सल्ट के होल्यारों की रंगीली टोली पहुंची रामनगर, होली गीतों से गूंजी कॉर्बेट नगरी
उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के सल्ट की होली बहुत प्रसिद्ध है, करीब 60 किमी दूर से चलकर होल्यार रामनगर पहुंचे हैं

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : March 12, 2025 at 1:48 PM IST
रामनगर: होली के रंग अब हर तरफ बिखरने लगे हैं. इसी कड़ी में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र की प्रसिद्ध होल्यारों की टोली रामनगर पहुंची. यहां होल्यारों ने पारंपरिक होली गीत गाकर ऐसा समा बांधा कि लगा जैसे होली आज ही है. सल्ट के होल्यारों के साथ पूरा रामनगर झूम उठा. सल्ट से करीब 60 किलोमीटर की दूरी तय करके होल्यारों की टीम रामनगर पहुंची है.
रामनगर पहुंची सल्ट के होल्यारों की टोली: रामनगर की गलियों में पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे होल्यार झोड़ा स्टाइल में नृत्य करते हुए होली गीत गा रहे हैं. चारों ओर अबीर और गुलाल उड़ रहा है. लोग खुशी से झूम रहे हैं. जी हां, होली का रंग जम चुका है. अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र की प्रसिद्ध होली गीतों से रामनगर की गलियों में गूंज रही हैं. सल्ट के होल्यारों ने जब होली गीत गाए तो माहौल एकदम रंगीन हो उठा.
रामनगर में जमा होली का रंग: प्रयास सेवा संस्था के संयोजन में आयोजित इस महाहोली में पुरुष और महिला होल्यारों ने मिलकर होली के पारंपरिक गीत गाए और नृत्य किया. वहीं आयोजक रणजीत सिंह रावत ने कहा कि-

हमारी कोशिश यही है कि इस पारंपरिक होली को जिंदा रखा जाए. पहले जब हमने 2004 में यह आयोजन शुरू किया था, तब 70-75 होली गायन करने वाले लोग होते थे. अब इनकी संख्या घटकर 15-20 रह गई है. नई पीढ़ी इसमें रुचि नहीं ले रही, यह चिंता का विषय है. होल्यारों की यह टोली पिछले 21 सालों से रामनगर आ रही है और यहां अपनी पारंपरिक होली की धूम मचाती है. लेकिन एक बड़ी चिंता यह है कि इस होली परंपरा को आगे ले जाने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं. -रणजीत रावत, आयोजक-
होली में खल रही छाक भोज की कमी: होल्यार पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ झोड़ा-चांचरी करते दिख रहे हैं. बुजुर्ग गाते हुए और युवा ताल में झूमते दिखाई दिए. दरअसल होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है. पूर्व विधायक रणजीत सिंह रावत कहते है कि "छाक भोज कुमाऊं की होली से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा थी. इसमें पूरे गांव या मोहल्ले के लोग मिलकर पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन बनाते थे और सामूहिक रूप से भोजन करते थे.

ऐसे होता था छाक भोज: पहले जब होली होती थी, तब छाक भोज के बिना यह अधूरी मानी जाती थी. पूरी, काफल, आलू के गुटके, भट की चुड़कानी, पालक पकौड़ी, डुबके जैसे व्यंजन बनाए जाते थे. पूरा गांव एक साथ भोजन करता था. अब यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है. समाज में एकजुटता और भाईचारे को मजबूत करने वाली यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. जहां कभी पूरे गांव के लोग मिलकर होली मनाते थे, अब लोग अपने-अपने घरों तक सीमित होते जा रहे हैं.

रणजीत रावत बताते हैं कि पहले बैठकी होली और खड़ी होली के बाद छाक भोज किया जाता था. लेकिन अब लोगों की भागदौड़ भरी जिंदगी और बदलते लाइफस्टाइल के कारण यह परंपरा कमजोर पड़ गई है.
वहीं सल्ट से आए बुजुर्ग गायक कहते हैं कि-
यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमें चाहिए कि हम युवाओं को इस ओर आकर्षित करें और इन परंपराओं को पुनर्जीवित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का भी सहारा लें. उत्तराखंड की संस्कृति अद्भुत है, लेकिन इसे बचाने की जरूरत है. अगर नई पीढ़ी इसे नहीं अपनाएगी, तो हमारी धरोहर कहीं खो जाएगी. सल्ट की होली हो या छाक भोज, ये सिर्फ त्यौहार नहीं, बल्कि हमारी पहचान हैं.-सल्ट से आए होल्यार-
14 मार्च को है होली: हिंदू पंचांग के अनुसार, होली का पर्व चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है. इस साल होली का त्योहार 14 मार्च को है. होली से एक दिन पहले यानी 13 मार्च को होलिका दहन होगा.

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