मुहर्रम आज, कौन थे ईमाम हुसैन, कर्बला युद्ध से क्या है इसका नाता, जानें सबकुछ
ईमाम हुसैन की शहादत की याद में आज मोहर्रम मनाया जा रहा. गम और सब्र के इस महीने से कर्बला युद्ध का इतिहास जुड़ा है.

Published : July 6, 2025 at 8:09 AM IST
|Updated : July 6, 2025 at 12:35 PM IST
पटना: 10 दिनों तक चलने वाला मुहर्रम का आज 10वां दिन है. गम और सब्र के इस त्योहार का बड़ा इतिहास है. मुहर्रम के 10वें दिन ताजिया जुलूस निकाल कर इस्लाम से जुड़े लोग मातम मनाते हैं. इसमें शिया और सुन्नी के लोग अलग-अलग तरीके से मुहर्रम मनाते हैं, लेकिन दोनों इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं.
अली हुसैन की गूंज: मुहर्रम का महीना आते ही शहर से लेकर गांव तक गलियों में अली हुसैन की गूंज सुनाई देती है. इस पूरे महीने ना तो किसी के घर में शादी होती है और ना ही कोई खुशियां मनायी जाती है. मुहर्रम को एक गम के रूप में मनाया जाता है.
कौन थे इमाम हुसैन: इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब, जिन्हें इस्लाम के अंतिम पैगंबर मनाया जाता है. इमाम हुसैन पैगंबर साहब के नवासे (पुत्री का पुत्र यानि नाती) थे. कर्बला के युद्ध में इमाम हुसैन शहीद हो गए थे, जिनकी याद में गमों का पर्व मुहर्रम मनाया जाता है.
ताजिया जुलूस: मुहर्रम के 10वें दिन ताजिया जुलूस निकाला जाता है. ताजिया इमाम हुसैन के कब्र का एक प्रतीक है. इमाम हुसैन का मकबरा यानी रोजा-ए मुबारक जो इराक देश के कर्बला में स्थित है.
"ताजिया पैगंबर मोहम्मद साहब के वारिस इमाम हुसैन के शोक का प्रतीक है. जिसे पूरे शिद्दत के साथ सभी अल्लाह के बंदे इसे बनाते हैं. मोहर्रम के दिन हर मुस्लिम मोहल्ले से अखाड़ा निकाला जाता है. मोहर्रम में ताजिया का खास महत्व माना गया है, क्योंकि ताजिया शोक का प्रतीक है. मसौढ़ी हूसैनाबाद मे जोर शोर से ताजिया बनाया जा रहा है." -मोहम्मद खुर्शीद आलम, खलीफा

कर्बला का युद्ध: इराक के कर्बला में 680 ई. में इस्लाम धर्म की रक्षा के लिए युद्ध लड़ा गया था. इसके पीछे की कहानी है कि 680 में यजीद (जालिम और लालची शासक) ने राज शुरू किया. वह सबसे ताकतवर खलीफा (उत्तराधिकारी, शासक या नेता) बनना चाहता था. वह चाहता था कि इस्लाम को मानने वाले लोग उसे अपना अल्लाह समझे.
यजीद इस्लामिक लोगों से गुलामी कराना चाहता था, जिसका इमाम हुसैन ने विरोध किया था. विरोध के बाद यजीद और इमाम हुसैन के बीच जंग छिड़ गयी. इमाम हुसैन के पास सेना कम थी, लेकिन वे पीछे नहीं हटे. अपने 72 साथियों के साथ यजीद के 8 हजार सैनिकों से मुकाबला करने के लिए पहुंच गए.
"इमाम हुसैन मदीना से इराक आए थे. कर्बला की जंग में वह अपने 72 साथियों के साथ शहीद हो गये थे. तकरीबन 8000 सैनिकों की फौज उन पर टूट पड़े. उसी कुर्बानी से अब तक इस्लाम धर्म मानने वाले लोग मोहर्रम को मातम के रूप में मनाते हैं." -मो. मेराज, जदयू अलपसंख्यक नेता
इमाम हुसैन और उनके परिवार को कर्बला के रेगिस्तान में घेर लिया गया. इमाम हुसैन और उनके साथ यजीद के गुलाम बनने से अच्छा शहीद होना चाहते थे. भूखे प्यासे यजीद के फौज से लड़ते-लड़ते अपने 72 साथियों के साथ शहीद हो गए. इमाम हुसैन जिस दिन शहीद हुए, उसे आशूरा भी कहते हैं.
इमाम हुसैन की याद में ही मुर्हम 1 से 10 दिनों तक चलता है. 10वें दिन उनकी याद में लोग भूखे-प्यासे गम मनाते हैं. इमाम हुसैन की याद में पटना के मसौढी में 14 जुलूस निकाले जाएंगे. हर एक जुलूस के साथ पुलिस पदाधिकारी की तैनाती की जाएगी. ड्रोन कैमरे से निगरानी की जाएगी.
शिक्षक मों मंजर शादाब ने कहा कि मोहर्रम का पैगाम शांति और अमन ही है, जो युद्ध रोक देता है. युद्ध कुर्बानी मांगता है, लेकिन मुहर्रम धर्म और सत्य के लिए घुटने टेकने का संदेश देता है. मुहर्रम जुलूस में खलीफा - मोहम्मद खुर्शीद आलम ,मोहम्मद अजहरुद्दीन उर्फ बबन, गोल्डन , रहमान, मिनहाज, दानिश, मुर्तजा, तहसीन, सोनू, शमशेर, शौकत, गोरख, अखलाक, बादशाह, रुस्तम, सरफराज, चुन्नू जी, बउआ, प्रिंस, बड़े मियां , फैजान, इम्तियाज,दिलशाद, अली, अरमान, रहमान, शामिल रहेंगे.
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