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आखिर क्यों सिजोफ्रेनिया मरीज को सुनाई देती हैं अजीब सी आवाजें, जानें कितना घातक है यह बीमारी, क्या संभव है इलाज?

सिजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक बीमारी है. यह बीमारी मरीज की सोचने-समझने और महसूस करने की क्षमता का प्रभावित करती है या खत्म कर देती है.

सिजोफ्रेनिया रोग
सिजोफ्रेनिया रोग (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : March 27, 2025 at 4:33 PM IST

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Updated : March 27, 2025 at 5:07 PM IST

6 Min Read
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बिलासपुर: क्या आपने कभी अपने आसपास किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है, जिसका व्यवहार असामान्य हो. उसे अनसुनी और अजीब सी आवाजें सुनाई दे, काल्पनिक चीजों को सच माने और उसे अपने परिवार के लोग और दोस्तों को खुद का दुश्मन समझने लगे. अगर ऐसे लक्षण किसी में दिखे तो हो सकता है कि वह इंसान सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रसित हो. ऐसे मरीज कभी-कभी खुद को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं. अभी हाल ही में हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में एक व्यक्ति ने बहुत से सिक्के निगल लिए थे, ये खबर काफी चर्चाओं में भी रही थी. ऐसे में आइए सिजोफ्रेनिया बीमारी के बारे में जानते हैं.

सिजोफ्रेनिया क्या है?

राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था के अनुसार, सिजोफ्रेनिया एक तरह की गंभीर मानसिक रोग है, जो मरीज की सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने के तरीके को प्रभावित करती है. सिजोफ्रेनिया मरीज वास्तविकता से दूर हो जाते हैं, जो उनके परिवार और दोस्तों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है. सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त मरीज को सामान्य और रोजमर्रा के कार्यों को करने मुश्किल हो सकती है.

सिजोफ्रेनिया मरीज को आती है ये समस्या

आप में शायद बहुत कम लोग ही सिजोफ्रेनिया नाम की बीमारी के बारे में पहले कभी सुना होगा. दरअसल सिजोफ्रेनिया एक मनोविकार रोग है. जिसमें मरीज की सोचने-समझने और महसूस करने की क्षमता या तो पूरी तरह खत्म हो जाती है या उसमें दिक्कत आ जाती है. इस बीमारी से पीड़ित रोगी को दर्द की अनुभूति नहीं होती है. यह एक दीर्घकालिक मानसिक बीमारी है, जो व्यक्ति की वास्तविकता को समझने की क्षमता को प्रभावित करती है. हालांकि, यह गंभीर बीमार केवल 1 प्रतिशत लोगों में पाई जाती है.

सिजोफ्रेनिया के लक्षण
सिजोफ्रेनिया के लक्षण (ETV Bharat)

क्या है इस बीमारी के लक्षण?

डॉ आयुष ने बताया कि इस बीमारी से ग्रस्त रोगी को अजीब सी आवाजे सुनाई देना शुरू हो जाती है. इसमें रोगी को अजीब सी काल्पनिक चीजें दिखाई देना शुरू हो जाता है, जो वास्तविकता में होती ही नहीं है. रोगी में परिवार के सदस्यों, दोस्तों और दूसरों पर शक करने की प्रवृति बढ़ जाती है. बेवजह दूसरों से झगड़ा करना शुरू कर देता है. रोगी सफाई से परहेज करना शुरू कर देता है. बिना वजह हंसना और ऊंची आवाज में बात करना शुरू कर देता है.

सिजोफ्रेनिया होने का कारण

एनआईएच के अनुसार, अध्ययन में पता चला है कि जीन, पर्यावरण और व्यक्ति की मस्तिष्क संरचना और कार्य सिजोफ्रेनिया के विकास में भूमिका निभा सकता है.

अनुवांशिक कारण

सिजोफ्रेनिया कभी-कभी अनुवांशिक भी होता है. यदि परिवार में माता-पिता को सिजोफ्रेनिया हो तो बच्चे में भी यह हो सकता है. हालांकि, परिवार में किसी सदस्य को सिजोफ्रेनिया है, जरूरी नहीं कि परिवार के दूसरे सदस्यों को भी यह होगा. अध्ययनों से पता चलता है कि कई अलग-अलग जीन किसी व्यक्ति में सिजोफ्रेनिया विकसित होने की संभावना को बढ़ा सकते हैं. कोई भी एक जीन अकेले सिजोफ्रेनिया का कारण नहीं बनता है.

