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नक्सलियों और अफीम तस्करों के लिए खास है ये जंगल, कब्जे को लेकर टीएसपीसी-माओवादियों में होती रही खूनी जंग!

पलामू, चतरा और गया (बिहार) सीमा का घना जंगल नक्सलियों और अफीम तस्करों का पनाहगाह बना हुआ है.

Know why forest of Chatra and Gaya border in Palamu is hideout for Naxalites and opium smugglers
नक्सलियों के खिलाफ अभियान (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : September 16, 2025 at 4:31 PM IST

4 Min Read
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पलामूः जिला में नक्सलियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है. हालिया हुए मुठभेड़ के बाद अब नक्सली जंगलों के बीच जा छुपे हैं. ये कोई आम जंगल नहीं है, 30 किमी तक फैला ये घना जंगल नक्सलियों और अफीम तस्करों के लिए छुपने की मुफीद जगह है.

पलामू, चतरा और बिहार के गया की सीमा 30 किलोमीटर में फैला जंगल नक्सली और अफीम के तस्करों के पनाहगाह (पनाहगार) बना हुआ है. इस इलाके में सुरक्षा बल अपनी पकड़ को मजबूत बनाने के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं. पिछले एक वर्ष में आठ बार से अधिक मुठभेड़ हो चुकी है.

जानकारी देते एएसपी अभियान (ETV Bharat)

इस इलाके को नक्सलियों से मुक्त कराने को लेकर पुलिस और सुरक्षा बलों ने एक बड़ा सर्च अभियान शुरू किया है. इस सर्च अभियान में कोबरा, जगुआर का एसॉल्ट ग्रुप और जिला बल को तैनात किया गया है. यह जंगल पलामू के मनातू, तरहसी, पिपराटांड़, चतरा के लावालौंग, कुन्दा, प्रतापपुर बिहार के गया के सलैया, इमामगंज तक फैला हुआ है.

3 सितंबर को पलामू जिला में मनातू थाना क्षेत्र के केदल में टीएसपीसी और पुलिस के बीच मुठभेड़ हुई थी. इस मुठभेड़ में पुलिस के दो जवान शहीद हुए थे. रविवार को मनातू थाना क्षेत्र के सिलदिली खुर्द में सुरक्षा बलों के साथ हुए मुठभेड़ में टीएसपीसी का पांच लाख का इनामी कमांडर मुखदेव यादव मारा गया. एनकाउंटर की दोनों घटनाएं इसी इसी जंगल में हुई हैं.

क्यों खास है 30 किलोमीटर का यह जंगल!

30 किलोमीटर का यह जंगल माओवादियों के रेड कॉरिडोर छकरबंधा और बूढापहाड़ के बीच महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस इलाके में दाखिल होने के लिए यही 30 किलोमीटर का पैच महत्वपूर्ण है. इस कॉरीडोर पर कब्जे के लिए माओवादी और टीएसपीसी के बीच दर्जनों बार खूनी संघर्ष हुआ.

2010 में लकड़बंधा घटना इसी कॉरिडोर में हुआ. जिसमें 10 माओवादी कमांडर मारे गए थे. 2012-13 में इसी इलाके में हुए खूनी संघर्ष में टीएसपीसी के चार कमांडर मारे गए थे. माओवादी और टीएसपीसी के बीच इस इलाके के कब्जे को लेकर 2017 तक 20 से अधिक बार मुठभेड़ हुए हैं. जबकि टीएसपीसी और पुलिस के बीच पिछले एक वर्ष में छह बार मुठभेड़ हुई है.

नक्सली ऐसी जगह ढूंढते हैं जहां वे छूप सकें या आराम से रह सकें. पिछले कुछ महीनों में इसी इलाके में चार बार मुठभेड़ हुई है. यह एक बड़ा जंगल क्षेत्र है और बड़ा पैच है. नक्सलियों के लिए कोई भी ठिकाना सेफ नहीं है. हर जगह जवान जाएंगे और उन्हें न्यूट्रलाइज करेंगे. नक्सली सरेंडर करें. लगातार इलाके में नसलियों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है. -राकेश सिंह, अभियान, एएसपी (पलामू).

अफीम की खेती के लिए चर्चित है ये इलाका!

इसी 30 किलोमीटर के दायरे में झारखंड में सबसे पहले अफीम की खेती की शुरुआत हुई थी. आज भी इस इलाके के 500 से भी अधिक ग्रामीणों पर अफीम की खेती के आरोप में एफआईआर दर्ज है. केदल, साहद, नागद, बेटा पत्थल, चिड़ी, सलैया जैसे गांव अफीम की खेती के लिए चर्चित रहा है. पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ है.

जंगल में मिल चुका है टीएसपीसी के हथियारों की फैक्ट्री

इस 30 किलोमीटर के दायरे में पुलिस को कई बार टीएसपीसी के हथियार का फैक्ट्री मिली है. 2021-22 में केदल के जंगलों में भीषण मुठभेड़ हुई थी, इसी मुठभेड़ में पुलिस को टीएसपीसी की हथियार की फैक्ट्री मिली थी. 2017-18 में पिपराटांड़ के इलाके से पुलिस को टीएसपीसी के हथियारों की फैक्ट्री मिली थी. जिसमें एलएमजी जैसे कई आधुनिक हथियार मिले थे. हथियार के फैक्ट्री के मामले में एनआईए जांच कर रही है.

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