देहरादून में सजी 170 साल पुरानी हिमालय की विरासत, जर्मन कलाकारों की दुर्लभ पेंटिंग्स ने खोले इतिहास के पन्ना
देहरादून में एक प्रदर्शनी में 170 साल पुराने हिमालय को पेंटिंग के जरिए दिखाया गया. दिल्ली के बाद देहरादून में प्रदर्शनी. धीरज सजवाण की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : May 3, 2026 at 5:05 PM IST
देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इन दिनों हिमालय के अतीत की एक अनोखी झलक देखने को मिल रही है. 19वीं शताब्दी में तैयार की गई दुर्लभ पेंटिंग और विजुअल डॉक्यूमेंटेशन की एक विशेष प्रदर्शनी कला प्रेमियों, शोधकर्ताओं और आम दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. यह प्रदर्शनी न केवल कला का नमूना है, बल्कि हिमालय की भौगोलिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत का जीवंत दस्तावेज भी है.
देहरादून में आयोजित इस विशेष पेंटिंग एग्जीबिशन में 1860 के दशक में जर्मनी के तीन भाई (श्लागिन्ट्वाइट ब्रदर्स) हरमन, एडोल्फ और रॉबर्ट द्वारा तैयार किए गए हिमालय के दुर्लभ चित्रों को प्रदर्शित किया गया है. इन कलाकारों ने वर्ष 1854 से 1857 के बीच हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा कर 700 से अधिक चित्रों का निर्माण किया था. उस दौर में जब आधुनिक फोटोग्राफी तकनीक शुरुआती अवस्था में थी तो इन कलाकारों ने अपने कौशल और तत्कालीन तकनीकों के माध्यम से हिमालय के प्राकृतिक और सामाजिक जीवन को बेहद बारीकी से दर्ज किया.
भारत आई 170 साल पुरानी विरासत: इन 700 से अधिक चित्रों में से फिलहाल 77 प्रिंट्स को भारत लाया गया है, जिन्हें एक लंबे प्रयास के बाद संरक्षित और विकसित कर प्रदर्शनी के लिए तैयार किया गया है. इन चित्रों को तैयार करने और वर्तमान स्वरूप में लाने में लगभग 10 वर्षों का समय लगा है. शेष चित्रों को अभी भी विकसित और संरक्षित करने की प्रक्रिया जारी है. इस अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी के क्यूरेटर जर्मनी से आए प्रोफेसर हरमन क्रूट्समेन हैं. जिन्होंने इस पूरे प्रोजेक्ट को दिशा दी. उनके साथ उनकी पत्नी सबिन क्रूट्समेन ने भी इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. दोनों ने मिलकर इन ऐतिहासिक चित्रों को पुनर्जीवित करने और दुनिया के सामने लाने का काम किया है.

प्रो. हरमन क्रूट्समेन ने कहा कि,
हम पिछले 10 साल से हिमालय की रिप्रोडक्शन ईस्टर्न से लेकर वेस्टर्न पार्ट की पेंटिंग्स को चिन्हित करने में लगे हुए थे. हमने पिछले साल और इस साल इस प्रोजेक्ट को इंप्लीमेंट किया. हमें बहुत खुशी हो रही है कि भारत में पहली बार जनता के लिए इस प्रदर्शनी को लाया जा गया है, जो इन महत्वपूर्ण स्थानों को जान सकेंगे. खासकर उत्तराखंड के देहरादून में, जहां के पहाड़ इन पेंटिंग्स में मौजूद हैं. हमें उम्मीद है कि सभी लोगों को इन पेंटिंग्स को देखकर खुश मिलेगी.
-प्रो. हरमन क्रूट्समेन, प्रदर्शन के क्यूरेटर-

भारत में इन चित्रों को लाने, कस्टम प्रक्रिया पूरी करने और संपूर्ण लॉजिस्टिक व्यवस्था का जिम्मा स्थानीय समन्वयक चंदन डांगी ने उठाया है. चंदन डांगी 'पहाड़' नामक समाजसेवी संस्था से जुड़े हैं और इसी संस्था के प्रयासों से यह प्रदर्शनी संभव हो पाई है. 'पहाड़' संस्था लंबे समय से हिमालयी संस्कृति, पर्यावरण और समाज से जुड़े विषयों पर कार्य करती रही है और यह प्रदर्शनी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.

