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बिहार कांग्रेस में नए अध्यक्ष की एंट्री की पूरी इनसाइड स्टोरी और आफ्टर इफेक्ट समझें, सवाल- टेंशन में लालू यादव?

कन्हैया कुमार ने बिहार कांग्रेस में 'खेला' कर दिया है. इसका असर आने वाले दिनों में साफ दिखाई पड़ने वाला है. आदित्य झा की रिपोर्ट.

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बिहार कांग्रेस (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : March 19, 2025 at 10:54 PM IST

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पटना : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने नया प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी अब अपनी खोई हुई जमीन को वापस लेगी. यही कारण है कि अखिलेश सिंह को हटाकर दलित चेहरे राजेश कुमार को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. हालांकि इसके पीछे की इनसाइड स्टोरी भी दिलचस्प है और आफ्टर इफेक्ट भी दिलचस्प होगा.

'अखिलेश सिंह संगठन को धार नहीं दे पाए' : चलिए सबसे पहले आपको इसकी इनसाइड स्टोरी बताते हैं. वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी बताते हैं कि बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए अखिलेश प्रसाद सिंह को भेजा गया. हालांकि अखिलेश प्रसाद सिंह ने संगठन की मजबूती के लिए कई प्रयास किया लेकिन वह इसमें कामयाब नहीं हो सके. अखिलेश सिंह कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाजी को खत्म नहीं कर पाए. यही कारण रहा की 2 वर्षों के कार्यकाल में अखिलेश सिंह संगठन को वह धार नहीं दे पाए जितनी अपेक्षा उनसे थी.

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अखिलेश सिंह की कमजोरी के 6 कारण :-

  1. डॉ अखिलेश प्रसाद सिंह सवर्ण समुदाय से आते हैं लेकिन लोकसभा के चुनाव में वह सवर्ण वोट को कांग्रेस में ट्रांसफर नहीं करवा सके. खुद भूमिहार और राजपूत बहुल महाराजगंज सीट से उनके पुत्र की हार हुई.
  2. पार्टी के अंदर गुटबाजी को रोकने में अखिलेश प्रसाद सिंह कामयाब नहीं हुए.
  3. अखिलेश प्रसाद सिंह के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए बिहार कांग्रेस में टूट हुई. कई कांग्रेसी विधायक पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. पार्टी में टूट की भनक अखिलेश प्रसाद सिंह को नहीं हो सकी.
  4. लालू की बी टीम होने का आरोप अखिलेश प्रसाद सिंह पर लगता रहा. बिहार कांग्रेस के कई नीतिगत फैसलों में लालू प्रसाद की भूमिका को लेकर अखिलेश प्रसाद सिंह पर आरोप लगाते रहे.
  5. बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह की जयंती समारोह का आयोजन सदाकत आश्रम में किया गया. इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि लालू प्रसाद को बनाया गया. इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद को चांदी का मुकुट देकर सम्मानित किया गया था. इसी कार्यक्रम में लालू प्रसाद ने मंच से ही बता दिया था कि उन्होंने कैसे अखिलेश सिंह को राज्यसभा सांसद बनवाया और जेल में रहते हुए यह सोनिया गांधी से पैरवी किए थे.
  6. अखिलेश प्रसाद सिंह बिहार में प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन नहीं करवा सके. 8 वर्षों से बिहार में कांग्रेस बिना प्रदेश कमेटी के चल रही थी. इनके दो वर्षों के कार्यकाल में भी बिहार में कांग्रेस कमेटी का गठन नहीं हो सका.

जल्द होगी स्थिति स्पष्ट : अब हम आपको बताते हैं कि आगे क्या होने वाला है. मतलब आफ्टर इफेक्ट क्या होगा. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना बताने के आग्रह पर बताया कि राजेश कुमार को भले ही बिहार प्रदेश का कमान दिया गया है. लेकिन बिहार में पार्टी की बड़ी भूमिका में प्रभारी कृष्णा अल्लावारु और कन्हैया कुमार की होने वाली है.

युवाओं को साथ लाने के लिए कांग्रेस ने कसी कमर : चुंकी एक दिन पहले ही नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है. 10 से 15 दिनों के अंदर पार्टी का रूख क्या होगा यह दिखने लगेगा. उन्होंने बताया कि युवाओं को साथ लाने के लिए आगामी इसी सप्ताह कोई बड़ा कार्यक्रम कर सकती है. एक से दो दिनों के अंदर इसकी घोषणा हो जाएगी. पार्टी आला कमान की तरफ से कार्यक्रम को लेकर हरी झंडी भी मिल गई है.

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संवाददाता सम्मेलन के दौरान कृष्णा अल्लावरु और कन्हैया कुमार (फाइल फोटो) (Etv Bharat)

कृष्णा-कन्हैया की जोड़ी पर भरोसा : वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है कि बिहार में कांग्रेस कब तक मजबूत नहीं हो सकती है, जब तक पार्टी के साथ युवा नहीं जुड़ते. बिहार में जितने पुराने कांग्रेसी थे वह धीरे-धीरे कांग्रेस से अलग हो गए. बिहार में जब तक युवा कार्यकर्ता कांग्रेस के साथ नहीं जुड़ेंगे तब तक पार्टी मजबूत नहीं हो सकती. यही कारण है कि बिहार में कृष्णा अल्लावारु को प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. वहीं अब कन्हैया कुमार को भी बिहार की राजनीति में पूर्ण रूप से सक्रिय किया जाएगा.