व्यक्तिगत जीवन और परिवेश

शोध के अनुसार आनुवंशिक कारकों और व्यक्ति के जीवन के अनुभवों के पहलुओं का संयोजन सिजोफ्रेनिया के विकास में भूमिका निभा सकता है. इनमें गरीबी, तनावपूर्ण या खतरनाक परिवेश, और जन्म से पहले वायरस या पोषण संबंधी समस्याओं का संपर्क भी शामिल हो सकता है.

मस्तिष्क की संरचना और कार्य

सिजोफ्रेनिया मरीज में मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों के आकार और मस्तिष्क के क्षेत्रों के बीच संबंधों में सूक्ष्म अंतर होने की संभावना अधिक हो सकती है. इनमें से कुछ मस्तिष्क अंतर जन्म से पहले ही विकसित हो सकते हैं. राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था के अनुसार शोधकर्ता यह समझने के लिए काम कर रहे हैं कि मस्तिष्क की संरचना और कार्य सिजोफ्रेनिया से कैसे संबंधित हो सकते हैं.

15 से 30 साल के लोगों में ज्यादा खतरा

ज्यादातर लोगों का मानना है कि मनोविकार की समस्या बड़े उम्र के लोगों में होती है, लेकिन सिजोफ्रेनिया बीमारी का खतरा 15 से 30 साल तक के लोगों में ज्यादा होता है. 90 प्रतिशत रोगी इसी उम्र में सिजोफ्रेनिया की गिरफ्त में आते हैं. वहीं, 10 प्रतिशत रोगी 40 वर्ष के बाद भी इस रोग के शिकार हो जाते हैं.

अंधविश्वास के चक्कर में न पड़े

बिलासपुर जिला अस्पताल में मनोचिकित्सक विशेषज्ञ डॉ. आयुष शर्मा के अनुसार, अधिकतर देखा गया है कि शुरुआत में जब कोई व्यक्ति को इस रोग के लक्षण शुरू होते है, लोग इसे अंधविश्वास से जादू टोना समझ लेते है और झाड़ फूंक के चक्कर में पड़ जाते है, जिससे रोग कम होने के बजाय और बढ़ता रहता है. लोगों को चाहिए कि जब कभी भी परिवार के किसी सदस्य में इस तरह का कोई लक्षण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टरी परामर्श लेना चाहिए.

क्या संभव है सिजोफ्रेनिया का इलाज?

मनोचिकित्सक विशेषज्ञ डॉ. आयुष शर्मा ने कहा कि दवाइयों से इस बीमारी का इलाज संभव है. लगभग 20 प्रकार की दवाइयां इस समय मौजूद है, जो इस रोग को खत्म करने में असरदार है. कुछ दवाइयां तो अस्पतालों में मिल जाती हैं और कुछ दवाइयां बाहर से भी लेनी पड़ती है, जिनकी कीमत भी कम रहती है. कुल मिलाकर बीमारी का इलाज महंगा नहीं है, इसलिए ऐसे रोगी का इलाज करवाना चाहिए.

मरीज से सचेत रहने की भी जरूरत

डॉ. आयुष ने बताया कि इस तरह के रोगी को परिवार का साथ चाहिए होता है. लेकिन परिवार वालो को थोड़ा सचेत रहने की आवश्यकता होती है. क्योंकि कई बार जब रोगी को किसी भावना का अनुमान नहीं होगा तो वह हिंसक हो जाते हैं. ऐसे में मरीज के परिजनों को सचेत रहने की आवश्यकता रहती है.

मरीज को चाहिए परिवार का साथ

डॉ. आयुष ने बताया कि रोगी को सहयोग की आवश्यकता होती है. ऐसे रोगी को परिवार की आवश्यकता होती है. रोग की शुरुआत से ही डॉक्टरों का परामर्श लेना जरूरी है. रोगी को जंजीर से न बांधे, उसे नियमित सफाई करने में सहयोग करे, इस रोग का इलाज लंबा होता है और धीरे-धीरे ही इस रोग से छुटकारा मिलता है.

गौरतलब है कि पिछले दिनों बिलासपुर जिले के घुमारवीं शहर में एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया था. यहां एक 33 साल के एक युवक का जब ऑपरेशन किया गया तो, उसके पेट से 33 सिक्के निकले. यह देख कर ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर भी हैरान रह गए. युवक के पेट से डॉक्टरों ने 33 सिक्के बाहर निकाले हैं. जिसका वजन 247 ग्राम था. बताया जा रहा है कि यह युवक भी सिजोफ्रेनिया बीमारी से ग्रस्त है.

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Last Updated : March 27, 2025 at 5:07 PM IST