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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म 'गायता पखना': अबूझमाड़ में 20 साल बाद गूंजी दुर्लभ 'पेन पाटा'

आत्माओं की शांति के लिए रस्म निभाने की खास परंपरा है. इस परंपरा को पत्थर गड़ई के नाम से भी जाना जाता है.

UNIQUE RITUAL OF SALVATION
बिछड़े हुए अपनों का महाकुंभ (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : February 25, 2026 at 5:18 PM IST

10 Min Read
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आकाश सिंह ठाकुर की रिपोर्ट

नारायणपुर: बस्तर की धरती जहां अपनी गोद में सुंदरता को समेटे है, वहीं बस्तर अपनी प्राचीन और मजबूत आदिवासी परंपरा और संस्कृति से समृद्ध भी है. खासकर अबूझमाड़ में निभाई जाने वाली कई ऐसी परंपराएं और रस्में हैं, जो विज्ञान को भी एक बार सोचने पर मजबूर कर देती है.

ग्राम केरलापाल में उसेंडी आदिवासी समुदाय द्वारा एक ऐसी ही दुर्लभ और भव्य परंपरा का निर्वहन किया गया, जिसे 'गायता पखना' कहा जाता है. लगभग 2 दशकों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित इस 4 दिवसीय कार्यक्रम में उसेंडी कुटुंब के सदस्य अलग-अलग 7 शाखाओं (खांदा) में जमा हुए. यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि मर चुके पूर्वजों की आत्माओं को शांति दिलाने, उन्हें 'शिला रूप' में स्थापित करने का एक पवित्र मार्ग यहां के लोग मानते हैं.

अबूझमाड़ की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat Chhattisgarh)

जानिए क्या है 'गायता पखना' रस्म

दरअसल 'गायता पखना'गोंडी भाषा का शब्द है. जिसका अर्थ है शिला स्थापना. मृत आत्माओं की शांति और उनके मोक्ष की प्राप्ति के लिए ग्रामीण एक खास जगह पर पत्थर गाड़ते हैं. आदिवासी समाज खासकर उसेंडी परिवार में ये मान्यता है कि शिला की स्थापना किए जाने से मृत आत्माओं को शांति मिलती है. उनकी आत्माओं को मोक्ष की अनंत यात्रा पर भेजना का एक माध्यम या रस्म गायता पखना है.

UNIQUE RITUAL OF SALVATION
बिछड़े हुए अपनों का महाकुंभ (ETV Bharat Chhattisgarh)
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गायता पखना आदिवासियों की अनोखी परंपरा (ETV Bharat Chhattisgarh)
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परंपरा, प्रकृति और पूर्वजों का त्रिवेणी संगम (ETV Bharat Chhattisgarh)



परंपरा, प्रकृति और पूर्वजों का त्रिवेणी संगम

हाल ही में यहां उसेंडी आदिवासी कुटुंब की ओर से ''गायता पखना" का दुर्लभ और अत्यंत प्राचीन रस्म धार्मिक अनुष्ठान के जरिए निभाया गया. स्थानीय लोगों ने बताया कि यह आयोजन केवल एक सामाजिक मिलाप नहीं, बल्कि आदिवासियों की उस अटूट आस्था का प्रतीक है, जो मृत्यु के बाद भी अपने परिजनों से रिश्ता बनाए रखने में विश्वास जगाता है. लगभग 2 दशकों के लंबे अंतराल के बाद जब यह आयोजन हुआ, तो ऐसा लगा मानों पूरा अबूझमाड़ अपनी अपनी मजबूत सांस्कृति धरोहर को संजोने के लिए एक छत के नीचे खड़ा है.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)

पहला चरण: बिछड़े हुए अपनों का महाकुंभ

सामाजिक एकजुटता और 'हंसीं नता' का आगमन: आदिवासी समाज में कुटुंब की सोच बड़ी व्यापक है. 22 फरवरी से केरलापाल की फिजाएं ढोल की थाप और पारंपरिक गीतों से महकने लगी हैं. उसेंडी कुटुंब की 7 अलग-अलग शाखाओं (खांदा) के सदस्य, जो आजीविका या अन्य कारणों से दूसरे जिलों या प्रदेशों में जा बसे थे, सामाजिक संदेश मिलते ही अपने मूल ग्राम की ओर लौट आए.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)


कुटुंब और रिश्तों का जाल

इस आयोजन में केवल उसेंडी परिवार ही नहीं, बल्कि उनके 'हंसीं नता' समधी (नानी-मामा बिरादरी) के सदस्य भी विशेष रूप से आमंत्रित हुए. आदिवासी संस्कृति में नानी और मामा पक्ष को अत्यंत सम्मानजनक और आदर भाव से देखा जाता है.


