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भारत-तिब्बत सीमा व्यापार, 26 ट्रेड पास जारी किए गए, 6 साल बाद लौटेगी रौनक

पहली बार भारतीय व्यापारी अपने सामान को वाहनों के माध्यम से सीधे भारत-तिब्बत सीमा स्थित इंडो-तिब्बत ट्रेड प्वाइंट तक पहुंचा सकेंगे.

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भारत-तिब्बत सीमा व्यापार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : June 23, 2026 at 5:38 PM IST

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पिथौरागढ़: भारत-तिब्बत सीमा व्यापार 6 साल के बाद फिर नये रंग में लौट रहा है. पहली बार व्यापारी सड़क मार्ग से वाहनों के जरिए लिपुलेख दर्रे के नजदीक तक पहुंच सकेंगे. प्रशासन ने व्यापार की पहली खेप में 26 ट्रेड पास जारी कर दिए हैं, जिनमें 17 व्यापारी और नौ सहायक शामिल हैं. गुंजी में कस्टम कार्यालय और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं भी शुरू कर दी गई हैं.

25 से 30 पास और जारी होगे: इस बारे में ज्यादा जानकारी देते हुए धारचूला के एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि व्यापारियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए तैयार हो चुके परमिट तत्काल जारी कर दिए गए हैं. इस वर्ष सीमा व्यापार के लिए कुल 103 आवेदन मिले हैं. शेष आवेदनों की जांच के बाद अगले दो-तीन दिनों में 25 से 30 और पास जारी किए जाएंगे.

भारत-तिब्बत सीमा व्यापार के लिए 26 ट्रेड पास जारी किए गए (ETV Bharat)

सीमा व्यापार दोबारा शुरू होने का सबसे बड़ा फायदा सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था, स्थानीय रोजगार और छोटे कारोबारियों को होगा. करीब सात साल तक व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट की पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई थीं. अब भारतीय और नेपाली व्यापारियों के लिए नई ट्रेड मंडी विकसित की गई है. इसी नई मंडी में भारतीय व्यापारियों को दुकानें दी जाएंगी.

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1962 से पहले तिब्बत से नमक, ऊन और अन्य सामान भारत आयात किए जाते थे. (PHOTO- Getty Images)

नई मंडी में ज्यादा सुविधाएं: व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी. भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए और बेहतर लॉजिस्टिक सुविधा की भी मांग की गई है.

साल 2019 में तीन करोड़ का कारोबार हुआ था: व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि सड़क और आधुनिक सुविधाओं के कारण आने वाले वर्षों में कारोबार का दायरा और बढ़ सकता है. 2019 में इस मार्ग से करीब तीन करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था, जिसमें लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और 1.90 करोड़ रुपये का आयात शामिल था. अब सड़क और आधुनिक सुविधाओं के साथ व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, ऐसे में इस आंकड़े के काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.

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1962 से पहले भारतीय व्यापारी ऊनी कपड़े, जड़ी-बूटियां और हस्तशिल्प निर्यात करते थे. (PHOTO- Getty Images)

एक करोड़ रुपये से ज्यादा का माल फंसा: व्यापार बंद होने के कारण कई भारतीय व्यापारी अपना सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़ आए थे. पिछले छह साल से करीब 45 व्यापारियों का एक करोड़ रुपये से ज्यादा का सामान वहां फंसा हुआ है. व्यापार शुरू होने से इन व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अपना सामान वापस ला सकेंगे या उसे बेच सकेंगे.

लिपुलेख दर्रे का इतिहास: लिपुलेख दर्रा सिर्फ सीमा कारोबार का रास्ता नहीं, बल्कि सदियों से भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है. सीमांत क्षेत्रों में लंबे समय तक वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित व्यापार चलता था. ब्रिटिश अधिकारी और लेखक सर फ्रांसिस एडवर्ड यंग हसबैंड ने अपनी किताब 'इंडिया एंड तिब्बत' में हिमालयी व्यापारिक रास्तों को भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क का माध्यम बताया था. इन रास्तों से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि परंपराएं, भाषाएं और सीमांत समाजों के रिश्ते भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते थे. तिब्बत के साथ यह संपर्क सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं था.

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1962 के युद्ध के बाद मार्ग बंद होने से उत्तराखंड के सीमावर्ती गांवों की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंची. (PHOTO- Getty Images)

सीमांत इलाकों के मेले, धार्मिक यात्राएं और कारोबारी काफिले भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक संबंधों का भी आधार बने हुए थे. जौलजीबी जैसे मेले लंबे समय तक त्रिपक्षीय व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचाने जाते रहे. सामान्य पासपोर्ट भारत सरकार का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जिसके जरिए व्यक्ति वीजा नियमों के तहत दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा कर सकता है.

ट्रेड पास सिर्फ अधिकृत लोगों को ही जारी होता है: इसके विपरीत भारत-तिब्बत ट्रेड पास केवल सीमा व्यापार से जुड़े अधिकृत लोगों को जारी किया जाता है. यह पर्यटन, नौकरी या अन्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए मान्य नहीं होता. सामान्य पासपोर्ट कई वर्षों तक वैध रहता है और धारक को विभिन्न देशों की यात्रा की अनुमति देता है.

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लिपुलेख दर्रा भारत को तिब्बत के तकलाकोट (पुरंग) बाजार से जोड़ता है (PHOTO- Getty Images)

वहीं ट्रेड पास केवल निर्धारित ट्रेड सीजन और अधिकृत व्यापारिक मार्ग, जैसे लिपुलेख दर्रा-तकलाकोट क्षेत्र के लिए ही जारी किया जाता है. इसकी वैधता सीमित होती है और अवधि समाप्त होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता. वहीं, विशेष अनुमति-पत्र, जिसमें भूमिका भी तय होती है कि ट्रेड पास सामान्य पहचान दस्तावेज नहीं, बल्कि सीमा व्यापार के लिए जारी विशेष अनुमति-पत्र है. यह केवल पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यल (खच्चर) चालकों को दिया जाता है.

सीमा व्यापार में युवाओं की भागीदारी बढ़ी:

एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि इस वर्ष सीमा व्यापार में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है. नवयुवक व्यापारी के रूप में सुनील गब्र्व्याल सहित एक महिला व्यापारी भी इस व्यापारिक गतिविधि से जुड़ने जा रही हैं. उन्होंने कहा कि भारत-तिब्बत सीमा व्यापार के पुनः संचालन से सीमांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी. साथ ही स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ने की उम्मीद है.

पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है: लिपुलेख दर्रे से होने वाले पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है. यह समुदाय मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की ब्यास, दारमा और चौंदास घाटियों में निवास करता है. रं समाज को भोटिया या शौका समुदाय का हिस्सा भी माना जाता है.

सदियों तक यही समुदाय दुर्गम हिमालयी रास्तों में भारत-तिब्बत व्यापार को जिंदा रखे हुए था. इनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में तिब्बती संस्कृति की झलक दिखाई देती है. यह समुदाय अपनी ऊनी बुनाई, लोक संस्कृति और सीमांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है. 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में भोटिया जनजाति की आबादी 39 हजार से ज्यादा थी.

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