कभी देश भर में देते थे प्रस्तुति, अब विलुप्त हो रही बुंदेलखंड की शेर नृत्य परंपरा
बुंदेलखंड में करीब दो सदी पहले शुरू हुआ था शेर नृत्य का चलन. एक समय महाराष्ट्र के कोल्हापुर और अमरावती में भी था खासा लोकप्रिय.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : October 1, 2025 at 10:52 AM IST
|Updated : October 1, 2025 at 1:31 PM IST
दमोह: बुंदेलखंड का प्रसिद्ध लोक नृत्य "शेर" जिसका एक समय में भारत भर में डंका बजता था. लेकिन तकनीक के इस युग में टेलीविजन, मोबाइल तथा इंटरनेट आने के बाद से यह लोक कला अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है. जिसको पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे है. हालांकि इसका स्याह पक्ष यह भी है कि दिन भर शहर की सड़कों पर घूम कर नृत्य करने वाले इन युवाओं को पारितोषिक के नाम पर मात्र 5-10 रुपए ही मिलते हैं. कभी उन्हें वह सम्मान और पारितोषिक नहीं मिला जिसके वह वास्तविक हकदार हैं.
कभी बुंदेलखंड से महाराष्ट्र तक था प्रसिद्ध
वैसे तो नवरात्रि पर्व पूरे देश में उत्साह और श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इस पर्व को लेकर अपनी अलग ही मान्यताएं हैं. यहां धर्म के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास काफी गहरा है. इसी आस्था और विश्वास के कारण करीब 2 शताब्दी से भी पहले शेर नृत्य का चलन शुरू हुआ था जो अभी तक जारी है. टेलीविजन आने के बाद जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते गए शेर नृत्य भी विलुप्त होने लगा. आजादी के दरमियान यह नृत्य इतना अधिक प्रचलित था कि बुंदेलखंड से मालवा होते हुए यह महाराष्ट्र के कोल्हापुर और अमरावती में भी खासा लोकप्रिय हो गया.
रंग चढ़ने के बाद दिखते हैं असली शेर
विलुप्त प्राय: हो चुके शेर नृत्य को जीवित करने के लिए करीब 15 वर्ष पहले युवा जागृति मंच ने नए सिरे से शुरुआत की. पहले पहल तो युवा नृत्य सीखने और करने के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन जब उन्हें उसके ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया तो वे इसमें रूचि लेने लगे. आज दमोह में करीब 70 से अधिक युवा शेर नृत्य के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके हैं और अब वे अपने बच्चों को भी इस कार्य के लिए तैयार कर रहे हैं.
मूलतः शेर नृत्य बाल्मीकि समाज के लोग करते हैं, और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. इस नृत्य के जरिए बाल्मीकि समाज के लोग नवरात्रि पर्व पर शेर की वेशभूषा में नृत्य करते हैं. वह अपने पूरे शरीर पर हल्दी इत्यादि से तैयार किया गया पीला लेप लगाते हैं तथा शरीर पर काली धारियां बना लेते हैं. मुंह पर शेर का मुखौटा, सिर पर बाल तथा पूंछ लगाते हैं. इसके अलावा लोहे से बनी हुई एक लंबी लाल रंग की जीभ लगा कर अपने आप को हूबहू शेर और बाघ की शक़्ल देते हैं. सबसे पहले ये युवा दिवाला पर माता के दरबार में हाजिरी लगाकर पूजन करते हैं उसके बाद ढोल नगाड़ों की धुन पर शहर भ्रमण करते हैं. ऐसी मान्यता है कि ये युवक शेर के रूप में माता रानी का वरद पाने के लिए यह नृत्य करते हैं.
माता को मनाने करते हैं शेर नृत्य
शेर अखाड़े के उस्ताद रघुनंदन बाल्मिक कहते हैं "करीब डेढ़ सौ साल पहले उनके परदादा गरीबे प्रसाद से यह परंपरा चली आ रही है. वह स्वयं चौथी पीढ़ी के उस्ताद हैं. पहले के जमाने में जंगल में जाकर के नृत्य किया करते थे और माता रानी का आशीर्वाद पाते थे. लेकिन अब जंगल बचे नहीं हैं, इसलिए शहरों में ही यह नृत्य करके माता रानी का आशीर्वाद लेते हैं." रघुनंदन बताते हैं कि शेर को कौन सा रंग चढ़ाया जाता है इसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है लेकिन जब रंग लगा दिया जाता है तो हूबहू वही रंग दिखता है जो असल में शेर का होता है. फिलहाल अखाड़े में चार दर्जन से ज्यादा युवा शेर नृत्य कर रहे हैं, जबकि कुछ नए लड़के इस कला को सीख रहे हैं.
विरासत को बचाने के लिए सरकार दे फंड
युवा जागृति मंच के अध्यक्ष अधिवक्ता नितिन मिश्रा कहते हैं "विलुप्त होती इस परंपरा के संरक्षण के लिए ही करीब 15 वर्ष पहले उन्होंने इसकी शुरुआत करवाई थी. युवा पीढ़ी तो लगभग इस नृत्य को भूल ही चुकी है. लेकिन अब नवरात्रि में इसकी शुरुआत होने पर लोग इसके महत्व को समझने लगे हैं. दु:खद पहलू यह भी है कि सरकार लोक कलाओं को सहेजने में लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर रही है लेकिन बुंदेलखंड की इस विशेष लोक कला के लिए कोई फंड नहीं दे रही है. जबकि इसकी सजावट सामग्री काफी महंगी आती है और बहुत पैसा खर्च होता है."

