धार्मिक उल्लास और आस्था का संगम: रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से निकली भव्य रथ यात्रा
रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली गई. श्रद्धालुओं ने आस्था के संगम में डुबकी लगाई.


Published : June 27, 2025 at 7:56 PM IST
रांची: राजधानी रांची के धुर्वा स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर से गुरुवार को भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा निकाली गई. हर वर्ष की तरह इस बार भी यह आयोजन पूरी (ओडिशा) की परंपरा के अनुरूप किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान की भक्ति में अपने को समर्पित कर दिया.
सीएम का संदेश
गौरतलब हो कि इस दौरान कांग्रेस के नेता आलोक दुबे ने मंच से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का संदेश सुनाया. उन्होंने भक्तों को सीएम के पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के अस्वस्थ होने की सूचना दी. साथ ही उन्होंने कहा कि वह जल्द स्वस्थ हो प्रभु जगन्नाथ से ही कामना है. फिलहाल शिबू सोरेन दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भर्ती है. जहां उनका इलाज चल रहा है. बता दें कि प्रत्येक वर्ष जगन्नाथपुर रथ यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पूजा स्थल पर जरूर पहुंचते थे. इस बार उनके पिता शिबू सोरेन दिल्ली में इलाजरत है. इसलिए वह उपस्थित नहीं हो पाए.
आज महाप्रभु भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा का ऐतिहासिक और पावन महापर्व होता है।
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) June 27, 2025
हर साल मैं वहां उपस्थित होता था। अभी आदरणीय बाबा दिशोम गुरुजी अस्वस्थ हैं इसलिए मैं रथयात्रा में शामिल नहीं हो पाया हूँ।
भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करता हूँ कि आदरणीय गुरुजी जल्द से जल्द स्वस्थ होकर… pic.twitter.com/TO7yroamRN
सुबह से ही मंदिर परिसर में रौनक
सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी थी. विशेष पूजा-अर्चना और महाभोग अर्पण के बाद भगवान को सजे-धजे रथ पर विराजमान कराया गया. इसके बाद आरती, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच रथ यात्रा का विधिवत शुभारंभ हुआ.
मौसी बाड़ी के लिए हुए रवाना
भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ मौसी बाड़ी (गुंडिचा मंदिर) के लिए रवाना हुए. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपनी मौसी के घर जाते हैं और वहां दस दिनों तक विश्राम करते हैं. इस दौरान भगवान मंदिर में नहीं, बल्कि मौसी बाड़ी में ही श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं. यात्रा के दौरान भक्तों ने रथ की रस्सियों को पकड़कर स्वयं खींचते हुए भगवान को उनके गंतव्य तक पहुंचाया. इस कार्य को भाग्यशाली और पुण्य का कार्य माना जाता है. इस दौरान जय जगन्नाथ के जय घोष से पूरा माहौल भक्तिमय दिखा.

श्रद्धालुओं का जनसैलाब, उमड़ी भीड़
इस पावन अवसर पर राज्य के विभिन्न जिलों से हजारों श्रद्धालु पहुंचे. महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने पारंपरिक वस्त्र पहनकर रथ यात्रा में भाग लिया. पूरा वातावरण "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंज उठा. श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचते हुए भक्ति में लीन दिखे. मंदिर प्रांगण से लेकर मौसी बाड़ी तक रास्ते के दोनों ओर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें दिखीं.

इस बार भी अन्य प्रदेशों से व्यापारी और श्रद्धालु मेले में पहुंचे, जिससे मेले की रौनक कई गुना बढ़ गई. जगह-जगह भक्ति संगीत, ढोल-नगाड़ों और झांकियों ने माहौल को और भी भव्य बना दिया.

सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
रथ यात्रा को देखते हुए प्रशासन ने विशेष सुरक्षा व्यवस्था की थी. मेला परिसर और रथ मार्ग पर महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी. किसी भी वाहन की मेला क्षेत्र में एंट्री पूरी तरह से प्रतिबंधित थी. ट्रैफिक को रूट डायवर्ट कर दिया गया था ताकि भीड़ नियंत्रण में रहे और किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो. इसके अलावा आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता भी सुरक्षा व्यवस्था और भक्तों को सहयोग देने के लिए जगह-जगह तैनात दिखे.

सांस्कृतिक विरासत की झलक
रथ यात्रा के साथ लगे मेला परिसर में भी जबरदस्त चहल-पहल रही. बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें, महिलाओं के लिए श्रृंगार और बड़ों के लिए विभिन्न मनोरंजन के साधन मौजूद थे. खाने-पीने की दुकानों से लेकर धार्मिक साहित्य तक—हर किस्म की दुकानें सजी थीं. मेले में झारखंड की लोक संस्कृति और धार्मिक विरासत की झलक साफ दिखी.

6 जुलाई को लौटेंगे भगवान
रथ यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा मौसी बाड़ी में अगले दस दिनों तक विश्राम करेंगे. 6 जुलाई को तीनों विग्रह मुख्य मंदिर लौटेंगे, जिसे घूरती रथ यात्रा कहा जाता है. तब तक मेला परिसर भक्तों से गुलजार रहेगा और धार्मिक गतिविधियों का सिलसिला चलता रहेगा. इस भव्य आयोजन में कोई वीआईपी संस्कृति नहीं दिखी. आम लोगों की तरह कई गणमान्य और विशिष्ट अतिथि भी सादगी से रथ यात्रा में शामिल हुए और भगवान के दर्शन किए.

जगन्नाथपुर मंदिर से निकली रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक है. रांची में यह परंपरा न सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन चुकी है, बल्कि हर वर्ष इसकी भव्यता और धार्मिक गहराई लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है.
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