पाकिस्तान जेल से रिहा सीताराम 27 साल बाद भी नहीं लौटा घर, बूढी मां को अभी भी उम्मीद
भागलपुर का एक व्यक्ति पाकिस्तान जेल से छूटने के बाद भी आज तक घर नहीं पहुंचा है. खोजबीन करने पर भी कहीं पता नहीं चला.

Published : May 20, 2025 at 10:47 AM IST
|Updated : May 20, 2025 at 1:44 PM IST
भागलपुर: घर की गरीबी दूर करने के लिए बिहार के भागलपुर से सीताराम झा पंजाब गए थे. इसी बीच वो गलती से भारत का बॉर्डर क्रॉस करके पाकिस्तान पहुंच गए. पाकिस्तान के अनुसार सीताराम झा को 31 अगस्त 2004 को पाकिस्तान की जेल से रिहा करके भारत को सौंप दिया गया था, लेकिन आज तक वो अपने घर नहीं पहुंचे हैं.
आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे सीताराम झा: कहलगांव अनुमंडल के मदारगंज निवासी उखा देवी के बेटे सीताराम झा ने साल 1997 में एक टेंपो खरीदा था, जब उसकी किश्त नहीं चुकी, बैंक ने उनका ऑटो जब्त कर लिया, जिसके बाद सीताराम झा आर्थिक तंगी से जूझने लगे.
1999 में गलती से पाकिस्तान पहुंच गए थे सीताराम झा: परिवार का भरण-पोषण करने के लिए वो पंजाब चले गए. काम करने के दौरान साल 1999 में भारत का बॉर्डर क्रॉस करके पाकिस्तान पहुंच गए. इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने सीताराम झा को गिरफ्तार कर इस्लामाबाद जेल में बंद कर दिया.
सत्यापन के दौरान परिजनों को मिली जानकारी: साल 2002 में तत्कालीन भागलपुर एसपी को सीताराम झा के सत्यापन के लिए पत्र आया था, तब परिवार को मामले की जानकारी हुई. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल से पाकिस्तान जेल में बंद भारत के कई कैदियों को छोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई थी.

2004 में पाकिस्तान से रिहा हुए थे सीताराम झा: करार होने के बाद अगस्त 2004 में भारत में बंद 19 पाकिस्तानियों और पाकिस्तान जेल में बंद 36 भारतीय कैदियों का आदान-प्रदान किया गया था, जिसमें सीताराम झा भी थे. पाकिस्तान जेल में रहने के कारण सीताराम झा की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. इसके बाद सीताराम झा का कहीं भी पता नहीं चला.
''साल 2002 के बाद से लगातार हम सीताराम झा की खोजबीन कर रहे हैं, लेकिन कुछ पता नहीं चला. साल 2007 में गृह विभाग को पत्र लिखा था. साथ ही विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति, बीएसएफ और बिहार सरकार के कई अधिकारियों को पत्र लिखा. इसके अलावा इस्लामाबाद के अधिकारियों को भी पत्र लिखा गया, लेकिन सीताराम का कोई सुराग नहीं लगा. सीताराम झा को छोड़ने के रिकॉर्ड हैं, लेकिन वो पंजाब से कहां गए, इसका पता नहीं चला''. मुकेश झा, रिश्तेदार

अमृतसर गए थे सीताराम झा: रिश्तेदार मुकेश झा ने आगे बताया कि हमें अब तक जो दस्तावेज मिले हैं, वह विरोधाभासी हैं. मैं 2007 से अमृतसर प्रशासन के संपर्क में हूं, लेकिन उन्होंने मुझे कोई ठोस जवाब नहीं दिया है. उन्होंने कहा कि सीताराम 27 साल की उम्र में 1997 में कमाने के लिए अमृतसर गए थे. वह छह से सात महीने तक हमारे संपर्क में रहे और अपनी पत्नी और मां को पैसे भी भेजे, लेकिन फिर वो वहां से गायब हो गए.
''तब से लेकर आज तक प्रशासन से लेकर राजनेताओं की चौखट पर अपने बेटे की सकुशल वापसी को लेकर गुहार लगाती रही हूं, लेकिन मेरे बेटे के बारे में कोई जानकारी नहीं लगी है. मेरा सिर्फ एक ही बेटा था. शादी भी हो गई थी, जब वह नहीं लौटा तो बहु ने दूसरी शादी कर ली''. उखा देवी, मां, सीताराम झा

समाचार पत्र में छपी थी सीताराम झा की तस्वीर: रिश्तेदार मुकेश कुमार ने बताया कि साल 2002 में अमृतसर दैनिक समाचार में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें सीताराम झा की तस्वीर लाहौर जेल में एक कैदी के रूप में छपी थी. लेख में उल्लेख किया गया था कि पाकिस्तान सरकार भारतीय कैदियों को रिहा करना चाहती है. उसके बाद बिहार पुलिस की विशेष शाखा द्वारा एक सत्यापन किया गया, जिसमें हमने उसकी पहचान की.
आरटीआई से रिहा होने का चला पता: हम उम्मीद कर रहे थे कि सीताराम को जल्द ही रिहा कर दिया जाएगा. सीताराम झा का सत्यापन साल 2002 में पूरा हो गया था, इसलिए मैंने उनकी रिहाई के संबंध में 2007 में एक आरटीआई दायर की. आरटीआई के बाद खुलासा हुआ कि सीताराम को 31 अगस्त 2004 को वाघा बॉर्डर पर रिहाकर अमृतसर प्रशासन को सौंप दिया गया था.

सीताराम की मानसिक स्थिति नहीं थी ठीक: उन्होंने बताया कि आव्रजन विभाग ने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग द्वारा जारी 2004 के पत्र को भी संलग्न किया, जब मैंने वाघा सीमा पर बीएसएफ के आईजी से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि सीताराम झा का नाम 36 कैदियों की सूची में 10वें स्थान पर था, जिन्हें पाकिस्तान के अधिकारियों ने बीएसएफ को सौंप दिया, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति स्थिर नहीं थी, इसलिए उसे अमृतसर प्रशासन को सौंप दिया गया.
परिजनों ने अधिकारियों पर उठाए सवाल: मुकेश कुमार ने बताया कि पीएमओ ने साल 2007 में अमृतसर के उपायुक्त को पत्र भेजा. शुरुआत में डीसी ने मेरी कॉल का जवाब दिया और मुझे सीताराम के ठिकाने का पता लगाने का आश्वासन दिया, लेकिन बाद में उन्होंने मेरे कॉल का जवाब देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने हमें पहले से सूचित क्यों नहीं किया, ताकि हम उन्हें लेने के लिए वाघा सीमा जाते.


परिजनों ने पीएम मोदी से लगाई गुहार: इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायुक्त एसके रेड्डी की पत्र संख्या आइएफएल/ सीओएनएस/ 411/01/2008 के अनुसार 31 अगस्त 2004 को 36 कैदियों को पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार को वाघा बॉर्डर पर सौंपा था. इन कैदियों में सीताराम झा भी शामिल थे. सीताराम झा के रिश्तेदारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में संज्ञान लेने की अपील की है.
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