राजस्थान के इस गांव में खेली गई बारूद से होली... परंपरा, शौर्य और उत्साह का दिखा अद्भुत संगम
उदयपुर के इस गांव में होली गुलाल से नहीं बल्कि बारूद से खेली गई.500 सालों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन किया गया.

Published : March 16, 2025 at 9:41 AM IST
उदयपुर. दक्षिणी राजस्थान के इस गांव में शनिवार रात को बारूद से होली खेली गई जिसे देखने के लिए देश दुनिया से लोग पहुंचे. अक्सर अपने फूलों से रंगों से होली खेलते हुए देखा होगा लेकिन उदयपुर जिले का एक गांव जहां बारूद से होली खेली गई. करीब 45 किलोमीटर दूर मेनार गांव की होली इतिहास के उस कहानी को बयां करती है जिसमें यहां के लोगों ने मुगलों को मुंहतोड़ जवाब दिया था.
ऐसी होली आपने नहीं देखी होगी : मेनार गांव की होली अपने आप में अनूठी है, क्योंकि यहां खेली गई होली रंग और फूलों की नहीं, बल्कि पटाखे और गोला-बारूद की होती है. स्थानीय लोगों के अनुसार आज से करीब 500 वर्ष पूर्व इस गांव के रणबांकुरों ने मुगलों की सेना को शिकस्त देने के उत्साह में इस अनूठी होली का आयोजन किया जाता है. शाम ढलने के साथ ही गांव में होली की तैयारियां परवान चढ़ने लगती हैं. स्थानीय व्यक्ति राजेश ने बताया कि इस गांव में पिछले 500 साल से इस परंपरा का निर्वहन बदस्तूर जारी है, जिसके पीछे कहानी है. मुगलों की सेना को इस इलाके के रणबांकुरों ने अपने शौर्य और पराक्रम के बल पर शिकस्त दी थी. उसी खुशी में जमराबीज के दिन यहां की अनूठी होली मनाई जाती है.
युद्ध जैसा नजारा : शनिवार रात एक के बाद एक कई तोप आग उगल रही थीं, तड़ातड़ बंदूकें चल रही थीं. उदयपुर के गांव मेनार में यह दृश्य किसी युद्ध का नहीं, बल्कि होली के जश्न का था. मेनार में देर रात तोपों और बंदूकों ने जमकर आग उगली. हर तरफ तलवारें चलती दिखीं. मौका था शौर्य पर्व जमरा बीज का जो बड़े धूमधाम के साथ मनाया गया. वहीं गांव के युवा जो दुबई, सिंगापुर, लंदन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में रहते हैं. वह इस मौके पर सभी गांव पहुंच जाते हैं. पूरा गांव सतरंगी रोशनीयो से एक दुल्हन की तरह सजा धजा था. जमराबीज की रात मेनार कस्बा दिपावली की रंगत में रंगा रहा. शौर्य पर्व जमराबीज का यह पारंपरिक आयोजन मेवाड़ में मुगलों की टुकड़ी पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.

ऐतिहासिक होती हुई होली : रात 9 बजे बाद सभी पूर्व रजवाड़े के सैनिकों की पोशाकों धोती कुर्ता, कसुमल पाग से सजे धजे ग्रामीण अलग अलग रास्तों से ललकारते हुए बंदूक और तलवार लेकर बंदूक दागते हुए सेना के आक्रमण किये जाने के रूप मे चारभुजामंदिर के सामने गांव का मुख्य बाजार ओंकारेश्वर चौक के पहुंचे, जहां ग्रामीणों ने बंदूक और तोप से गोले दागे तथा पटाखों से आतिशबाजी से आग की लपटें निकली जो काफ़ी ऊँचाई तक जा रही थी. तोपों, बंदूकों की गर्जना 5 किलोमीटर दूर तक सुनाई दे रही थी. वहां बारूद से भरी हुई बंदूकों के साथ आदेश की प्रतीक्षा में खड़े रहे. यह रेजिमेंटल सटीकता के साथ इतनी खूबसूरती से तालमेल बिठाता है और 'फेरावत' के एक संकेत पर, चौराहे पर पांच मार्गों पर खड़े लोग एक साथ अपनी बंदूकें हवा में चलाते हैं.जिससे ग्रामीणों को अपना जश्न शुरू करने की अनुमति मिल गयी हो और फिर शाम से शुरू होकर आधी रात के बाद तक बंदूकों, पटाखों या तोपों की गर्जना के बिना एक सेकंड भी नहीं बीतता. तब पांचों रास्तों से गांव बंदूकों, तोपो की आवाज से गूंज उठा, तब युद्ध का परिदृश्य जीवन्त हों उठा और इस बीच पटाखों के धमाकों से दहल उठा ओंकारेश्वर चौक.

इतिहास में समझिए क्यों बनाई जाती है होली : इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा ने बताया कि उदयपुर से तकरीबन 45 किलोमीटर दूर मेनार गांव में जमराबीज के उपलक्ष्य में इस अनूठी होली का आयोजन किया जाता है. इस गांव की होली का अपना एक विशेष इतिहास और परंपराएं जुड़ी हुई हैं. उन्होंने बताया कि जब महाराणा प्रताप ने मुगलों से संघर्ष के लिए हल्दीघाटी के युद्ध की शुरुआत की थी. ऐसे में प्रताप ने मेवाड़ के हर व्यक्ति को उस चेतना से जोड़ते हुए स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया था. इसी के बाद में अमर सिंह के नेतृत्व में मुगल थानों पर हमले किए जा रहे थे.


