बिहार चुनाव में 'आधी आबादी' बनेंगी गेमचेंजर! सवाल- नीतीश पर भरोसा या तेजस्वी को मिलेगा मौका?
बिहार चुनाव में महिला मतदाता फिर निर्णायक भूमिका निभाने जा रही हैं. जनता नीतीश के काम और तेजस्वी यादव के पैकेज किस पर करे विश्वास.

Published : August 25, 2025 at 4:44 PM IST
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है और इस बार भी महिलाओं का वोट निर्णायक भूमिका निभाने जा रहा है. पिछले कुछ चुनावों में महिला वोटरों ने पुरुषों से अधिक संख्या में मतदान कर अपनी राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी का परिचय दिया है. यही वजह है कि सभी दल महिलाओं को लुभाने के लिए विशेष रणनीति पर काम कर रहे हैं.
तेजस्वी के वादे बनाम नीतीश की योजनाएं: नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने महिलाओं के लिए 'माई बहिन योजना' जैसी योजनाओं के तहत 70,000 करोड़ रुपये की सौगात देने का वादा किया है. इसमें हर महिला को 2500 की सहायता, रसोई गैस सिलेंडर 500 में और विधवा पेंशन 1500 करने जैसे वादे शामिल हैं.
सत्ता की चाबी अब महिलाओं के हाथ: बिहार की राजनीतिक फिजा में महिलाओं की भूमिका अब अहम हो गया है. वे अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक बन चुकी हैं. हर पार्टी को यह समझना होगा कि आधी आबादी को नजरअंदाज कर अब कोई सत्ता के दरवाजे तक नहीं पहुंच सकता. अब देखने वाली बात यही होगी कि महिला मतदाता इस बार किसके पक्ष में भरोसा जताती हैं नीतीश के अनुभव या तेजस्वी के वादे?
चुनाव में आधी आबादी का पूरा असर: राजनीतिक विश्लेषणों के मुताबिक पिछले चुनावों में महिला वोटों का रुझान एनडीए और खासकर नीतीश कुमार के पक्ष में ज्यादा रहा है. इस बार भी यही सवाल चर्चा में है कि महिलाएं किसके पक्ष में भरोसा जताएंगी. महिलाओं का मत इस बार भी 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव इस बात को भली-भांति समझते हैं, इसलिए वे अपने हर अभियान में महिलाओं को केंद्र में रख रहे हैं.

महिला वोट बने चुनाव का टर्निंग पॉइंट: जदयू प्रवक्ता अंजुम आरा ने तेजस्वी यादव के दावों को खारिज करते हुए कहा कि वे 'खुशफहमी' में जी रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए जो योजनाएं चलाई हैं, वह किसी भी वादे से कहीं अधिक ठोस हैं. उन्होंने पंचायत में 50% आरक्षण, शराबबंदी, साइकिल योजना, पोशाक योजना, ग्रेजुएशन तक 50,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि जैसी योजनाओं का उल्लेख किया, जिससे महिला सशक्तिकरण को नई दिशा मिली है.
फैसला करेगी महिला जागरूकता: अंजुम आरा ने यह भी कहा कि बिहार पुलिस में महिलाओं की भागीदारी देश में सबसे ज्यादा है और यह नीतीश कुमार की दूरदर्शिता का परिणाम है. विधवाओं को 1100 की मासिक पेंशन, महिलाओं को रोजगार में आरक्षण जैसी पहलें नीतीश सरकार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि जब महागठबंधन की सरकार थी, तब महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ और राज्य अराजकता की ओर बढ़ा.

"ये सब बौखलाहट में किए गए वादे हैं और महिलाएं अब समझदार हो गई हैं. उन्हें पता है कि उनके भविष्य की सुरक्षा और सम्मान नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही संभव है. अंजुम आरा ने कहा कि महिलाओं ने 2005 से लगातार समझदारी से मतदान किया है और इस बार भी कोई भ्रम में नहीं आएंगी."-अंजुम आरा, जदयू प्रवक्ता
महिलाओं को लुभाने की होड़ में सभी दल:पटना कॉलेज के राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर चंद्रभूषण राय का मानना है कि इस बार भी महिला वोट एक निर्णायक फैक्टर होगा. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का लंबे समय से महिलाओं को केंद्र में रखकर किया गया काम चाहे वह पंचायत में आरक्षण हो या नौकरियों में आरक्षण ने एक स्थायी महिला वोट बैंक तैयार किया है. उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव उसी वोट बैंक को खींचने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि चुनाव इस बार अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है.