रात्रि का उल्लास

सालों बाद जब परिजन मिलते हैं, तो उनकी आंखें नम और दिल खुश होते हैं. गांव के सामाजिक भवन के सामने ठहरने की विशेष व्यवस्था की गई. आयोजन के दौरान रात भर अलाव के चारों ओर टोलियां बनाकर लोग अपनों की कुशलता पूछते रहे.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)


मृत आत्माओं के लिए गाते हैं गीत

आयोजन के दौरान 'पाटंगपारे' और 'पेन पाटा' का अलौकिक प्रभाव का असर लोगों पर दिखाई पड़ता है. समुदाय से जुड़े लोग बताते हैं कि प्रथम दिन की रात्रि बेला में एक नई ऊर्जा का संचार होता है. जब महिलाएं और बुजुर्ग पुरुष 'पाटंगपारे' (मृतकों के गीत) और 'पेन पाटा' (देव गीत) का ऊंचे स्वर में गाते हैं.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)


मंत्रोच्चार जैसी शक्ति

यहां के आदिवासियों के बीच यह मान्यता है कि ये गीत केवल शब्द नहीं, बल्कि 'विशेष मंत्र' हैं. इन गीतों में मृत पूर्वजों के नाम और उनकी स्मृतियों को लयबद्ध किया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इन गीतों के गाने से मृतकों की आत्माएं वातावरण में साक्षात उपस्थित हो जाती हैं.

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दशकों से चली आ रही परंपरा (ETV Bharat)
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रस्म निभाने की तैयारी (ETV Bharat)


मिट्टी और बांस का विधान

समुदाय के मुताबिक प्रत्येक मृत परिजन की स्मृति में एक कलश स्थापित किया जाता है. एक बांस की टोकनी के भीतर मिट्टी के छोटे घड़े के ऊपर तेल का दीया जलाया जाता है. टोकनी में धान, हल्दी, चावल और फूल जैसे पूजा के मांगलिक सामान रख दिए जाते हैं, जो आगामी पूजन का आधार बनता है. इस अनुष्ठान में पूरी रात आदिवासी अपने पारंपरिक गीतों की धुन पर थिरकते हैं.

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कलश की होती है स्थापना (ETV Bharat)
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दूर दूर से आते लोग (ETV Bharat)


दूसरा चरण: सिरहा पुजारी का मार्गदर्शन और गांव से विदाई

दूसरे दिन की सुबह गांव के सिरहा (मुख्य देव पुजारी) के नेतृत्व में सभी सदस्य कलश को सिर पर रखकर गांव की सीमा की ओर बढ़ जाते हैं. गांव से बाहर एक विशेष स्थल पर साजा पेड़ों की टहनियां गाड़कर कलशों की पूजा की जाती है. (साझा पेड़ से देव आंगा का निर्माण होने के कारण इसे आदिवासी पवित्र वृक्ष मानते हैं) यह अनुष्ठान इस बात का प्रतीक है कि अब मृत आत्माएं गांव की सांसारिक सीमाओं को छोड़कर अपने शाश्वत विश्राम स्थल की ओर बढ़ रही हैं.

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पूजा से पहले की तैयारी (ETV Bharat)
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गांव के बुजुर्ग करते हैं युवाओं का मार्गदर्शन (ETV Bharat)

इसके बाद ग्राम पुजारी आगे चलकर सभी को गायता पखना स्थल तक ले जाते हैं, जहां पूर्व में हुए आयोजन के साक्ष्य के तौर बड़े छोटे शिलाखंड गड़े हुए हैं. ये शिलाखंड यह बतलाते हैं कि इस परंपरा का निर्वाहन आदिवासी समाज सदियों से करते आ रहे हैं. इस दौरान दीप कलश को गायता पखना स्थल में पूर्वजों के शिलाओं के पास रखा जाता है, विशेष पूजा अर्चना की जाती है.

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पेन पाटा (ETV Bharat)
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गांव के ग्रामीण जुटे केरलापाल में (ETV Bharat)


तीसरा चरण: पर्वत से पत्थरों का 'चयन' और रहस्यमयी पहचान


आत्माओं द्वारा अपनी शिला की पहचान

यह चरण इस पूरी परंपरा का सबसे अदभुत हिस्सा होता है. परिवार के पुरुष और मामा, समधी पक्ष के सदस्य पुजारी के साथ पास की पहाड़ी पर जाते हैं. पुजारी के द्वारा बताए गए विधि से वहां पर पूजा पाठ करते हैं.

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सिर पर टोकरी लेकर पहुंचते ग्रामीण (ETV Bharat)
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उत्सव सा होता है माहौल (ETV Bharat)


शिलाओं का चयन

मान्यता है कि वहां पहाड़ी पर पुजारी पर मृत आत्माओं का आवेश होता है, और वे बारी-बारी से मृतकों की शिलाओं का चयन करते हैं, जो जमीन में गड़े होते हैं. इन पत्थरों को निकालकर सफेद कपड़ों से ढका दिया जाता है.

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गीत गाते आती हैं महिलाएं (ETV Bharat)
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पत्थर गड़ई की तैयारी (ETV Bharat)


आयु के अनुसार आकार

पत्थर का वजन और आकार मृतक की आयु के अनुसार तय होता है. बुजुर्गों के लिए भारी (15 किलो तक), युवाओं के लिए मध्यम और बच्चों के लिए छोटे पत्थर चुने जाते हैं. इन पत्थरों को अत्यंत सम्मान के साथ कंधे पर उठाकर वापस 'गायता पखना' स्थल लाया जाता है.