चंदन डांगी का कहना है कि,
प्रदर्शनी का पहला आयोजन दिल्ली में किया गया था, जहां इसे काफी सराहना मिली. अब इसे देहरादून में प्रदर्शित किया जा रहा है और इसके बाद यह प्रदर्शनी नैनीताल में भी लगाई जाएगी. उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में इस तरह की प्रदर्शनी का आयोजन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह क्षेत्र खुद इन चित्रों का हिस्सा रहा है.
-चंदन डांगी, समन्वयक, चित्र प्रदर्शनी-

प्रदर्शनी में इन स्थानों का चित्रण: प्रदर्शनी में शामिल चित्रों में जम्मू-कश्मीर की प्रसिद्ध डल झील का वर्ष 1856 में किया गया चित्रण विशेष आकर्षण का केंद्र है, जिसे पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है. इसके अलावा लामा युरू (Lama Yuru) क्षेत्र के चित्र, उत्तराखंड के केदारनाथ धाम की लगभग 170 वर्ष पुरानी दुर्लभ छवि, बदरीनाथ धाम के ऐतिहासिक दृश्य, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के कई महत्वपूर्ण स्थानों का चित्रण भी प्रदर्शनी में शामिल है. इन चित्रों की खास बात यह है कि ये केवल दृश्यात्मक सुंदरता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें हिमालय की भौगोलिक संरचना, नदियों का प्रवाह, ग्लेशियरों की स्थिति, पहाड़ी वास्तुकला, पुराने पुलों की बनावट और उस समय के लोगों की जीवनशैली का भी विस्तृत चित्रण किया गया है. यह उस दौर का एक विजुअल आर्काइव है, जब हिमालय अपेक्षाकृत कम बदला हुआ और अधिक प्राकृतिक स्वरूप में मौजूद था.

इन चित्रों को बनाने में उस समय की शुरुआती कैमरा तकनीकों, स्केचिंग, पेंटिंग और अन्य पारंपरिक तरीकों का उपयोग किया गया. यह उस समय की वैज्ञानिक और कलात्मक समझ का अनूठा संगम है. आज के डिजिटल युग में जब तस्वीरें लेना बेहद आसान हो गया है, लेकिन उस दौर में इस स्तर की सटीकता और विस्तार के साथ चित्रण करना अपने आप में अद्भुत उपलब्धि मानी जाती है.

समन्वयक चंदन डांगी के अनुसार,
यह प्रदर्शनी केवल कला प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. इन चित्रों के माध्यम से हिमालय के अतीत और वर्तमान के बीच तुलना की जा सकती है. ग्लेशियरों के आकार में बदलाव, नदियों के स्वरूप में परिवर्तन और मानव बसावट के विस्तार को समझने में ये चित्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
-चंदन डांगी, समन्वयक, चित्र प्रदर्शनी-
आज जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट वैश्विक चिंता का विषय बन चुके हैं. ऐसे में 160 साल पुराने ये चित्र हमें यह समझने में मदद करते हैं कि हिमालय ने समय के साथ कितना बदलाव देखा है. यह प्रदर्शनी एक तरह से चेतावनी भी देती है कि यदि प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में यह बदलाव और भी गंभीर हो सकते हैं. स्थानीय लोगों और कला प्रेमियों में इस प्रदर्शनी को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है. बड़ी संख्या में लोग इन दुर्लभ चित्रों को देखने पहुंच रहे हैं और हिमालय के अतीत से जुड़ने का अनुभव ले रहे हैं.
कुल मिलाकर, देहरादून में लगी यह प्रदर्शनी केवल एक कला आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण का संगम है. यह न सिर्फ हिमालय की खोई हुई तस्वीरों को सामने लाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी प्रस्तुत करती है.
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