वित्तीय संसाधन मजबूत करने के लिए एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान किया है.

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