मतदाता नहीं अब निर्णायक बनीं: राजनीतिक विश्लेषक प्रिय रंजन भारती ने पिछले चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2005 से 2024 तक महिला वोटर का झुकाव एनडीए की ओर ज्यादा रहा है. 2010 में 39% महिलाओं ने एनडीए को वोट दिया था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी 38% महिलाओं ने एनडीए का समर्थन किया. इसके विपरीत महागठबंधन को महिलाओं का 36-37% वोट ही मिला है.
"महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कानून व्यवस्था है और नीतीश कुमार की सरकार में इस पर विशेष ध्यान दिया गया. यही कारण है कि महिलाएं नीतीश कुमार को ज्यादा भरोसेमंद मानती हैं. दूसरी ओर तेजस्वी यादव रक्षाबंधन के दिन 70,000 करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं जिसमें 'माई बहिन योजना', विधवा पेंशन में वृद्धि और रसोई गैस सिलेंडर पर सब्सिडी जैसी बातें शामिल हैं." -प्रिय रंजन भारती, राजनीतिक विश्लेषक
चुनावी रण में महिला वोटों की निर्णायक भूमिका: तेजस्वी यादव की 'माई बहिन योजना' के तहत हर पात्र महिला को 2500 देने का वादा किया गया है. इसके अलावा विधवा पेंशन को 1500 रुपये तक बढ़ाने, हर रसोईघर में 500 रुपये में गैस सिलेंडर देने और 'बेटी प्रोग्राम' के जरिए जन्म से लेकर आमदनी तक सहयोग देने की बातें कही गई हैं.

चुनाव में महिला टिकट का खेल: हालांकि, जब बात महिलाओं को टिकट देने की आती है, तो सभी दल पीछे नजर आते हैं. 2020 के चुनाव में जदयू ने 22 महिलाओं को टिकट दिया था, जबकि आरजेडी ने सिर्फ 16 महिलाओं को मैदान में उतारा था. सबसे अधिक 9 महिला उम्मीदवार बीजेपी से जीतकर आईं, जबकि जदयू से 6, आरजेडी से 7, कांग्रेस से 2, हम और वीआईपी से 1-1 महिला विधायक जीत सकीं.
राजनीतिक भागीदारी: महिला विधायकों की संख्या में गिरावट भी एक चिंता का विषय है. 2010 में जहां 34 महिलाएं विधानसभा पहुंचीं, वहीं 2015 में यह संख्या घटकर 28 रह गई और 2020 में केवल 26 महिला विधायक चुनकर आईं. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या केवल वोट के समय ही महिलाओं की अहमियत याद आती है या राजनीतिक भागीदारी में भी उनका वाकई कोई स्थान है?

हर दल की नजरें टिकीं: बिहार में महिलाओं की भागीदारी और राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है, लेकिन यह केवल मतदान तक सीमित न रहे, इसके लिए सभी दलों को टिकट आवंटन और नेतृत्व के स्तर पर महिलाओं को जगह देनी होगी. वरना यह धारणा बनती जाएगी कि महिलाएं केवल एक वोट बैंक हैं, जिन्हें सिर्फ चुनाव के समय ही याद किया जाता है.

घोषणाओं और वादों की भरमार: बहरहाल, इस बार का चुनाव महिलाओं के लिए घोषणाओं और वादों की भरमार लेकर आया है. एक तरफ नीतीश कुमार अपनी पूर्व योजनाओं और प्रशासनिक उपलब्धियों को गिनवा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव नए वादों और योजनाओं से भरोसा जीतने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अंतिम फैसला तो महिलाओं के हाथ में ही है कि वे अनुभव को तरजीह देती हैं या उम्मीदों को.
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