बिहार चुनाव में AAP को मिले NOTA से भी कम वोट, क्यों फेल हुए अरविंद केजरीवाल?
बिहार चुनाव में नीतीश-मोदी की जोड़ी के आगे तेजस्वी यादव ही नहीं, अरविंद केजरीवाल भी फ्लॉप साबित हुए. नोटा से भी कम वोट मिला है.

Published : November 16, 2025 at 8:48 PM IST
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा किया कि महागठबंधन टिक नहीं पाया. जो नेता तीसरे मोर्चे की तैयारी में लगे थे, वह भी पूरी तरीके से धराशाई हो गए. एक तरफ जहां प्रशांत किशोर के 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई, वहीं अरविंद केजरीवाल की पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले.नतीजों ने साफ कर दिया कि मुकाबला सीधे तौर पर एनडीए बनाम महागठबंधन ही रहा. तीसरे मोर्चे के सभी प्रयास बिखर गए.
चुनावी सफर शुरू होने से पहले ही खत्म: आम आदमी पार्टी ने बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने के प्रयास में 99 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. इनमें से 83 उम्मीदवार ही मैदान में डटे रहे लेकिन पार्टी का प्रदर्शन उम्मीदों से भी कहीं नीचे रहा. शुरुआती चरण से ही साफ हो गया था कि पार्टी चुनावी लड़ाई में संघर्ष कर रही है. नतीजों ने यह साबित कर दिया कि 'झाड़ू' इस बार हवा में नहीं चल सकी. लगभग सभी सीट पर पार्टी कैंडिडेट से अधिक निर्दलीय और नोटा के वोट रहे.

आप को मिला नोटा से भी कम वोट: चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार आम आदमी पार्टी को बिहार में कुल 0.30% वोट शेयर मिला. जो नोटा से भी काफी कम है. आम आदमी पार्टी को 150913 वोट मिले, जबकि जबकि नोटा को 1.81% यानी 910730 वोट मिले. लगभग सभी सीटों पर आप उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. पार्टी जिस उपस्थिति को मजबूत करने की कोशिश में थी, वह बिल्कुल भी मजबूती नहीं जुटा पाई. दिल्ली और पंजाब की लोकप्रियता बिहार में पार्टी के लिए वोटों में तब्दील नहीं हो सकी.
बिना बड़े चेहरों के चुनाव में उतरी थी आप: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान बिहार प्रचार में नहीं आए. इस कारण भी पार्टी कोई लहर नहीं बना सकी. पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने जरूर बिहार में काफी समय बिताया और कई जगह रोड शो किए, लेकिन नतीजे उम्मीद के बिल्कुल उलट रहे. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बड़े नेताओं की अनुपस्थिति और संगठनात्मक कमजोरी ने पार्टी को बेहद नुकसान पहुंचाया.
83 प्रत्याशी अंत तक डटे रहे: आम आदमी पार्टी के वरीय प्रदेश उपाध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि 99 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए गए थे लेकिन अंत में 83 उम्मीदवार ही मैदान में टिक सके. उन्होंने माना कि चुनाव पूरी तरह एनडीए बनाम महागठबंधन हो गया था और तीसरी ताकत के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची. मनोज कुमार ने दावा किया कि उनके उम्मीदवारों ने काफी मेहनत की और दिल्ली मॉडल की चर्चा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की. हालांकि वह यह भी मानते हैं कि पार्टी के पास ऐसी मजबूत सीटें नहीं थीं, जहां केजरीवाल जैसे बड़े नेता को बुलाया जाए.

"इस चुनाव में हम लोगों ने बहुत कुछ सीखा है. बिहार में अब आम आदमी पार्टी एक्टिव हो चुकी है और आने वाले चुनावों के लिए तैयारियों को मजबूत किया जाएगा. इस चुनाव के जरिए आम आदमी पार्टी ने अपना अस्तित्व दर्ज कराने की कोशिश की है और धीरे-धीरे संगठन विस्तार के जरिए स्थिति में सुधार होगा."- मनोज कुमार, प्रदेश उपाध्यक्ष, आम आदमी पार्टी
क्या कहते हैं जानकार?: वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं कि आम आदमी पार्टी इस चुनाव में जीतने के लिए उतरी ही नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए बिहार में मैदान में थी. उन्होंने कहा कि पार्टी ने कभी गंभीरता दिखाई ही नहीं. न तो संगठन की गतिविधियां दिखीं, न उम्मीदवारों की चुनावी पकड़. कई सीटों पर उनके उम्मीदवारों से अधिक वोट नोटा और निर्दलीयों को मिले.
प्रचार की कमी और नेतृत्व की अनुपस्थिति: प्रवीण बागी का कहना है कि अगर अरविंद केजरीवाल या पंजाब के सीएम भगवंत मान बिहार आते तो कम-से-कम यह संदेश जाता कि पार्टी चुनाव में सक्रिय है लेकिन बिहार में ना तो उनका संगठन दिखाई दिया और ना उनके उम्मीदवार जनता के बीच प्रभावी तरीके से उतरे. चुनाव के दौरान पार्टी की गतिविधियों की न तो खबरें आईं और न ही कोई बड़ा मुद्दा उठाया गया.

"चुनाव परिणाम यह साफ दर्शाते हैं कि बिहार की जनता ने आम आदमी पार्टी को पूरी तरह खारिज कर दिया है. 0.30% वोट शेयर के साथ पार्टी राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बनाने में नाकाम साबित हुई. आप को उम्मीद थी कि दिल्ली मॉडल और पंजाब की सफलता बिहार में काम आएगी, लेकिन मतदाताओं ने इसे सिरे से इनकार दिया."- प्रवीण बागी, वरिष्ठ पत्रकार
क्या बिहार में आप का भविष्य है?: इस सवाल पर प्रवीण बागी का कहना है कि बिहार चुनाव 2025 ने आम आदमी पार्टी को यह एहसास कराया कि राष्ट्रीय राजनीति और क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा अंतर है. संगठनात्मक ढांचा, मजबूत लोकल नेतृत्व और जनता से जुड़ी रणनीति के बिना किसी भी बाहरी दल के लिए बिहार जैसे बड़े राज्य में पैर जमाना आसान नहीं है. वे कहते हैं कि पार्टी को यदि बिहार में जगह बनानी है तो उसे अब अगला लक्ष्य संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर अपनी उपस्थिति बनाने की रखनी होगी.
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