कचरे से घरों को किया जाएगा रोशन, महीने भर में 51 हजार से ज्यादा घरों को मिलेगी बिजली
अब कचरे से घरों को रोशन करने का प्रोजेक्ट तैयार किया गया है. इसका जायजा लिया ईटीवी भारत के संवाददाता अंकुर जाकड़ ने....

Published : April 22, 2025 at 11:00 AM IST
|Updated : April 22, 2025 at 5:26 PM IST
जयपुर : कभी शहर के लिए सिरदर्द बना कचरा, अब ऊर्जा का स्रोत बन गया है. इंटरनेशनल मदर अर्थ डे के मौके पर जयपुर के लांगड़ियावास स्थित वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी उदाहरण है, जहां कचरे से हर घंटे 12 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है. हर घर औसतन 150 यूनिट बिजली उपयोग करता है और यहां महीने भर में तैयार हो रही 7684 मेगावाट बिजली से करीब 51 हजार 227 घरों को एक महीने तक बिजली मिल सकती है.
जयपुर ने ये साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और इच्छाशक्ति मिलकर किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ सकती है. जहां पहले कचरे को लैंडफिल में डालना ही अंतिम उपाय था, वहीं अब वही कचरा बिजली उत्पादन का मजबूत आधार बन चुका है. जयपुर के हेरिटेज और ग्रेटर निगम ने जिंदल अर्बन वेस्ट मैनेजमेंट से शहर में वेस्ट टू एनर्जी प्लांट का निर्माण करवाया, जिसके अंतर्गत 700 टन प्रतिदिन कचरा डिस्पोज हो रहा है. यहां प्रति घंटे 12 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है. इस प्रोजेक्ट का जायजा लेने के लिए ईटीवी भारत की टीम जब मौके पर पहुंची, तो यहां संग्रहित कचरे की दुर्गंध इतनी ज्यादा थी कि मास्क लगाए बिना दो पल खड़ा रहना दुश्वार था. हालांकि, यहां एयर स्प्रिंकलर सिस्टम भी लगाया गया है, जो इस दुर्गंध को न्यूट्रलाइज करता है.


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वेस्ट से इलेक्ट्रिसिटी बनाने की प्रक्रिया : टीम आगे बढ़ी तो एमएसडब्ल्यू पिट दिखा, जहां कचरे का पहाड़ देखने को मिला. इसे लांगड़ियावास स्थित वेस्ट टू एनर्जी प्लांट की पहली इकाई कहा जा सकता है. प्रोजेक्ट इंजीनियर बृजेश ने बताया कि यहां 12000 टन क्षमता का एमएसडब्ल्यू पीट का निर्माण किया गया है. यहां जयपुर नगर निगम हेरिटेज और ग्रेटर से आए हुए कचरे का संग्रहण किया जाता है. संग्रहित हुए कचरे को 7 दिन तक सुखाकर उसको ग्रैब एंड क्रेन की सहायता से बॉयलर में शिफ्ट किया जाता है. इस बॉयलर में कचरे को 400 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर जलाया जाता है. जलने के बाद यहां से निकलने वाली स्टीम को टरबाइन पर भेजा जाता है. प्रोजेक्ट इंजीनियर बृजेश के साथ ही जब आगे बढ़े तो उन्होंने इस पूरे प्रोजेक्ट का हार्ट कहे जाने वाले टरबाइन को दिखाया. साथ ही बताया कि इसी टरबाइन की सहायता से स्टीम का उपयोग बिजली उत्पादन में किया जाता है. इस प्रोजेक्ट से बनी बिजली को जमवारामगढ़ सब स्टेशन पर ट्रांसफर कर दिया जाता है.

पर्यावरण संरक्षण में योगदान : इस प्लांट पर पर्यावरण से संबंधित सारे महत्वपूर्ण बिंदुओं का उचित ध्यान रखा गया है. प्रोजेक्ट के तमाम संयंत्रों को देखने और समझने के बाद ईटीवी भारत की टीम इस प्रोजेक्ट के कंट्रोल रूम में पहुंची. यहां से सभी संयंत्रों पर निगरानी बरती जाती है. यहां प्रोजेक्ट से जुड़ी पायल ने बताया कि कचरे को जलाने के बाद निकली राख का उपयोग लैंडफिल में किया जाता है. भविष्य में इसका उपयोग ईंट निर्माण में भी किया जाएगा. प्लांट के 33.33% हिस्से में वृक्षारोपण और पौधारोपण किया जाएगा. कचरे से निकलने वाले दूषित पानी को लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट में भेज कर उसको शुद्ध किया जाता है और फिर इसका दोबारा उपयोग प्लांट में ही किया जाता है. कचरा जलाने से निकलने वाले धुएं को फ्लू गैस क्लीनिंग सिस्टम यानी एफजीसीएस में साफ किया जाता है. इसके बाद ही साफ किया हुआ धुंआ चिमनी से बाहर निकलेगा, जबकि लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट और कूल कंडेनसर से जीरो लिक्विड डिस्चार्ज पर प्लांट को चलाने के उद्देश्य पर खरे उतरते हैं.

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निगम का बड़ा रोल : चूंकि ये प्रोजेक्ट बिना निगम की सहायता और डोर टू डोर कलेक्शन के अधूरा है. ऐसे में ईटीवी भारत ने यहां मौजूद सिविल इंजीनियर संकेत से भी बात की और निगम के किरदार के बारे में जाना. उन्होंने ने बताया कि कचरे को प्लांट तक पहुंचाने की व्यवस्था पूरी जयपुर नगर निगम हेरिटेज और ग्रेटर निगम की है. इसके तहत जयपुर नगर निगम जिंदल ग्रुप से 66 रुपए प्रति टन कचरे की मानक राशि लेता है. इससे जयपुर नगर निगम को 1 साल में करीब 2.5 करोड़ रुपए की आमदनी प्राप्त होगी. इसके अलावा इस प्लांट से आगे चलकर जयपुर शहर में डंप यार्ड की संख्या में कमी आएगी और कचरा को पूरी तरह नष्ट किया जा सकेगा.

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जनता की भागीदारी जरूरी : यहां प्रोजेक्ट एचआर हेड मनीष ने बताया कि 20 फरवरी 2025 को शुरुआत हुई थी और तब से लगातार यहां कचरे से बिजली बनाई जा रही है. निगम प्रशासन हर स्वच्छता सर्वेक्षण में इस बात को दोहराता है कि नागरिक कचरे को घर से ही अलग-अलग (सूखा और गीला) करना शुरू करें. ये योजना भी तभी टिकाऊ है जब कचरा सेग्रीगेट होकर पहुंचे. इससे सेग्रीगेशन प्रोसेसिंग का समय भी बचेगा और स्वच्छता सर्वेक्षण में सेग्रीगेशन से जुड़े अंक भी जयपुर के खाते में आएंगे. बहरहाल, ये प्रोजेक्ट राजस्थान सरकार और केंद्र की स्मार्ट सिटी योजना के तहत विकसित किया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसी मॉडल को प्रदेश के अन्य शहरों में भी उतारा जाए तो पर्यावरण, ऊर्जा और स्वछता सर्वेक्षण में प्रदेश अग्रणी राज्यों में खड़ा होगा.




