खास है देहरादून का हैंडमेड 'अबीर', न केमिकल, न नुकसान, रंग भी एकदम चोखा
साल दर साल घट रही है हैंडमेड अबीरों की डिमांड, देहरादून में कारीगर बना रहे केमिकल फ्री रंग, स्किन को नहीं पहुंचता है नुकसान

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 10, 2025 at 7:30 PM IST
|Updated : March 10, 2025 at 10:21 PM IST
रोहित कुमार सोनी, देहरादून: होली रंगों का पर्व है. जिसमें लोग एक-दूसरे पर रंग लगाकर इस त्योहार को मनाते हैं, लेकिन कुछ सालों से लोग रंगों से परहेज करने लगे हैं. जिसकी मुख्य वजह मार्केट में खतरनाक रंगों की भरमार होना है. इतना ही नहीं रंगों के साथ ही खतरनाक और केमिकल वाले अबीर, गुलाल की बिक्री ज्यादा होने की वजह से भी इसकी डिमांड घटने लगी है.
इन सबके इतर उत्तर प्रदेश के प्रताप नगर का रहने वाला एक परिवार ऐसा भी है, जो पिछले 70 सालों से हर साल देहरादून आकर अबीर बनाने का काम करता है. यह परिवार जो अबीर बनाता है, वो न सिर्फ केमिकल मुक्त होता है. बल्कि नुकसानदेह भी नहीं होता है.
रंगों का त्योहार होली को लेकर हर साल लोगों में काफी उत्साह देखा जाता रहा है. इस बार रंगों का त्योहार होली 14 मार्च को मनाई जाएगी. जिसके चलते बाजारों में रंगों और रंग बिरंगी अबीरों की दुकानें सज गई है. इसके साथ ही अबीर बनाने वाले कारीगर भी बड़े पैमाने पर अबीर बनाने में जुटे हुए हैं.
20 सालों से अबीर तैयार कर रहे सत्य प्रकाश: वहीं, ईटीवी भारत से खास बातचीत में अबीर बनाने वाले कारीगर सत्य प्रकाश यादव ने बताया कि वो पिछले 20 सालों से अबीर बनाने का काम कर रहे हैं. हर साल होली से करीब 15 दिन पहले देहरादून स्थित झंडा साहिब आ जाते हैं और यहीं से सामान खरीदकर अबीर बनाते हैं. होली त्योहार के कुछ दिनों बाद अपने घर को वापस लौट जाते हैं.

अबीर की डिमांड काफी घटी: कारीगर सत्य प्रकाश ने बताया कि पिछले कुछ सालों से अबीर की खपत में कमी देखी जा रही है. क्योंकि, पहले 20 से 25 क्विंटल अबीर बनाते थे, लेकिन अब डिमांड के अनुसार सिर्फ 10 से 12 क्विंटल अबीर ही बनाते हैं. क्योंकि, अबीर की डिमांड पिछले कुछ सालों में घट गई है.
पूरी तरह से सुरक्षित और केमिकल फ्री होता है अबीर: कारीगर का कहना है कि लोग कंपनियों और पैकेट वाले अबीर को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. जिसके चलते इन हैंडमेड अबीर की डिमांड घट रही है. जबकि, वो लोग जो अबीर बना रहे हैं, वो पूरी तरह से सुरक्षित और केमिकल मुक्त है. जिससे स्किन यानी त्वचा को कोई नुकसान नहीं होता है.

उनका कहना है कि लगभग हर साल जितना अबीर बनाते हैं, उनका सारा माल बिक जाता है, लेकिन जब नहीं बिकता है तो वो उसे यहीं पर रखकर चले जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे रंग के अबीर होते हैं, जिसको सिंदूर में तब्दील कर देते हैं. इसके लिए उन्हें अलग से और मेहनत करनी पड़ती है.
आंख या मुंह में जाने पर नहीं होता है कोई नुकसान: कारीगरों का कहना है कि अबीर को बनाने में अरारोट और रंग की जरूरत होती है. ये दोनों चीजें ही खाने वाली होती हैं. ऐसे में इसके आंख में चले जाने या मुंह में जाने से कोई नुकसान नहीं होता है. साथ ही बताया कि वो जो भी अबीर बनाते हैं, उसको थोक रेट में यानी करीब 90 रुपए किलो में बेच देते हैं. जिसको बाद में फुटकर रेट में करीब 200 रुपए किलो में बेचा जाता है.
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