कमलेश्वर महादेव मंदिर: हजारों साल पुराना शिवधाम, कुंड में स्नान का विशेष महत्व
बूंदी के कमलेश्वर महादेव मंदिर श्रावण मास में उमड़ती है भक्तों की भीड़. चतुर्दशी को लगता है भव्य मेला.

Published : July 26, 2025 at 1:26 PM IST
बूंदी: राजस्थान के बूंदी जिला मुख्यालय से 80 किलो मीटर आगे जिले के इंद्रगढ़ कस्बे से करीब 10 किलोमीटर दूर सवाई माधोपुर और बूंदी की सीमा के पास स्थित कमलेश्वर महादेव मंदिर. इसे आस्था, इतिहास और चमत्कार का अद्वितीय केंद्र माना जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन शिव मंदिर की आधारशिला हजारों वर्ष पूर्व पांडवों द्वारा रखी गई थी. यह मंदिर न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक और शिल्प कला की दृष्टि से भी विशेष पहचान है. मंदिर के सामने स्थित चमत्कारी कुंड यहां की सबसे बड़ी आस्था का केंद्र है. कुंडों में स्नान करने से चर्म रोगों से मुक्ति मिलने की मान्यता है, जिसके चलते देश-विदेश से श्रद्धालु यहां आते हैं. हर माह की चतुर्दशी तिथि को यहां विशेष भीड़ होती है. श्रद्धालुओं को महादेव के दर्शन के लिए कई बार घंटों तक कतार में खड़ा रहना पड़ता है.
निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : मंदिर के महंत नागा रामेश्वर पांव बताते हैं कि यह मंदिर 13वीं शताब्दी में रणथंभौर के चौहान वंशी शासक महाराणा हमीर देव के शासनकाल में निर्मित हुआ. यह मंदिर 10 फीट ऊंची जगती पर बना है, जिससे इसकी भव्यता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. मंदिर का मुख्य गर्भगृह और अंतराल भाग ही अब शेष है, लेकिन शिखर और दीवारों की बनावट से प्रतीत होता है कि यह एक विशाल और भव्य देवालय रहा होगा. मंदिर की बाहरी दीवारों पर दिक्पालों, अप्सराओं, सुर-सुंदरियों और लोक जीवन से जुड़ी अनेक मूर्तियां उकेरी गई हैं. इन कलाकृतियों में न केवल धार्मिक भावनाएं दिखती हैं, बल्कि उस समय की तांत्रिक साधना और समाजिक जीवन शैली की भी झलक मिलती है.
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चमत्कारी कुंड और शिलालेख : मंदिर से लगभग 100 गज की दूरी पर स्थित है दो विशाल पक्के कुंड, जिसकी दीवार पर महाराणा हमीर देव का शिलालेख अंकित है. इसमें हमीर देव और उनके पिता जैत्र सिंह के पराक्रम का वर्णन मिलता है. स्थानीय इतिहासकार बृजराज सिंह भानावत बताते हैं कि इन कुंडों में स्नान करने से चर्म रोगों से राहत मिलती है. कई श्रद्धालु यहां स्नान कर अपनी पुरानी त्वचा संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाने की बात बताते हैं. यही कारण है कि हर महीने चतुर्दशी पर हजारों की संख्या में लोग यहां आते हैं.

खिलजी के हमले में हुआ था नुकसान : ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, रणथंभौर युद्ध में हमीर देव की वीरगति के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने इस मंदिर पर आक्रमण किया और इसे आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया. हालांकि, मंदिर की नींव, शिलालेख और पत्थर की प्रतिमाएं आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गवाही देती हैं. यहां हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर में विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं. इस दिन मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, भंडारे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है.
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रेलवे का अंडर पास बना मुसीबत : स्थानीय निवासी बनवारी लाल सैनी ने बताया कि बूंदी को मध्य प्रदेश से जोड़ने वाले सड़क मार्ग पर सुमेरगंज मंडी के पास रेलवे का नाला वाहन चालकों व राहगीरो के लिए बड़ी समस्या बन गया है. संकरे नाले मे पानी भरने के चलते आए दिन वाहन फंस रहे हैं. जिसके कारण वाहनों का लंबा जाम लग जाता है. इसी मार्ग से हर महीने की अमावस्या की चौदस को लाखों श्रद्धालु कमलेश्वर महादेव के दर्शन करने पहुंचते हैं. ऐसे मे संकरे नाले के चलते आवागमन बाधित होता रहता है.
उन्होंने बताया कि रेलवे नाले की समस्या से यहां से गुजरने वाले यात्रियों के साथ तीन पंचायतों के ग्रामीणों को भी परेशान होना पड़ता है. इलाके की दौलतपुरा, नवलपुरा,चाणदा पंचायत के ग्रामीणों का इसी मार्ग से इंदरगढ़ से जुड़ाव होता है. ऐसे मे यह नाला ग्रामीणों की राह मे रोड़ा बनता रहता है. नाले में पानी भरने के कारण लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन पार करनी पड़ रही है. यह समस्या वर्षों से चली आ रही है. इसके बावजूद स्थानीय प्रशासन और रेलवे विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.