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पुजारी का इंतजार (ETV Bharat)
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गायता पखना रस्म की तैयारी (ETV Bharat)


शिला पूजन और तर्पण

पत्थरों को जमीन में गाड़ने से पहले गड्ढे में सिक्के और लोहे की अंगूठी डाली जाती है. स्थापना के बाद इन पत्थरों पर हल्दी तेल चावल का लेप लगाया जाता है. पत्थरों पर महुआ के रस का तर्पण किया जाता है. महुआ को आदिवासी संस्कृति में देवताओं का पेय और परम शुद्ध माना गया है. पत्थरों के गाड़े जाने के बाद आदिवासी मानते हैं कि अब इन पवित्र आत्माओं का सफर प्रकृति एवं ईश्वर की तरफ होगा और गाड़े गए सभी शिलाखंड इस मृत्युलोक में उनका घर है.

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नारायणपुर (ETV Bharat)
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नारायणपुर (ETV Bharat)


चौथा चरण: 'मजाकिया बाजार' और जनजातीय समरसता


मुद्रा विहीन व्यापार का अनूठा उदाहरण

तीसरे दिन की सुबह केरलापाल के खेल मैदान में एक ऐसा दृश्य दिखाई देता है, जो आधुनिक अर्थशास्त्र को भी चकित कर देता है. यहां एक विशेष 'मड़ाई' या बाजार सजाया जाता है.

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नारायणपुर (ETV Bharat)


खपरैल और पत्तों की मुद्रा

इस बाजार में सामानों की सांकेतिक बिक्री होती है. यहां लेन-देन के लिए भारतीय मुद्रा नहीं, बल्कि मिट्टी के बर्तनों के टूटे हुए टुकड़ों (खपरैल) और पत्तों को 'सिक्के' मानकर लिए और दिए जाते हैं. वहीं बाजार में बेची जाने वाली सामग्रियों में घर बने चीला रोटी, अलग-अलग तरह की साग भाजी, लाई और गुड जैसे सामान होते हैं.


हंसी-ठिठोली का माहौल

इस बाजार का आयोजन भी मामा-नानी पक्ष द्वारा किया जाता है. यह पूरे वातावरण को तनावमुक्त और खुशनुमा बनाने की एक सामाजिक पद्धति है. इसके बाद सामूहिक भोज और सामूहिक नृत्य का आयोजन होता है, जो सामाजिक समरसता का एक बड़ा उदाहरण है.


पांचवां चरण: पत्थरों का 'बढ़ना' और अंतिम अवलोकन


अध्यात्म और विज्ञान का द्वंद्व

अंतिम दिन, सभी सदस्य पुनः स्थापना स्थल पर जाते हैं. यहां गाड़े गए पत्थरों की स्थिति देखी और परखी जाती है. यदि कोई पत्थर गिरा मिलता है, तो उसे अशुभ माना जाता है और पुजारी उसके मृत्यु के कारणों की पुनः समीक्षा करते हैं.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)


बढ़ते पत्थरों का रहस्य

'गायता पखना' स्थल पर सैकड़ों वर्ष पुराने पत्थर मौजूद हैं. स्थानीय निवासियों का दावा है कि ये पत्थर समय के साथ आकार में बढ़ते हैं. कई पत्थर आज 10 फीट तक ऊंचे और कई टन भारी हो चुके हैं. वे कहते हैं कि "ये पत्थर अपनी सत्यता और आत्मा की शक्ति से बढ़ते हैं."

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)
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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)


दुर्घटना और आत्महत्या का निषेध

इस पावन स्थल पर उन लोगों के पत्थर नहीं गाड़े जाते जिनकी मृत्यु दुर्घटना या आत्महत्या से हुई हो. उनके लिए अलग समय और स्थान निर्धारित होता है, क्योंकि उनकी आत्माओं को 'भटकती हुई आत्मा' माना जाता है.

आयोजन के समापन अवसर पर चौथे दिन की संध्या बेला में विशाल भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं. जिसके बाद विदाई समारोह आयोजित होती है, जिसमें दूर-दराज से आए सदस्य विदा लेते हैं और आगामी 20 वर्षों के लिए मीठी यादें अपने साथ लेकर जाते हैं.

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पूर्वजों को मोक्ष दिलाने की अनूठी रस्म गायता पखना (ETV Bharat)

प्रकृति और संस्कृति के रक्षक माने जाते हैं आदिवासी

नारायणपुर का यह 'गायता पखना' आयोजन यह सिखाता है कि विकास की दौड़ में भले ही दुनिया आगे निकल रही है, लेकिन जड़ों से जुड़ाव ही असली शांति दिलाता है. यह पत्थरों की पूजा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति वह कृतज्ञता है जो पीढ़ियों से चली आ रही है. विज्ञान के पास भले ही इन पत्थरों के बढ़ने का जवाब न हो, लेकिन आदिवासियों के पास अपनी 'सत्यता' और 'संस्कृति' का ठोस प्रमाण जरूर मौजूद है. जरूरत है आज इस समृद्ध पंरपरा और संस्कृति को संजोकर रखने की, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी इससे वाकिफ हो.

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