हिमाचल-पंजाब के वैज्ञानिकों ने खोजी चींटियों की 3 नई प्रजातियां, 'एंट मैन ऑफ इंडिया' की टीम का कमाल
हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला और पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के मिरमेकोलॉजिस्ट ने रॉक ऐंट्स’ की तीन नई प्रजातियों की खोज की है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : November 13, 2025 at 2:58 PM IST
|Updated : November 13, 2025 at 5:23 PM IST
शिमला: हिमालयी जैव विविधता एक बार फिर वैज्ञानिकों के लिए नई खोज लेकर आई है. हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला (HPU) और पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला (PUP) के मिरमेकोलॉजिस्ट ने अरुणाचल प्रदेश में ‘रॉक ऐंट्स’ की तीन नई प्रजातियों की खोज की है. HPU के जैव विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जोगिंदर रिल्टा और PUP के प्रो. डॉ. हिमेंद्र भारती की टीम ने इन ‘रॉक ऐंट्स’ (चट्टान पर रहने वाली चींटियों) की 3 नई प्रजातियों की खोज की है. यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘सोशियोबायोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है.
इन प्रजातियों के नाम
- टेम्नोथोरैक्स अरुणाचलेंसिस (Temnothorax arunachalensis)
- टेम्नोथोरैक्स बोल्टोनी (Temnothorax boltoni)
- टेम्नोथोरैक्स पंगचेनेंसिस (Temnothorax pangchenensis)
2012 में शुरू की थी रिसर्च
डॉ. जोगिंदर रिल्टा ने बताया कि यह शोधकार्य साल 2012 में प्रो. डॉ. हिमेंद्र भारती के साथ शुरू किया गया था, जिन्हें भारत का ‘एंट मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है. साल 2013 में सैंपल कलेक्शन किया गया, साल 2018 में रिसर्च पूरी हुई और साल 2025 में खोज को प्रकाशित किया गया. उन्होंने बताया कि यह अध्ययन पूरी तरह टैक्सोनॉमी (आकृति-विज्ञान आधारित वर्गीकरण) पर आधारित था, न कि डीएनए विश्लेषण पर. इस प्रजाति की आकृति विज्ञान संबंधी विशेषताएं पहले से मौजूद प्रजातियों से काफी भिन्न हैं, जैसे: प्रोपोडियल स्पायर की उपस्थिति, प्रोपोडियल स्पाइन की लंबाई, शरीर की बनावट, सिर का आकार, सबपेटियोलर प्रक्रिया, प्रोनोटम का आकार, एंटीना स्केप की लंबाई, शरीर के बालों की उपस्थिति (पाइलसिटी और रोमिलता), शरीर का रंग.
"हमने अरुणाचल प्रदेश से चींटियों के सैंपल इकट्ठे किए. उन्हें संरक्षित किया और प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी (microscope) के तहत उनका अध्ययन किया. हर प्रजाति के शरीर की बनावट, सिर की आकृति, रीढ़ की लंबाई, शरीर पर बालों की स्थिति, रंग और आकार जैसी सूक्ष्म विशेषताओं का विश्लेषण किया गया." - डॉ. जोगिंदर रिल्टा, असिस्टेंट प्रोफेसर, जैव विज्ञान विभाग, HPU

क्या होती हैं 'रॉक ऐंट्स'
'रॉक ऐंट्स' यानी चट्टान पर रहने वाली चींटियां. इन नई प्रजातियों को ‘रॉक ऐंट्स’ कहा जाता है, क्योंकि ये चट्टानों की दरारों और पत्थरों के बीच अपना घर बनाती हैं. इनका आकार छोटा होता है और ये ऊंचे, नमी भरे और ठंडे इलाकों में पाई जाती हैं. डॉ. रिल्टा के अनुसार, "अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर राज्यों की जैव विविधता अद्भुत है. इन इलाकों में अभी भी कई अज्ञात प्रजातियां छिपी हैं, जिन पर आगे और रिसर्च की जरूरत है."
नामकरण के पीछे की वैज्ञानिक सोच
- टेम्नोथोरैक्स अरुणाचलेंसिस (Temnothorax arunachalensis) का नाम इसकी टाइप स्थानीयता यानी अरुणाचल प्रदेश से लिया गया.
- टेम्नोथोरैक्स बोल्टोनी (Temnothorax boltoni) का नाम प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक बैरी बोल्टन के सम्मान में रखा गया, जिन्होंने एंट क्लासिफिकेशन की नींव रखी थी.
- टेम्नोथोरैक्स पंगचेनेंसिस (Temnothorax pangchenensis) का नाम पांगचेन क्षेत्र से जुड़ा है. "पांगचेन" शब्द मोनपा जनजाति की भाषा में "पापों से मुक्त स्थान" को दर्शाता है. यह जनजाति उस क्षेत्र की जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती है.
भारत में चींटियों की प्रजातियां
भारत में अब तक 864 से अधिक चींटियों की प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं. जबकि विश्वभर में इनकी संख्या लगभग 16,906 प्रजातियों तक पहुंच चुकी है. इनमें से बड़ी संख्या हिमालयी क्षेत्र खासकर हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से मिली है. ये खोज इस बात को और मजबूत करती है कि हिमालयी क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से अत्यंत समृद्ध है.
"प्रकृति में छोटी-सी चींटी भी एक अहम भूमिका निभाती है. ये मिट्टी की उर्वरता, बीज फैलाव और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं. हर नई खोज हमें यह सिखाती है कि प्रकृति में अभी भी बहुत कुछ जानना बाकी है." - डॉ. जोगिंदर रिल्टा, असिस्टेंट प्रोफेसर, जैव विज्ञान विभाग, HPU

कैसे हुई जांच-पड़ताल
- फील्ड में जाकर सैंपल इकट्ठे किए.
- सैंपल को Glass vials में सुरक्षित रखा.
- फिर लैब में लाकर माइक्रोस्कोप से उनकी जांच की.
- इसके बाद पहचान की गई कि यह प्रजाति किस परिवार (family) और किस जीनस (genus) से संबंधित है.
- हर चींटी के शरीर की बनावट, बालों की बनावट (white hair presence), दांतों की गिनती और स्पाइन की लंबाई को मापा गया.
वैज्ञानिक और पारिस्थितिक महत्व
इन नई प्रजातियों की खोज सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अहम है.
डॉ. जोगिंदर रिल्टा कहते हैं, "चींटियां किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत की संकेतक होती हैं. नई प्रजातियों की खोज इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्र में अभी भी जैव विविधता का विशाल भंडार छिपा है. इन प्रजातियों को समझना पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है."
युवाओं के लिए संदेश
डॉ. रिल्टा का मानना है कि विज्ञान में धैर्य और लगन सबसे बड़ी कुंजी है. वे कहते हैं, "मैं युवाओं से यही कहूंगा कि अगर आप जैव विविधता या टैक्सोनॉमी में आना चाहते हैं, तो प्रकृति के प्रति जिज्ञासा और शोध की भावना बनाए रखें. भारत जैसे देश में प्रकृति ने बहुत कुछ छिपा रखा है. बस उसे खोजने का साहस होना चाहिए."
एचपीयू कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने डॉ. जोगिंदर रिल्टा और उनकी टीम को इस खोज के लिए बधाई दी. उन्होंने कहा, "यह न केवल विश्वविद्यालय के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि हिमाचल प्रदेश के वैज्ञानिक अनुसंधान की दिशा में एक बड़ा कदम भी है."

