पानी और सड़क से महरूम पटपरटोला: 'राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों' का गांव अब भी तरस रहा मूलभूत सुविधाओं के लिए
पंडो जनजाति के लोगों की शिकायत है कि उनकी मांगों पर दशकों से जनप्रतिनिधि ध्यान नहीं दे रहे हैं.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : May 20, 2025 at 1:55 PM IST
मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर: भरतपुर वनांचल के गढ़वार पंचायत के आश्रित ग्राम पटपरटोला की आबादी करीब 200 है. यहां आज भी पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से लोग वंचित हैं. बरसात में तो यह गांव दलदल में तब्दील हो जाता है.
गांव की हालत बदतर: पटपरटोला कोई आम गांव नहीं, बल्कि 'राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों' के रूप में पहचाने जाने वाले पण्डो परिवारों का बसेरा है. ग्रामीण तेंदूपत्ता और दूसरी वनोपज इकट्ठा करते हैं. थोड़ी बहुत खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि गांव की हालत किसी उपेक्षित बस्ती से भी बदतर है.
पगडंडी से तय होता है जीवन का सफर: गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं. कच्ची पगडंडी से होकर ही ग्रामीण अपने दैनिक कार्यों के लिए बाहर जाते हैं.
बरसात में यह रास्ता दलदल बन जाता है. चार पहिया क्या, दोपहिया वाहन भी नहीं चल सकते। बीमार को अस्पताल ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है-शेषमान पण्डो,ग्रामीण
सड़क पानी की भी नहीं सुध: गांव के युवा संतोष कुमार पण्डो बताते हैं, ''गांव में न सड़क है, न पीने का पानी. महिलाओं और बच्चों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है. सड़क की मांग पर अधिकारी बस आश्वासन देते हैं.''
स्कूल जाने वाले बच्चों को टूटी फूटी पगडंडियों से गुजरना पड़ता है. कई बार गिरने से घायल हो जाते हैं, लेकिन फिर भी पढ़ाई का सपना नहीं छोड़ते-छोटू पण्डो, ग्रामीण
सरपंच की गुहार: गांव की स्थिति पर सरपंच रामफल पण्डो भी बेहद आहत हैं. उनका कहना है, ''मैंने पंचायत, जनपद, कलेक्टर, विधायक, मंत्री सबसे मिलकर पटपरटोला के लिए सड़क और पानी की मांग की है. आवेदन भी दिए, कई बार दौरे भी कराए. लेकिन नतीजा शून्य. अफसर सिर्फ आश्वासन देते हैं.''
महिलाएं बोलीं 'हमने तो सरकार देखना ही छोड़ दिया': गांव की महिला मानमती बाई कहती हैं, ''जब हर दिन पीने का पानी लाने में ही घंटे लगते हैं, तब और कुछ सोचने की फुर्सत कहां मिलती है? कई बार शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं बदला. अब तो उम्मीद भी नहीं रही.''
और गांव का भी हाल बेहाल: पटपरटोला भरतपुर वनांचल का अकेला ऐसा गांव नहीं है. दर्जनों गांव आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहे हैं. सरकार की योजनाएं फाइलों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं और अधिकारी विकास के नाम पर सिर्फ आंकड़ों की जुगलबंदी कर रहे हैं.

