7000 लावारिस शव की अंत्येष्टि और भूखों को भरपेट भोजन, समाज सेवा ही विजय कुमार के जीवन का मूल मंत्र
पटना के समाजसेवी विजय कुमार गरीबों और मजदूरों को 20 रुपये में भरपेट खाना खिलाते हैं. 7000 लावारिस लाशों की अंत्येष्टि भी कर चुके हैं.

Published : May 19, 2025 at 7:22 PM IST
पटना: 'बचपन में गरीबी देखी तो एक छोटे से बच्चों के मन ने यह संकल्प लिया कि यदि पैसा होगा तो गरीबों के लिए काम करूंगा', पटना में पिछले 40 वर्षों से समाज सेवा करने वाले विजय कुमार ने साल 1962 में यह संकल्प लिया था. 1985 से उन्होंने राजधानी पटना में गरीबों मजबूरों के लिए नि:स्वार्थ भाव से काम करना शुरू कर दिया. ईटीवी भारत से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि 1978 में वह पटना आए थे. जीएम रोड में थोक दवा की दुकान खोली. वे कहते हैं कि जब दवा की दुकान खोली तो आसपास के लोग पटना आकर उनको ढूंढते हुए मेरी दुकान आ जाते थे. लोगों को लगता था कि मैं उनको मदद करूंगा.
1985 से शुरू हुआ संघर्ष: विजय कुमार बताते हैं कि जब वह पटना आए थे तो पीएमसीएच किसी काम से गए थे. इमरजेंसी वार्ड के नीचे उन्होंने एक लाश देखी थी. जब उन्होंने इमरजेंसी के एक स्टाफ से पूछा तो पता चला कि यह लावारिस लाश है. उसे समय उन्हें यह भी पता नहीं था कि लावारिस लाश क्या होता है? लावारिस लाश के बारे में जब उन्होंने एक डॉक्टर से पूछा तो पता चला कि 72 घंटे के बाद ही ऐसी लाशों का अंतिम संस्कार होता है.

ऐसे में उनको उस लाश को लेकर उनके मन में उत्सुकता जगी और तीन दिन के बाद उसका अंतिम संस्कार हुआ. तीन दिनों के बाद जब वह अंतिम संस्कार के समय वह मौजूद थे तो उन्होंने देखा कि अंतिम संस्कार के नाम पर मात्र खानापूर्ति की जाती है. उन्हें अच्छा नहीं लगा कि मरने के बाद किसी इंसान के शव का सही तरीके से अंतिम संस्कार नहीं हुआ. उसी दिन से उन्होंने प्रण लिया कि सभी शवों का अंतिम संस्कार रीति-रिवाज से होगा. इसके लिए उन्होंने रेड क्रॉस सोसाइटी से संपर्क किया, उस समय एसबी सिंह निदेशक थे.
7000 लावारिस लाश का किया अंतिम संस्कार: ईटीवी भारत से बातचीत में विजय कुमार ने बताया कि 1985 की यह घटना है. लावारिस लाशों को लेकर उन्होंने प्रशासन के साथ कई दौर की बातचीत की. 2006 में बिहार के मुख्य सचिव जेएस कंग थे, वहीं वर्तमान में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार उस समय स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव थे. रेड क्रॉस सोसाइटी को पत्र को लेकर मुख्य सचिव एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव के पास लगातार संपर्क में रहे. 2006 में उन्हें स्वास्थ्य विभाग से अनुमति मिल गई कि लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार विजय कुमार कर सकते हैं.
"2006 में स्वास्थ्य विभाग की अनुमति मिलने के बाद लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का सिलसिला चल पड़ा, जो जीवन के अंतिम क्षण तक चलता रहेगा. अब तक करीब 7000 के आसपास लावारिस लाशों का वह अंतिम संस्कार कर चुके हैं."- विजय कुमार, समाजसेवी

'विजय जी' के नाम से मशहूर: विजय कुमार ने बताया कि लावारिस लाशों को लेकर उनका आना-जाना पटना के पीएमसीएच में होने लगा. उसी में उन्होंने देखा कि अस्पताल में बहुत से ऐसे गरीब मरीज मिले, जिनके साथ कोई नहीं था. अस्पताल में बहुत गरीब तबके के लोग इलाज करवाने के लिए आते थे. अस्पताल प्रशासन की तरफ से हर चीज देना संभव नहीं था. अस्पताल के स्टाफ भी अब उन्हें लावारिस लाश वाले विजय जी के नाम से जानने लगे.
6 बेड का एक एसी रूम आवंटित: विजय कुमार ने बताया कि उस समय स्वास्थ्य विभाग में व्यास जी अधिकारी बन कर आए थे. उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि लावारिस लाशों को रखने के लिए एक जगह उपलब्ध करवा दी जाए, क्योंकि 72 घंटे तक लावारिस लाशों को रखा जाता है. उन्होंने 6 बेड का एक वातानुकूलित रूम आवंटित कर दिया. जिसमें अनक्लेमड लाशों को 72 घंटे तक रखा जाने लगा. इसी के बाद पीएमसीएच में जरूरतमंद मरीजों को हर संभव मुफ्त में खाना पहुंचाने का काम शुरू किया, जो अभी तक अनवरत चल रहा है.