आगामी विधानसभा चुनाव में कृष्णा और कन्हैया की जोड़ी के ऊपर न केवल संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, बल्कि अपने पुराने खोए हुए वोट बैंक को फिर से कांग्रेस में लाने की जिम्मेदारी भी इन युवाओं के कंधों पर होगी. यही कारण है कि कृष्ण और कन्हैया की जोड़ी को मदद के लिए एक दलित चेहरे राजेश राम के रूप में प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया है. ताकि कांग्रेस का पुराना वोट बैंक, दलित, स्वर्ण और अल्पसंख्यक को फिर से एकजुट किया जा सके.

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बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार (Etv Bharat)

कन्हैया बन सकते हैं प्रचार समिति के अध्यक्ष : वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कन्हैया कुमार को कैंपेनिंग कमेटी के चेयरमैन का दायित्व दे सकती है. जब से कन्हैया कांग्रेस में शामिल हुए हैं बिहार की राजनीति से उनको दूर रखा गया. इसके पीछे लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव का प्रेशर पॉलिटिक्स था.

कांग्रेस अब बिहार में अपने दम पर मजबूत होने की तैयारी कर चुकी है. यही कारण है कि बिहार कांग्रेस में युवाओं को महत्वपूर्ण पदों पर भेजा जा रहा है. आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जिस तरीके से राजद कांग्रेस पर दबाव बनाई हुई थी, अखिलेश सिंह की विदाई के साथ तय हो गया कि अब कांग्रेस दबाव की राजनीति में नहीं आने वाली है. अब कांग्रेस बड़े भाई की भूमिका में आने की तैयारी कर रही है. यही कारण है कि लालू प्रसाद यादव के भरोसेमंद रहे डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह को पद से हटाया गया है.

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राहुल गांधी के साथ कन्हैया कुमार (फाइल फोटो) (Etv Bharat)

क्या सीटों पर फंसेगा पेंच ? : अब आपको मन में सवाल उठ रहा होगा कि क्या बिहार में सीट बंटवारे पर पेंच फंसेगा. अभी के जो हालात हैं और कांग्रेस जिस प्रकार से आगे बढ़ रही है उससे साफ है कि वह झुकने वाली नहीं है. मतलब जितनी सीटें पिछले विधानसभा चुनाव में गठबंधन के हैसियत से उसे मिली थीं उससे कम पर वह मामने वाली नहीं है.

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क्या कन्हैया-तेजस्वी-लालू का होगा आमना-सामना ? : कहते हैं राजनीति में हर कोई अपना नफा ही देखना चाहता है, नुकसान करने की कोई हिमाकत नहीं करता है. ऐसे में यह संभव है कि सीट बंटवारे के वक्त कन्हैया कुमार, कृष्णा अल्लावरु, तेजस्वी यादव, लालू यादव और राहुल गांधी एक साथ बैठें और फाइनल डील तय करें.

''लालू प्रसाद राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं. वह कभी नहीं चाहेंगे कि बिहार में महागठबंधन कमजोर हो. नए कांग्रेस के अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद लालू प्रसाद अब इस मुद्दे पर खुद आगे की रणनीति तैयार करेंगे. चुंकी लालू प्रसाद की सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी से खुद बातचीत होती है, इसीलिए इस मुद्दे को लेकर लालू प्रसाद की सोनिया गांधी और राहुल गांधी से बातचीत हो सकती है.''- अरुण पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

कन्हैया को क्यों ज्यादा प्रमोट कर रही कांग्रेस? : अब सवाल उठता है कि जिस कन्हैया कुमार को 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान भी बिहार से कांग्रेस ने दूर रखा था, उसपर इतना ज्यादा भरोसा क्यों कर रही है? असल में कांग्रेस को आभास हो रहा है कि कन्हैया के जरिए ही वह युवाओं तक पहुंच सकती है. कन्हैया अपनी बातों को पुख्ता तौर पर रखते हैं. इसका परिणाम 2019 के लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला था. कन्हैया भले ही बड़े अंतर से हार गए थे, पर उन्होंने गिरिराज सिंह सहित सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था.

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एकला चलो की राह पर कांग्रेस! : अखिलेश प्रसाद सिंह ने 70 सीटों पर अपनी दावेदारी पेश की थी. लेकिन आरजेडी इतनी सीट देने के लिए तैयार नहीं दिख रही थी. अब अखिलेश सिंह की विदाई से यह स्पष्ट होने लगा है कि कांग्रेस अब राजद के दबाव में राजनीति नहीं करना चाहती.

''दिल्ली में जिस तर्ज पर कांग्रेस ने गठबंधन नहीं होने पर आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचा. इस रास्ते पर बिहार में भी चलने की तैयारी कांग्रेस ने शुरू कर दी है. नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद अब आरजेडी बैक फुट पर होगी. यदि कांग्रेस की शर्त पर सीट का बंटवारा नहीं हुआ तो बिहार में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर सकती है."- अरुण पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

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