टेसू का फूल देता है होली के आगमन का संदेश, कहते हैं जंगल की आग
अपने रंग की वजह से 'जंगल की आग' कहा जाने वाले टेसू का फूल कई समुदायों के लिए विशेष महत्व रखता है.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : March 3, 2025 at 6:27 AM IST
|Updated : March 3, 2025 at 7:49 AM IST
बुरहानपुर : पलाश के पेड़ पर जब टेसू के फूल आने लगते हैं, तो पता लग जाता है कि होली का त्यौहार आने वाला है. मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में कई आदिवासी इलाकों में इन फूलों का खासा महत्व होता है. नेपानगर, खकनार और धूलकोट में इन टेसू के फूलों के आने के साथ आदिवासी होली की तैयारियों में जुट जाते हैं. स्थानीय भाषा में होली के पर्व को भागोरिया भी कहा जाता है.
मौसम का मिजाज बदलते ही बुरहानपुर के जंगलों समेत कई इलाकों में टेसू के फूल खिलने लगते हैं. इस बार भी आदिवासी पलाश के पेड़ पर लगे इन फूलों को जुटाने में लग गए हैं. इन फूलों को पीसकर इससे प्राकृति रंग बनाकर होली का पर्व मनाया जाएगा.
लाल और नारंगी रंग देता है टेसू
होली का त्योहार भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस समय देश के हर हिस्से में रंगों की बौछार होती है, लेकिन आदिवासी समाज के लिए ये और भी खास होता है. आदिवासी समाज इसे सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं और इन फूलों से इन्हें काफी लगाव होता है. ऐसे में टेसू यानी पलाश के फूल जुटाने के साथ-साथ आदिवासी समुदाय इनसे रंग बनाने की प्रक्रिया भी शुरू कर देता है. इन फूलों से इन्हें हल्का लाल, पीला और नारंगी रंग मिलता है.
आदिवासी समुदाय में टेसू का महत्व
आदिवासी समुदाय में टेसू के फूलों का महत्व केवल सजावट या रंग के रूप में नहीं होता, बल्कि यह उनके जीवन के साथ गहरे तौर पर जुड़ा होता है, यह फूल उनकी पारंपरिक मान्यताओं, उत्सवों और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुके हैं. इस पर्व को मनाते समय आदिवासी एकजुट होकर सामूहिक रूप से गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं और एक-दूसरे के साथ रंगों खेलते हैं.

क्या होता है टेसू का फूल?
टेसू का फूल जिसे पलाश का फूल, केसू, ढाक और अन्य नामों से भी जाना जाता है. पलाश के पेड़ पर उगने वाले इस फूल से रंग छूटता है. इससे लाल और नारंगी रंग बनाया जाता है. इसका रंग इतना आकर्षक होता है कि इसे जंगल की आग भी कहा जाता है. देश के विभिन्न हिस्सों में ये फूल वसंत ऋतु के आगमन के साथ उगने लगते हैं, जिसके साथ होली का त्योहार भी मनाया जाता है. पुराने दौर में इसी फूल के साथ अन्य फूलों को मिलाकर होली के रंग तैयार किए जाते थे. आज भी ग्रामीण इलाकों में इसी के रंग का इस्तेमाल किया जाता है.
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