सेवा भाव के कारण दिक्कत नहीं: मरीज को मुफ्त में खाना एवं लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए पैसे कहां से आने के सवाल पर विजय कुमार ने कहा कि सेवा भाव यदि मन में हो तो पूर्ति हो जाती है. उन्होंने गरीब लोगों के लिए भोजन की जो व्यवस्था की है, उसके लिए भामाशाह सेवा केंद्र नाम रखा है. जब मन में सेवा का भाव रहता है तो लाभ और हानि नहीं देखा जाता. लाभ और हानि व्यापार में देखा जाता है. उन्हें लग रहा है कि उनके इस काम में ईश्वर उनकी मदद कर रहे हैं.
गरीबी में बीता बचपन: विजय कुमार ने एक ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि वे पटना के बाढ़ अनुमंडल के दरवे बतौर के रहने वाले हैं. 1962-63 में पूर्णिमा स्नान करने के लिए बाढ़ आए थे. 2 रुपये लेकर वह अपनी अपनी दादी, मां और छोटे भाई के साथ गंगा स्नान करने के लिए आए थे. बाढ़ स्टेशन पर रात में ठहरे हुए थे. स्टेशन के बगल में एक छोटी सी खाना की दुकान थी. उस समय सवा रुपये में एक सेर रोटी तौल के बिकता था. पूर्णिमा के स्नान के दौरान गुड़ की जलेबी सभी लोग खाए थे. उस समय गरीब गुड़ की जलेबी और बड़े आदमी चीनी की जलेबी खाते थे. आधा किलो गुड़ की जलेबी खाने के बाद उन लोगों के पास मात्र 14 आना पैसा बचा था. बाढ़ स्टेशन पर 10 आना का आधा सेर रोटी खरीदे थी.

रोटी लेकर चला गया कुत्ता: विजय कुमार ने बताया कि 10 आने की रोटी खरीदने के बाद जब वह लोग खाना खाने के लिए एक साथ बैठे थे. तभी पानी लाने के क्रम में वह रोटी लेकर कुत्ता भाग गया. पैसा नहीं था कि रोटी खरीदता. वह कहते हैं कि याचक बनकर उसी दुकान के पास गया. अपनी बात बताई तो दुकानदार ने मुफ्त में 5 रोटियां दी. एक-एक रोटी खाकर सबों ने रात गुजारी. इस वक्त उन्होंने मन में सोचा कि जिस दिन भगवान उन्हें कुछ लायक बनाएंगे तो मजबूरों और लाचारों के लिए काम करेंगे. गरीब और लाचारों के लिए सस्ते खाने की व्यवस्था करेंगे.
भामाशाह भोजन केंद्र की स्थापना: साल 2006 में विजय ने लाचार और गरीब लोगों के लिए भामाशाह भोजन केंद्र की शुरुआत की. इस केंद्र में आज भी मात्र 20 रुपये में लोगों को खाना खिलाया जाता है. वे कहते हैं, 'इस भोजन केंद्र पर मजदूर, रिक्शा चालक, ठेला चालक, छात्र और अन्य जरूरतमंद लोग भी आकर खाना खाते हैं'.

'भोजन केंद्र में सबसे सस्ता खाना': भामाशाह भोजन केंद्र में बड़ी संख्या में मजदूर वर्ग के लोग खाना खाने आते हैं. यहां आने वाले लोग भोजन की गुणवत्ता से संतुष्ट नजर आए. वे कहते हैं कि कम दाम में इतना खाना मिलता है कि पेट भर जाता है. खाना का स्वाद भी अच्छा रहता है. आज के जमाने में इतना सस्ता खाना कहीं नहीं मिलता है.
"हम तो मजदूरी का काम करते हैं. आमदनी उतनी नहीं है कि महंगे होटल में जाकर खाना खा सकें. यहां खाना खाने के लिए आते हैं तो 20 रुपये में पेट भर भोजन मिल जाता है और खाना भी अच्छा रहता है."- पप्पू कुमार, मजदूर
सभी जिलों में भोजनालय खोलने की मंजूरी: विजय कुमार ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि उन्होंने इसी तरीके का भोजनालय अन्य जगहों पर खोलने के लिए सरकार से अनुमति मांगी थी. मुख्य सचिव से उन्होंने मुलाकात की और उन्होंने कहा कि मैंने गरीबी को करीबी से देखी है, इसलिए गरीबों के लिए पूरे बिहार में इस तरीके की व्यवस्था करना चाहते हैं. आखिरकार 7 अप्रैल को भोजनालय खोलने की मंजूरी मिल गई है.
"मुख्य सचिव ने मुझसे पूछा था कि आपने गरीबी देखी है तो गरीबों का पैमाना क्या होता है? इस पर मैंने कहा कि मेरी नजर में गरीबी का पैमाना जो बस में ट्रेन में सफर करते हैं. जो कोर्ट में केस लड़ते हैं. रेलवे स्टेशन पर रुकते हैं, उनकी नजर में वही गरीब है. मुझे खुशी है कि मेरे अनुरोध को 7 अप्रैल को मंजूरी मिल गई."- विजय कुमार, संचालक, भामाशाह भोजन केंद्र

सभी जिलों में जल्द खुलेंगे भोजनालय: विजय कुमार ने बताया सरकार की तरफ से सभी नगर निगम, नगर पंचायत और नगर परिषद में पत्र के माध्यम से ऐसे ही भोजनालय खोलने की अनुमति दी गई है. हर जगह से अब उनको फोन आ रहा है कि उनके यहां आकर भामाशाह भोजनालय शुरू करें. बिहार के सभी जिलों में दो से तीन जगह ऐसे ही भोजनालय बहुत जल्द खोले जाएंगे. राजधानी पटना में 20 से 25 जगह पर ऐसा ही भोजनालय वह जल्द शुरू करेंगे.
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