झारखंड की कवयित्री को मिली राष्ट्रीय पहचान, पार्वती तिर्की को साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार
खेल में झारखंड ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी है. अब साहित्य के क्षेत्र में भी प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है.

Published : June 22, 2025 at 12:14 PM IST
रांचीः कला और साहित्य के क्षेत्र में अब झारखंड के युवा अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. ऐसी ही एक युवा कवयित्री हैं, जिन्होंने झारखंड का मान बढ़ाया है. ये और कोई नहीं बल्कि गुमला जिला का रहने वाली युवा कवयित्री पार्वती तिर्की हैं.
झारखंड की इस युवा कवयित्री डॉ. पार्वती तिर्की को उनके कविता संग्रह "फिर उगना" के लिए वर्ष 2025 का साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार प्रदान किया गया है. यह सम्मान उन्हें कविता विधा में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया है. झारखंड के गुमला जिले की रहनेवाली पार्वती तिर्की की यह उपलब्धि राज्य के साहित्यिक जगत के लिए गर्व का विषय बन गई है. पुरस्कृत होने के बाद रांची पहुंची पार्वती तिर्की ने ईटीवी भारत से खास बातचीत की है.
पार्वती तिर्की ने इस सम्मान को आदिवासी समाज, अपनी भाषा कुड़ुख और लेखन से जुड़े संघर्षों को समर्पित किया है. उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार मेरे लिए सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति की स्वीकृति है जिसे हम आज खोते जा रहे हैं. मेरी कविता आदिवासी जीवन, भाषा, और परंपरा से गहरे रूप में जुड़ी हुई है. यह सम्मान मुझे आगे और बेहतर लिखने की ताकत देगा.
गांव से निकलीं कवयित्री, जिसने भाषा और समाज से जोड़ा पुल
डॉ. पार्वती तिर्की का जन्म 16 जनवरी 1994 को झारखंड के गुमला जिला में हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय गुमला से हुई. इसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू), वाराणसी से हिंदी साहित्य में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई की. उनका शोध विषय था- "कुड़ुख आदिवासी गीत: जीवन राग और जीवन संघर्ष", जो यह दर्शाता है कि पार्वती ने न केवल कविता को अपनाया बल्कि अपनी जड़ों, संस्कृति और भाषा से भी गहराई से जुड़ी रहीं.
पार्वती बताती हैं कि उनका साहित्यिक जीवन उन्हीं गांवों, गीतों और कहानियों की विरासत से प्रेरित है जो अब धीरे-धीरे हमारी चेतना से गायब होते जा रहे हैं. अपने शोध कार्य के दौरान उन्होंने लगभग 50 गांवों का दौरा किया और लोकगीतों, किस्सों और अनुभवों को नजदीक से समझा. ये अनुभव उनकी कविताओं में आत्मसात हो गए.
“फिर उगना”– भाषा, स्मृति और संघर्ष की आवाज
"फिर उगना" कविता संग्रह वर्ष 2023 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था. इसमें करीब 60 कविताएं शामिल हैं जिनमें हिंदी और कुड़ुख, दोनों भाषाओं के शब्दों और भावों का प्रयोग किया गया है. इन कविताओं में झारखंड के आदिवासी समाज की जीवन-दृष्टि, लोक संवेदनाएं, प्रकृति से जुड़ाव, और संस्कृति की सघन उपस्थिति है.
पार्वती की कविताएं मुख्यधारा की भाषा और साहित्य में वह स्थान निहित करती हैं जहां अब तक आदिवासी आवाजें उपेक्षित रही हैं. वह अपनी कविताओं में जंगल, पहाड़, नदियों और लोक-विश्वासों के माध्यम से उन सच्चाइयों को सामने लाती हैं जो बहुधा आधुनिक विमर्शों से गायब होती हैं. पार्वती कहती हैं कि “मेरे लिए कविता संवाद है. मैं चाहती हूं कि मेरी कविताएं सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज भी बनें”.
भविष्य की दिशा–नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
पार्वती तिर्की न केवल कवयित्री हैं, बल्कि आरएलएसवाइ कॉलेज में हिंदी की सहायक प्राध्यापक भी हैं. उन्होंने साहित्य को केवल पढ़ाया नहीं जिया है. वर्ष 2024 में वह राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित ‘भविष्य के स्वर’ कार्यक्रम की वक्ता भी रहीं. जहां उन्होंने आदिवासी साहित्य और युवाओं के लेखन पर विचार साझा किए थे. उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ी को अपनी भाषा और साहित्य से जुड़ना चाहिए. वह कहती हैं कि “जब हम अपनी भाषा और संस्कृति को अपनाते हैं, तभी वह जिंदा रहती है। अगर हम चुप रहेंगे तो हमारी आवाज, हमारी स्मृतियां सब खो जाएंगी। इसलिए मैं लिखती हूं".
आदिवासी जीवन-दृष्टि को दिया साहित्यिक मंच
पार्वती की कविता आदिवासी जीवन को केवल चित्रित नहीं करती, बल्कि उसमें गहराई से डूबती हैं. उनके यहां जंगल केवल प्राकृतिक उपस्थिति नहीं, बल्कि स्मृति, संघर्ष और प्रेम के प्रतीक हैं. उनकी कविताओं में पंछी, पेड़, मिट्टी, भाषा और मां—ये सभी एक जिंदा दुनिया के हिस्से बनकर आते हैं. यह वही दुनिया है जो आज के बाजारवादी साहित्य में अक्सर हाशिए पर चली जाती है.
सम्मान से मिली नई ऊर्जा
डॉ. पार्वती तिर्की का यह कहना कि मुझे यह पुरस्कार मेरी जड़ों ने दिलाया है, साहित्य के उस पक्ष को उजागर करता है जो अब भी जमीन से जुड़कर लिखने को जरूरी मानता है. उनका लेखन इस बात का उदाहरण है कि साहित्य न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि समाज, संस्कृति और अस्मिता का प्रमाण भी है. अब जब पार्वती तिर्की को यह राष्ट्रीय पहचान मिली है तो न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश को उनसे और भी उम्मीदें हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि “कविता केवल शब्द नहीं, वह मिट्टी, बोली, और स्मृति की जड़ों से निकला पुनर्जन्म है—फिर उगने की प्रक्रिया”.
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