ऐसी बंसी बजाई घनश्याम ने पर जमकर झूमी महिलाएं, होली कार्यक्रम में बांधा समा
नैनीताल जिले के रामनगर में महिलाएं घरों से निकलकर होली सेलिब्रेट कर रही है. महिलाएं होली के रंगों में सराबोर नजर आ रही हैं.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 11, 2025 at 11:05 AM IST
रामनगर: कुमाऊं मंडल में जगह-जगह लोगों पर होली का खुमार चढ़ा हुआ है. लोग जमकर होली का लुत्फ उठा रहे हैं. वहीं रामनगर में भी महिलाओं होल्यारों ने होली गायन की खूब धूम मचाई. इस दौरान महिला होल्यारों ने उत्कृष्ट गायन, स्वांग व नृत्य कर कार्यक्रमों में जान फूंक दी. कार्यक्रम में नगर क्षेत्र के साथ ही आसपास की महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. इस दौरान महिलाएं होली के रंगों में सराबोर नजर आ रही हैं.
रामनगर में लोगों में होली (Holi 2024) की खुमारी साफ दिख रही है. महिलाएं की यहां खड़ी होली और बैठकी होली खूब धूम मची हुई है. महिलाएं टोली बनाकर होली कार्यक्रम में पहुंच रही हैं. महिलाओं में पर्व को लेकर काफी उत्साह दिखाई दे रहा है. महिलाएं घर का सारा काम निपटाकर होली गायन में पहुंच रही हैं. महिलाओं होल्यारों ने कहा कि वो होली पर्व का साल भर बेसब्री से इंतजार करते हैं और होली का पर्व उन्हें काफी अच्छा लगता है.
बड़ी बात है कि कुमाऊं में महिलाएं होली की परंपरा को आज भी संजोए हुई हैं. होली कार्यक्रम में सभी महिलाएं जमा होकर होली गायन करती हैं और सभी पर्व का आनंद लेती हैं. होली कार्यक्रम में महिलाओं ने पारंपरिक गीतों जमकर डांस किया. महिलाएं "ऐसी बंसी बजाई घनश्याम ने" और "होली खेलन कैसे जाऊं सखी रे" जैसे होली गीतों पर धमाल मचाया और एक-दूसरे को गुलाल अबीर लगाकर होली सेलिब्रेट की.
महिलाओं की होली
- इस होली में विशेष रूप से महिलाएं शामिल होती हैं और अपने समूह में बैठकर होली के गीत गाती हैं
- यह भी बैठकी होली का ही रूप है, लेकिन इसमें महिलाओं की अधिक भागीदारी होती है
- यह समाज में महिलाओं की भूमिका और उनकी सांस्कृतिक भागीदारी को दर्शाती है
कुमाऊं की होली का इतिहास: कुमाऊं की होली का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना माना जाता है. इसके मूल में अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे क्षेत्रों में ये सांस्कृतिक परंपरा लोग संजोए हुए हैं. माना जाता है कि यह परंपरा चंद्रवंशी राजाओं के शासनकाल में शुरू हुई. कहा जाता है कि कुमाऊं की होली मुगल काल और उसके बाद के समय में दरबारी संगीत और भक्ति आंदोलन से प्रभावित हुई. इसमें कृष्ण भक्ति का विशेष प्रभाव दिखता है, कुमाऊं के दरबारों में होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि संगीत और आध्यात्मिकता भी होती है.

खास होती है बैठकी होली
- यह होली माघ माह में बसंत पंचमी से शुरू हो जाती है और फाल्गुन माह तक चलती है.
- इसमें स्थानीय लोग एक साथ बैठकर शास्त्रीय रागों पर आधारित होली के गीत गाते हैं.
- इसे मुख्य रूप से मंदिरों, घरों और सामुदायिक केंद्रों में गाया जाता है.
- इसमें तबला, हारमोनियम और मृदंग का प्रयोग किया जाता है.
- गीतों में ब्रज और अवधी भाषा का मिश्रण होता है और इनमें कृष्ण लीलाओं का वर्णन होता है.
नैनीताल जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे कुमाऊं क्षेत्र में इस समय होली का खुमार छाया हुआ है. यह त्योहार सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि मेलजोल और आपसी प्रेम का भी प्रतीक है. महिलाएं एक-दूसरे से गले मिलकर और रंग लगाकर इस पावन पर्व की शुभकामनाएं दे रही हैं. कुमाऊंनी में महिलाएं होली के रंग में रंग चुकी हैं, आने वाले दिनों में पर्व और भी भव्य होगा

कुमाऊंनी खड़ी होली
- यह होली फाल्गुन मास के मध्य से शुरू होती है और रंगों की होली तक चलती है
- इसमें लोग पारंपरिक वेशभूषा (कुर्ता, पगड़ी, धोती) पहनकर समूहों में नाचते-गाते हैं
- ढोल, नगाड़े और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ होली के गीत गाए जाते हैं
- इसमें पूरा गांव या कस्बा शामिल होता है और होली का जुलूस पूरे क्षेत्र में घूमता है
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक अनूठी सांस्कृतिक विरासत है. होली उत्तर भारत की पारंपरिक होली से काफी अलग होती है. जिसमें बैठकी होली, महिला होली और खड़ी होली इसे खास बनाती हैं.
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